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सत्याग्रह आंदोलन

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मोहनदास करमचंद गाँधी जी के द्वारा शरु किया गया यह सत्याग्रह अहिंसा के मार्ग पर चलने वालें अहिंसात्मक तरीके से किया गया विरोध हैं। इसीलिए जब भी कभी सत्याग्रह का नाम आता हैं हम लोग महात्मा गाँधी जी को जरुर याद करते हैं। क्योकि यह वो इंसान हैं, जिसने सत्याग्रह के माध्यम से हमारे देश भारत को आजादी दिलाने में बहोत ही महत्वपूर्ण योग दान रहा हैं। हमारे देश को आजादी के दौर पर स्वतंत्रता आंदोलनों में महात्मा गाँधी जी के सत्याग्रह आंदोलन कई ज्यादा गुना प्रचलित हुआ था। महात्मा गांधि ने अपने जीवन की शरुआती दौर में दक्षिण आफ्रिका में अपने जीवन के संघर्ष के दौरान सत्याग्रह की शरुआत की थी। इसके बाद गाँधीजी के भारत आगमन के बाद उन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए गाँधी जी ने कई जगह पर अलग अलग तरह से सत्याग्रह कर हमारे भारत देश को आजादी दिलायी थी। तो चलिए आगे जानते हैं, सत्याग्रह आंदोलन के बारें में।

सत्याग्रह आंदोलन क्या है? (What are Satyagraha Movements?)

सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ सत्य पर जोर देना है।

सत्याग्रह का मतलब है सभी प्रकार के त्याग करना, सत्याग्रह यानि सत्य के लिए आग्रह करना और सभी तरह के कष्टों को जेलते हुए अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ना। सत्याग्रह वह विरोध है, जो बिना किसी से नफ़रत या प्रतिशोध (बदला) के किया जाता है। अर्थात सामने वाले को चोट पहुँचाए बिना उसके मन में न्याय की भावना जगाना और उनका दिल जीतना सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य है, और ऐसा सत्याग्रह करने वाले सत्याग्रही के नाम से कहलाते हैं। महात्मा गाँधी के अनुसार यह सत्य और अहिंसा से पैदा हुई एक नैतिक शक्ति है। उन्होंने कहा कि सत्य, अहिंसा और प्रेम के बल पर कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है। इस सत्याग्रह के माध्यम से गांधी ने लोगों के साथ मिलकर ब्रिटिश राज के खिलाफ कई आंदोलन किए। और इसमें उनकी अहिंसक विचारधारा ही उनकी असली ताकत बनी।

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सत्याग्रह दुनिया “निहत्थे देशभक्ति” या निष्क्रिय प्रतिरोध की रणनीति से परिचित थी जब तक कि गांधीजी ने 19 वीं शताब्दी के अंत में दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनों को तोड़ना शुरू नहीं किया। इसका कारण केवल गोरों के बीच भेदभाव था। अगर विरोधी की ताकत हमसे ज्यादा हे तो सशस्त्र विरोध का कोई मतलब नहीं है। वे अहिंसा में विश्वास करते थे, इसलिए वे यह लड़ाई लड़ रहे थे। ‘प्रतिशोध‘ की रणनीति का पालन किया गया। इंग्लैंड में महिलाओं ने मताधिकार प्राप्त करने के लिए “निष्क्रिय प्रतिरोध” का एक ही रास्ता अपनाया था। इस प्रकार प्रतिशोध में विरोधी पर अस्त्र-शस्त्र (weapons) से प्रहार करने के अतिरिक्त उसे हर प्रकार से प्रताड़ित करना, छल से उसे हानि पहुँचाना या शत्रु को हानि पहुँचाना। उसके साथ सन्धि करके उसे अपमानित करना उचित समझा।

