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उत्तर वैदिक काल

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आज के इस आर्टिकल में हम उत्तर वैदिक काल के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। आप इस आर्टिकल को ध्यान से पढ़ना ताकि इस विषय से संबंधित सभी प्रकार की जानकारी आपको मिल सके।

उत्तर वैदिक काल को प्राचीन भारतीय संस्कृति का एक काल खंड कहा जाता है। इस काल के दौरान वेदों का निर्माण हुआ था। उत्तर वैदिक काल के समय में आर्यों का यमुना, गंगा और सदनीरा के सिंचित उपजाऊ मैदानों पर संपूर्ण रूप से अधिकार था। आर्य ने विंध्य को पार करके गोदावरी के उत्तर में डेक्कन में निवास किया था। इस काल में लोकप्रिय सभाओं का महत्व खत्म हो गया था। साथ ही उसकी कीमत उन्हें शाही सत्ता की वृद्धि के रूप में देनी पड़ी थी। इसका मतलब होता है, कि साम्राज्य के लिए राजशाही का रास्ता साफ हो चुका था। बड़े-बड़े राज्यों के संगठन से राजा और भी ज्यादा ताकतवर हो गए थे।

उत्तर वैदिक काल घटनाक्रम

1500 ईसा पूर्व और 600 ईशा पुर्व का समय काल आरंभिक वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल के रूप में विभाजित किया गया था। वैदिक काल की अवधि के 1500 ईसा पूर्व से लेक 1000 ईसा पुर्व के दौरान आर्य भारत पर चढ़ाई करने वाले थे। उत्तर वैदिक काल की अवधि 1000 ईसा पूर्व से लेकर 600 ईसा पुर्व की थी।

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उत्तर वैदिक काल भौगोलिक विस्तार

शतपथ ब्राह्मण में वर्णित विदेह माधव की घटना के अंतर्गत आर्य ने उत्तरी भारत में सदानीरा नदी के विस्तार तक अपना अधिकार जमा लिया था। आर्यन सदानीरा नदी के पूर्व में स्थित मगध और अंग जैसे राज्य क्षेत्र पर अपना अधिकार नहीं जमा पाए थे। उत्तर वैदिक काल में भरत तथा पुरु राजवंश मिलकर  कुरु कहलाते थे। जिसकी राजधानी आसंदीवत थी। साथ ही तुर्वस और क्रिवी साथ मिलकर पांचाल कहलाते थे।

कौरव तथा पांडव कुरुवंश से संबंध रखते थे। तथा पांचाल वंश से प्रावाहरण जैबली और आरुणि श्वेतकेतु संबंध रखते थे। समय के साथ कुरु तथा पांचाल के विस्तार मिल गए और हस्तिनापुर को इसकी राजधानी बनाई गई। हस्तिनापुर का आखिरी राजा अंध था। जब यमुना नदी के बाढ़ के कारण हस्तिनापुर समाप्त हो गया था तो कौशांबी को राजधानी बनाई गई। वर्तमान समय के उत्तरी बिहार के विस्तार को विदेह कहा जाता था। माधव और जनक इस विस्तार के सुप्रसिद्ध राजा थे। सीता जनक की सुपुत्री थी। सरयू नदी के तट पर कौशल का विस्तार था। इस विस्तार के प्रसिद्ध राजा में दशरथ और राम का समावेश होता है।

उत्तर वैदिक काल की अर्थव्यवस्था

उत्तर वैदिक ग्रंथों के अनुसार उस वक्त लोहे के लिए लौह अयस और कृष्ण अयस शब्द का इस्तेमाल किया जाता था। अतरंजीखेड़ा में सबसे पहले खेतीबाड़ी से जुड़े लोहे के साधन मिले थे।

उत्तर वैदिक काल में मुख्य व्यवसाय के रूप में कृषी का समावेश होता था। शतपथ ब्राह्मण में खेती बाड़ी की जुताई, बुनाई, कटाई और मडा़ई जैसी प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है।