अपने विरोधी के खिलाफ “सत्याग्रह” में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है बल्कि वे अहिंसा के रक्षक हैं। धैर्य और सहानुभूति को प्रतिद्वंद्वी (विरोधी) को उसकी गलती से मुक्त करना चाहिए, क्योंकि जो एक को सच लगता है, वह दूसरे को गलत लग सकता है। धैर्य का तात्पर्य दुख से है। इसलिए इस सिद्धांत का अर्थ है, “सत्य की रक्षा विरोधी को पीड़ा या पीड़ा पहुँचाने से नहीं, बल्कि स्वयं को कष्ट देने से होती है।” महात्मा गांधी ने कहा था कि सत्याग्रह में “प्रेम” शब्दों में से एक अध्यात्म है। सत्याग्रह की संधि में मध्य पद को हटा दिया गया है।

गांधीजी ने लॉर्ड इंटर को सत्याग्रह की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार दी – “यह एक ऐसा आंदोलन है जो पूरी तरह से सत्य पर आधारित है और हिंसा के उपायों के बदले में किया जा रहा है।” सत्याग्रह के दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण तत्व अहिंसा है, क्योंकि अहिंसा ही सत्य तक पहुंचने और उस पर टिके रहने का एकमात्र तरीका है। सक्रिय प्रेम में सकारात्मक प्रवृत्ति होती है।’

सत्याग्रह का अर्थ है, सत्य के प्रति प्रेम का आग्रह। (सत्य + प्रेम + आग्रह = सत्याग्रह)

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सत्याग्रह का विचार (Idea of Satyagraha) 

गाँधी जी को सत्याग्रह का पहली बार विचार दक्षिण आफ्रिका में उनके साथ हुई एक घटना के दौरान आया था। दरअसल, जब वे बैरिस्टर बनने के लिए साउथ अफ्रीका गए तो उन्होंने डरबन से प्रिटोरिया का सफर तय किया। उनके पास प्रथम श्रेणी का टिकट था। और वे जाकर उसी स्थान पर बैठ गए। लेकिन उस डिब्बे में अन्य लोगों को यह पसंद नहीं आया कि उनके साथ काले रंग का कोई व्यक्ति बैठे। उसने पुलिस आरक्षक को तृतीय श्रेणी के डिब्बे में भेजने को कहा, तब उस पुलिस सिपाही ने गांधी जो को तृतीय श्रेणी के डिब्बे में जाने को कहा, लेकिन गांधीजी ने कहा कि उसके पास प्रथम श्रेणी का टिकट है। वे वहां नहीं जाएंगे। इस तरह गांधीजी की स्वीकृति पर उस पुलिस कांस्टेबल ने उन्हें ट्रेन से नीचे उतार दिया। चार्ल्सटन से जोहान्सबर्ग की यात्रा के दौरान एक स्टेजकोच में उनके साथ ऐसी ही घटना घटी। उन्होंने कोच के अंदर बैठने के लिए टिकट खरीदा था, तभी उसमें सवार एक व्यक्ति ने उन्हें अपनी सीट से उठने को कहा। मना करने पर उनके साथ मारपीट भी की। इससे वे बहुत दुखी हुए। उनके दिमाग में एक ही बात चल रही थी कि भारतीयों को इस तरह के अन्याय से बचाया जाए।

गाँधी जी के साथ हुए ऐसे ही अत्याचारों और अपमानो के होने से उनके मन में सत्याग्रह के विचार ने जन्म लिया। गाँधी जी के साथ हुए ऐसे अत्याचार से हिं उन्होंने सत्याग्रह की शरुआत की। गाँधी का यह कहना था की ज्यादा से ज्यादा संघर्ष में दुश्मनों के किये गये लक्ष को हराना होता हैं। परंतु सत्याग्रह का धेर्य गलत करने वालें के दिमाग में बदलाव लाना होता है, और उसे अच्छा इन्सान बनाने के लिए सत्याग्रह द्वारा मजबूर करना होता हैं। सत्याग्रह का उदेश्य ये थे की उन आदमी के दिमाग में हमेशा सत्य और अहिंसा के रास्ते पे चलना होता हैं। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह आंदोलन में अहिंसा को एक वास्तविक और सक्रिय हथियार के रूप में अपनाया था। उनका मानना यह ​​था कि सत्याग्रह संघर्ष का एक विशेष रूप है, जहां-जीत और हार का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। हिंदू परंपरा के उनके अध्ययन और दक्षिण अफ्रीका में उनके द्वारा अनुभव किए गए भेदभाव ने उन्हें सत्याग्रह के अपने विचार को विकसित करने और समझने में मदद की।

भारत में सत्याग्रह आंदोलन (Satyagraha Movement in India)

गाँधी जी ने भारत देश में कई सत्याग्रह आंदोलन अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर किये थे। हमारा भारत देश विदेशियों के गुलामी से बंधा हुआ था इसलिए महात्मा गांधीजी ने यह सत्याग्रह आंदोलन ब्रिटिशों को भारत देश से बहार करने के लिए किये गये थे। भारत में हुए सत्याग्रह आंदोलन के बारे में माहिती निचे दर्शायी गयी है :

चंपारण सत्याग्रह सं. 1917 (Champaran Satyagraha – 1917)

महात्मा गाँधी के भारत देश में वापस लौटने के बाद करीबन 2 साल बाद यानि सं 1917 में भारत में सत्याग्रह की शरुआत कर दी थी। महात्मा गाँधी ने सबसे पहले इसकी शरुआत बिहार के चंपारण जिले में खेडुतों के खिलाफ हक़ के लिए किया था। यह अंग्रेजों द्वारा किसानों के साथ किए गए अन्याय के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, चंपारण सत्याग्रह नामक एक बहुत बड़े विरोध के रूप में उठाया था। ब्रिटिश शासन के दौरान, किसानों को चीन, ब्रिटेन और यूरोप को निर्यात (निर्यात किया हुआ माल) करने के लिए व्यावसायिक रूप से अफीम और नील उगाने के लिए मजबूर किया गया था। इस प्रकार की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है और फसलों के साथ-साथ मिट्टी भी खराब हो जाती है। जिसके कारण किसान अपनी जमीन पर चावल और दाल जैसी खाद्य फसलें नहीं उगा पा रहे थे। किसानों ने इसका जौरो शोर से विरोध किया, लेकिन अंग्रेजों को अफीम के कारोबार से अधिक लाभ मिल रहा था, इसलिए उन्होंने किसानों की मांग को स्वीकार न करते हुए उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया था।

देखा जाये तो जब गाँधी जी भारत देश वापिस लौटे और उन्होंने खेडुतों की परीस्थिती को देखा, इसलिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में किसानों की इस पीड़ा को समाप्त करने के लिए उसी पद्धति का उपयोग करने की कोशिश की। मतलब के सत्याग्रह आंदोलन, ताकि इसके द्वारा लोग सामूहिक रूप से अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए विद्रोह कर सकें। गांधीजी ने चंपारण गांव के लोगों को इस समस्या से निपटने के लिए पहले शिक्षित होने को कहा और इसके लिए उन्होंने वहां कुछ स्कूल खोले, उनमें विश्वास जगाया और गांव की स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक किया। इस अभियान में राजेंद्र प्रसाद और उनके अन्य साथियों ने उनका साथ दिया था। इस तरह उन्होंने किसानों के हित के लिए काम किया, जिससे किसान उनसे बहुत खुश हुए। लेकिन अंग्रेजों को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया, उन्होंने लोगों को भड़काने के आरोप में गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया, जिससे वहां के लोगों ने काफी विरोध किया, जिससे अंग्रेजों को गांधी जी की शक्ति का पता चला, और उन्होंने चंपारण कृषि विधेयक व्यतीत कर किसानों के पक्ष में कुछ फैसले लिए। इससे किसानों को काफी राहत मिली और उसी समय से उन्हें वहां के लोगों ने “बापू“नाम दिया गया।

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अहमदाबाद सत्याग्रह सं. 1918 (Ahmedabad Satyagraha – 1918)