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उत्तरवैदिक काल में पशुपालन का बड़ा महत्व रहा है। गाय और घोड़े का ज्यादा मात्रा में आर्यों के द्वारा उपयोग किया जाता था। वैदिक साहित्य से मालूम पड़ता है कि उस वक्त लोग देवताओं से पशुओं की वृद्धि के लिए प्रार्थना करते थे। यजुर्वेद के अनुसार वे गेहु, धान, उडंद, मूंग, गौ और मसूर जैसे खाद्य पदार्थों का उत्पादन करते थे।

उत्तर वैदिक काल में लोगों के जीवन में स्थिरता आ चुकी थी। जिसकी वजह से वाणिज्य और व्यापार की दुगनी तेजी से वृद्धि हुई थी। आर्य समुद्री व्यापार से संपूर्ण रूप से परिचित हो चुके थे। शतपथ ब्राह्मण में बताया गया है कि वाणिज्य व्यापार और सुद पर रुपए देने का व्यवहार इस काल के दौरान शुरू हो गया था। साथ ही मुद्राओं का चलन भी प्रचलित हो गया था। परंतु रोज बरोज के जीवन में सामान्य लेनदेन के लिए वस्तु विनिमय पद्धति का इस्तेमाल करने में आता था। उत्तर वैदिक काल में निष्क, शतमान, कृष्णल और पाद मुद्रा देखने को मिलती थी।

स्वर्ण तथा लोहे के साथ साथ इस युग में आर्य टीन, तांबा, चांदी और सीसा जैसी धातु भी प्रचलित हो चुकी थी। उत्तर वैदिक काल की अर्थव्यवस्था की खास विशेषता में उद्योग और अलग-अलग प्रकार के शिल्पो का समावेश होता है। इस दौरान धातु शोधक, रथकार बढ़ई, चर्मकार, स्वर्णकाम और कुम्हार जैसे व्यवसायिक का उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक काल में वस्त्र उत्पादन का उद्योग मुख्य उद्योग में शामिल था। वस्त्र उद्योग के लिए ऊन और सन का इस्तेमाल किया जाता था। कपास का उल्लेख कहीं भी प्राप्त नहीं है।

बुनाई का काम बड़े पैमाने पर किया जाता था। ऐसा माना जाता है कि बुनाई का कार्य महिलाओं के द्वारा किया जाता था। साथ ही कढ़ाई का कार्य भी महिलाएं करती थी। धातु शिल्प का उद्योग बड़ा बन चुका था। अनुमान लगाया जाता है कि इस युग में तांबे को पिघलाकर अलग-अलग प्रकार के उपकरण और शिल्पी वस्तु बनाई जाती थी।

ऊपरी गंगा बेसिन के उत्खनन के बाद मिट्टी के कटोरो और भुरी मिट्टी से बने बर्तनो का अस्तित्व प्राप्त हुआ है। यह उत्पादन एक ही विस्तार में और एक ही समय काल लगभग 1000 से 600 ईसा पूर्व के दौरान बनाया गया होगा।

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उत्तर वैदिक काल सामाजिक व्यवस्था

उन दौरान समाज चार वर्णों में विभाजित हुआ करता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। वर्ण के आधार पर उनका कार्य निश्चित होता था। जन्म के साथ ही वर्ण निर्धारित होता था।

गुरुओं के 16 वर्गों में से ब्राह्मण एक थे। परंतु बाद में अन्य संत दलों से भी श्रेष्ठ माने जाने लगे थे। यह वर्ग सभी वर्गों में से सबसे शुद्ध वर्ग कहा जाता था।

क्षत्रिय वर्ग शासकों और राजाओं के वर्ग में शामिल थे। इस वर्ग का कार्य जनता की रक्षा करना और समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखना था।

वैश्य वर्ग में आम लोगों का समावेश होता था। इस वर्ग के लोग व्यापार, खेतीबाड़ी और पशुपालन जैसे कार्य करते थे। सामान्य रूप से यह वर्ग के लोग कर अदा करते थे।

यद्यपि तीनों वर्ग में से शुद्र वर्ग को सभी प्रकार की सुविधाएं प्राप्त नहीं होती थी। उनके साथ भेदभाव किया जाता था।