बोम्बे प्रेसिडेंसी का दूसरा सबसे बड़ा शहर अहमदाबाद था, और काफीं लम्बे समय से कमर्शियल स्थापित सेंटर था। उस समय अंग्रेजों के शासन में अहमदाबाद शहर में कपास उद्योग का काफीं विकास हुआ था। 20वीं सदी में यह उस समय का एक आधुनिक औद्योगिक शहर बन गया। यह सत्याग्रह अहमदाबाद की एक सूती मिल के मजदूरों ने किया था, जिसके लिए वे गांधी जी से प्रेरित थे। दरअसल, 1917 में गुजरात में प्लेग की महामारी फैली थी, जिसके चलते कई मिल मालिकों ने प्लेग बोनस देने का फैसला किया था। लेकिन तब मिल मालिकों ने कर्मचारियों को बोनस देने से मना कर दिया। सभी कर्मचारियों ने 50% वेतन वृद्धि की मांग की। लेकिन मिल मालिक केवल 20% वेतन वृद्धि का भुगतान करने को तैयार थे। इसके लिए मार्च 1918 में मिल के मजदूरों ने अपनी मजदूरी का विरोध किया। गांधीजी ने उन्हें इसके लिए हिंसा का सहारा न लेने की सलाह दी और इसके लिए हड़ताल करने को कहा। इस दौरान गांधी जी ने अनशन भी किया। यह विद्रोह 21 दिनों तक चला। इसके बाद मिल मालिकों ने उनकी मांग पूरी की और मजदूरों के वेतन में 35 फीसदी की बढ़ोतरी कर उन्हें राहत दी गई. इस प्रकार यह सत्याग्रह चलता रहा।

खेड़ा सत्याग्रह सं. 1918 (Kheda Satyagraha – 1918)

उस टायम चंपारण सत्याग्रह का विद्रोह चल रहां था। चंपारण विद्रोह के ख़तम हो जाने के बाद करीबन उसके 1 साल में ही किसानो पर हुई तकलीफों को कम करने के लिए एक और महत्वपूर्ण सत्याग्रह किया गया। यह सत्याग्रह खेड़ा सत्याग्रह के नाम से प्रचलित हुआ, जिसको भारत के गुजरात राज्य में खेडा जिल्ले में इसका आरंभ किया गया था। खेडा जिल्ले के किसानों को सभी तरह का सहकार देने के लिए महात्मा गाँधी जी का यह तीसरा महत्वपूर्ण सत्याग्रह था।दरसल खेड़ा जिले के लोग फसल खराब होने और प्लेग रोग फैलने से बहुत परेशान थे और अंग्रेजों द्वारा उनसे उच्च कर वसूला जा रहा था जिसे किसान चुकाने में असमर्थ थे। साथ ही अंग्रेजों ने किसानों को चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने कर नहीं दिया तो उनकी जमीन उनसे छीन ली जाएगी। तब गांधीजी और सरदार वल्लभभाई पटेल सहित उनके कुछ सहयोगियों ने एक बड़ा विद्रोह किया और इस दरमियान खेड़ा सत्याग्रह शुरू किया।

खेड़ा में वल्लभभाई और उनके साथियों ने किसानों से इस समस्या को देखते हुए एक याचिका पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया, जिसमें लिखा था कि ‘वे इस कर का भुगतान करने में असमर्थ हैं क्योंकि उनकी फसल अच्छी नहीं है, लेकिन सरकार इस पर कार्रवाई करेगी। बेशक, हम यह कर सकते हैं और हम हर परेशानी और दुख को सहने के लिए तैयार हैं।’ सभी किसानों ने इसका समर्थन किया और याचिका पर हस्ताक्षर किए। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह हिंसा नहीं चाहता था। दूसरी ओर अंग्रेजों ने किसानों की संपत्ति, जमीन और आजीविका को जब्त कर लिया था और साथ ही उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया था। लेकिन फिर भी किसान पीछे नहीं रहे और उन्होंने वल्लभ भाई पटेल और गांधी जी का ही समर्थन किया।

किसान गिरफ्तारी के लिए राजी हो गए और इसके लिए हिंसा भी नहीं की। गुजरात के अन्य हिस्सों से भी लोग इन किसानों की मदद के लिए आगे आए। आखिरकार सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और उन्होंने कर की रकम कम कर दी, साथ ही जब्त की गई संपत्ति को वापस कर दिया। साथ ही जिन लोगों ने जब्त जमीन खरीदी थी, उन्हें भी वापस करने के लिए दबाव डाला गया। और इस तरह यह सत्याग्रह एकता का अद्भुत प्रतीक बन गया।

रोलेट सत्याग्रह सं. 1919 (Rowlatt Satyagraha – 1919)

1919 में, ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित किया, जिसमें लोगों को केवल अंग्रेजों के खिलाफ आतंकवाद करने के संदेह के आधार पर कैद किया गया था। इस अधिनियम ने लोगों की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा दिया और पुलिस की शक्तियों को मजबूत किया। तब गांधीजी और मोहम्मद अली जिन्ना सहित अन्य लोगों ने इसका विरोध किया। 6 अप्रैल 1919 को इस अधिनियम का अहिंसक तरीके से विरोध शुरू हो गया। यहीं से इस तरह के अन्याय के खिलाफ रॉलेट सत्याग्रह की शुरुआत हुई थी। इसके बाद इस अधिनियम के खिलाफ पूरे भारत में सत्याग्रह की सभाएं की गईं। इस सत्याग्रह में पूरे भारत के लोगों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ने का मन बना लिया था। लेकिन अंग्रेजों ने इस सत्याग्रह को दबाने के लिए बेहद क्रूर तरीका अपनाया।

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13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में इस कृत्य का विरोध कर रहे लोगों के एक समूह पर ब्रिटिश सैनिकों ने सीधे गोलियां चला दीं। जिससे जलियांवाला बाग हत्याकांड ने पूरे देश को हैरान कर दिया था। इस दौरान लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई और इस घटना की भारतीय नेताओं ने कड़ी निंदा की। लेकिन यह सत्याग्रह भारतीयों को एक करने में सफल रहा। इस सत्याग्रह के दौरान, इसमें भाग लेने वाले लोगों ने यह सुनिश्चित करने का भी फैसला किया कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ इस लड़ाई में हिंदू और मुसलमान एकजुट हैं।

बारडोली सत्याग्रह सं. 1928 (Bardoli Satyagraha – 1928)

भारत के गुजरात राज्य में बारडोली सत्याग्रह भी किसानों के लिए ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ किया गया था। इस आंदोलन में सरदार वल्लभभाई पटेल ने मुख्य भूमिका निभाई और किसानों को उनका हक दिलाने में मदद की। यह आंदोलन किसानों से 30 प्रतिशत तक कर वसूली के खिलाफ किया गया था। दरअसल बारडोली में किसानों से 30 फीसदी तक टैक्स वसूलने का प्रावधान किया गया था. उस समय पूरा गुजरात राज्य बाढ़ और अकाल से पीड़ित था। ऐसे में टैक्स बढ़ने से महंगाई भी बढ़ गई है। इसलिए वल्लभभाई पटेल के साथ किसानों ने इसका कड़ा विरोध किया था। इस सत्याग्रह ने खेडुतों से बातचीत की और बाद में उन्हें इस सत्याग्रह के नतिजेके बारे में सारी जानकारी दी की किसानो की जमीनें जब्त कर ली जाएंगी और उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। जैसा कि खेड़ा सत्याग्रह में हुआ था। सभी किसानों ने मिलकर वल्लभभाई पटेल का समर्थन किया। वहां के लोगों ने वल्लभभाई पटेल को सरदार की उपाधि भी दी।

इस सत्याग्रह को महात्मा गांधी ने पटेल जी और बारडोली के किसान पर पूरी तरह से त्याग दिया था। अप्रैल और मई की तपिश में यह हलचल काफी तेज होती जा रही थी। इससे संबंधित एक पत्र सरदार जी ने सरकार को लिखा कि वे टैक्स कम करें। लेकिन बॉम्बे के गवर्नर ने इसे खारिज कर दिया। किसानों की जमीन को जब्त कर नीलाम कर दिया गया। लेकिन उनकी जब्त की गई जमीन को ज्यादा लोगों ने नहीं खरीदा। और कुछ समय बाद सरकार को किसानों की मांग पूरी करनी पड़ी और उन्होंने कर की रकम को कम कर दिया और इस तरह महात्मा गाँधी द्वारा यह  सत्याग्रह सफल हुआ।