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उस दौरान पैतृक धन पितृसत्तात्मक का नियम व्यापक था। जिसकी वजह से संपत्ति का वारिस बेटा होता था और महिलाओं को अधिकतर निचला स्थान प्राप्त होता था।

उस वक्त गोत्र असवारन विवाह होते थे। जिसके चलते एक ही गोत्र के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते थे। वैदिक लेखों के आधार पर आर्य का जीवन चार चरण में समाप्त होता था: विद्यार्थी, गृहस्थ, वनप्रस्थ और सन्यासी।

उत्तर वैदिक काल धार्मिक व्यवस्था

ऋग वैदिक काल में स्तुति और आराधना को महत्व दिया जाता था परंतु उत्तर वैदिक काल में यज्ञ को धर्म का प्रमुख आधार माना जाता था। यज्ञ का महत्व सबसे ज्यादा था। साथ ही आनेकानेक मंत्र, विधीया और अनुष्ठान प्रचलित थे। जबकि उपनिषदो मैं स्पष्ट रूप से यज्ञ तथा कर्मकांड की निंदा करने में आई है।

उत्तर वैदिक काल में ऋग्वैदिक काल के देवता इंद्र, अग्नि तथा वायु का महत्व समाप्त हो गया था। इसके स्थान पर प्रजापति, विष्णु और रूद्र की प्रार्थना करने में आती थी। सर्वोच्च देवता के रूप में प्रजापति को और मृत्यु लोग के देवता के रूप में परीक्षित को रखा गया था।

इस काल के दौरान वासुदेव संप्रदाय और 6 दर्शन जैसे कि साख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा का  अभिभार्व हुआ था। भारत के सभी दर्शनों में सबसे पूरा नाम दर्शन सांख्य दर्शन था। जिसमें बताया गया है, कि मूल 25 तत्व है जिसमे प्रकृति पहले स्थान पर आती है। उत्तर वैदिक काल के अंतिम समय में कर्मकांड और अनुष्ठानों के विरोध में वैचारिक आंदोलन किए गए थे। इस आंदोलन की शुरुआत उपनिषदों से हुई थी। उपनिषदों में पुनर्जन्म मोक्ष और कर्म के सिद्धांतों की सही व्याख्या बताई गई है। साथ ही ब्रह्म और आत्मा के संबंधों के बारे में भी व्याख्या दी गई है। ईशोपनिषद में सबसे पहले निष्काम कर्म का सिद्धांत दिया गया था। वैदिक काल में ही धार्मिक क्षेत्र में जानवरों की बलि चढ़ाने की प्रथा का प्रचलन हुआ था।

उत्तर वैदिक काल के साहित्य

सामवेद:

सामवेद भारत का प्रथम और प्राचीनतम ग्रंथ है। इस ग्रंथ में भारतीय संगीत के बारे में माहिती दी गई है। सामवेद ने मुख्य देवता सूर्य है। इस ग्रंथ में प्रमुख रूप से सूर्य की स्तुति के मंत्र दिए गए हैं। परंतु इंद्र सोम का भी इसमें पर्याप्त उल्लेख मिलता है। उद्गत्रृ नाम के पुरोहित के द्वारा सामवेद का पाठ करने में आता था। सामवेद में 1869 जितने मंत्र आए हुए हैं। परंतु 75 मंत्र ही मौलिक है और बाकी के मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं।

यजुर्वेद:

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यजुर्वेद में कर्मकांड से संबंधित माहिती का उल्लेख किया गया है। इस ग्रंथ में अनुष्ठान परक और स्तुति परक दोनों ही प्रकार के मंत्र दिए गए हैं। यजुर्वेद गद्य और पद्य दोनों से निर्मित किया गया है। इस ग्रंथ को दो भागों में विभाजित किया गया है। पहला शुल्क यजुर्वेद और दूसरा कृष्ण यजुर्वेद। शुल्क यजुर्वेद उत्तर भारत में और कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत में प्रचलित है।

अथर्ववेद:

अथर्ववेद की रचना सबसे आखिर में हुई थी। इस ग्रंथ में 6000 मंत्र, 20 अध्याय और 731 सूक्त का समावेश किया गया है। अथर्ववेद में ब्रह्मज्ञान, धर्म, समाज निष्ठा, औषधि प्रयोग, रोग निवारण, मंत्र और जादू टोना जैसे विषय पर माहिती बताई गई है। अथर्ववेद को ब्रह्मवेद के नाम से भी पहचाना जाता है। अथर्ववेद में आयुर्वेद संबंधित माहिती का उल्लेख किया गया है। अथर्ववेद के अनुसार स्पट होता है कि समय के साथ साथ आर्यों में प्रकृति पूजा की उपेक्षा होने लगी थी और प्रेत आत्माओं तथा तंत्र मंत्र में विश्वास करने लगे।

ब्राह्मण ग्रंथ:

वेदों की सरल व्याख्या देने के लिए ब्राह्मण ग्रंथ की रचना कि गई थी। ब्राह्मण ग्रंथ में यज्ञो का अनुष्ठानिक महत्त्व का उल्लेख किया गया है। इस ग्रंथ की रचना गद्य में की गई है।

वेदांग:

वेदांगो की संख्या 6 है, जिसमें शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद का समावेश होता है।

  • प्रमुख यज्ञ:
  • अश्वमेध यज्ञ
  • राजसूय यज्ञ
  • वाजपेय यज्ञ
  • अग्निष्टोम यज्ञ
  • सौत्रामणि यज्ञ
  • पुरुषमेध यज्ञ

16 संस्कार:

16 संस्कार में गर्भाधान , पुंसवन, जातकर्म, निष्क्रमण, अन्नप्राशन,चूङाकर्म, कर्णवेध, विद्यारंभ, उपनयन, केशांत/गोदान, समावर्तन, विवाह, अंतेष्टि का समावेश किया गया है।

विवाह के प्रकार:

मनुस्मृति मैं विवाह के आठ प्रकारों का वर्णन किया गया है। जिसमें से पहले 4 प्रकार के विवाह को प्रशंसनीय और बाकी के विवाह को निंदनीय कहा गया है।

प्रशंसनीय विवाह:

  • ब्रह्म: इस प्रकार के विवाह में कन्या के माता पिता कन्या के वयस्क हो जाने पर योग्य वर खोज कर उसके साथ अपनी बेटी का विवाह करवाते हैं।
  • दैव: इस प्रकार के विवाह में कन्या के माता पिता यज्ञ करवाने वाले पुरोहित के साथ कन्या का विवाह करवाते हैं।
  • आर्ष: आर्ष प्रकार के विवाह में कन्या के पिता द्वारा यज्ञ के कार्य के लिए एक अथवा दो गायों के बदले में अपनी कन्या का विवाह करवाते हैं।
  • प्रजापत्य: जब वर स्वयं कन्या के पिता के पास जाकर कन्या का हाथ मांगता है और कन्या के पिता उन दोनों का विवाह करवाते हैं तो उसे प्रजापत्य विवाह कहते हैं।

निंदनीय विवाह:

  • आसुर: कन्या के पिता के द्वारा धन के बदले में कन्या का विवाह करवाना आसुर विवाह कहलाता है।
  • गंधर्व: जब कन्या और पुरुष बिना इजाजत के प्रेम और कामुकता से वशीभूत होकर विवाह करते हैं तो उसे गंधर्व विवाह कहते हैं।
  • पैशाच: इस प्रकार में सोई हुई कन्या के साथ सहवास करके विवाह करने मे आता है।
  • राक्षस: बल का इस्तेमाल करके कन्या से जबरदस्ती विवाह करना।
Last Final Word

यह थी उत्तरवैदिक काल के बारे में जानकारी। हम उम्मीद करते हैं कि हमारी जानकारी से आपको आपके सभी सवालों के जवाब मिल गए होगे। अगर अभी भी आपके मन में इस विषय से संबंधित कोई भी प्रश्न रह गया हो तो हमने कमेंट के माध्यम से अवश्य बताइए।

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