नमक सत्याग्रह सं. 1930 (Salt Satyagraha – 1930)

नमक सत्याग्रह हम और आप दांडी मार्च या दांडी सत्याग्रह के नाम से भी पहचाना जाता है। यह सत्याग्रह मार्च के महीने में साल 1930 में महात्मा गांधी के मार्गदर्शन से भारत में शुरू किया गया एक बहुत बड़ा हानिहीन सत्याग्रह रहा था। यह गुजरात के समुद्र के तटीय गांव दांडी में समुद्र के पानी से नमक का उत्पादन कर नमक कानून को तोड़ने के लिए था। इस सत्याग्रह के लिए गांधी जी ने अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से 386 किमी पैदल चलकर दांडी यात्रा की शुरुआत की थी। इस यात्रा की शुरुआत में उनके साथ उनकी पत्नी और कुछ ही साथी थे, लेकिन रास्ते में सैकड़ों की संख्या में हजारों लोग इस यात्रा में शामिल हो गए। दांडी पहुंचने पर गांधी ने समुद्र से नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा था।

दरसल, नमक के निर्माण और बिक्री पर ब्रिटिश सरकार का एकाधिकार था। नमक अंग्रेजों ने अपनी मर्जी से थोपा था। जिससे भारतीय काफी परेशान थे। क्योंकि नमक किसी के भी जीवन के लिए बहुत जरूरी होता है। और ऐसे में उसका टैक्स बढ़ने के बाद लोग उसे खरीद नहीं पा रहे थे. इसके विरोध में यह सत्याग्रह किया गया था। गांधी ने कहा कि अंग्रेजों से नमक की खरीद पर भारी कर देने के बजाय, समुद्र से नमक मुफ्त में बनाया जा सकता था। इसीलिए महात्मा गांधी ने ब्रिटिश नमक नीतियों के खिलाफ लोगों को एकजुट करके नमक कानून तोड़ने के लिए दांडी सत्याग्रह किया। हालाँकि, ब्रिटिश अधिकारियों ने नमक के इस तरह के उत्पादन को अवैध माना और लोगों को इसे महंगे दामों पर खरीदने के लिए मजबूर किया। साथ ही इस कानून को तोड़ने के लिए गांधी जी को जेल भी जाना पड़ा था। लेकिन फिर भी यह सत्याग्रह सफल रहा।

भारत छोड़ो आंदोलन सं. 1942 (Quit India Movement – 1942)

हमारे भारत देश में अंग्रेजों ने करीबन दो सो साल तक शासन किया था, और देखा जाये तो उस समय दरमियान हमारे देश में कई क्रांतिवीरों भी मौजूद थे, जिन्होंने अनपे बलिदान और त्याग से अंग्रेजो से गुलामी एवं अत्याचारों से छुटकारा दिलवाने में वह क्रांतिवीर ने अपनी जान तक की बाजी लगादी थी और कई ने अपनी जान की कुर्बानी भी दी। आखिर कार हमारे इस क्रांतिवीरों की वजह से अंग्रेजो को भारत देश छोड़ कर जाना ही पड़ा और हमारे देश को आजादी देने में मजबूर होना हीं पड़ा। आजादी से कुछ साल पहले महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ कई आंदोलन चलाए गए थे। इन्हीं में से एक है ‘भारत छोड़ो आंदोलन‘, जो उस दौरान काफी रफ्तार पकड़ रहा था। हालांकि इस आंदोलन में कई बड़े उद्योगपतियों और अन्य समूहों ने विभिन्न कारणों से आंदोलन का समर्थन नहीं किया, और तत्काल स्वतंत्रता प्राप्त करने में इस आंदोलन का कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा। लेकिन साल 1947 में भारत की आजादी में इस आंदोलन का अहम योगदान रहा था।

Last Final Word: 

हमने आपको महात्मा गाँधी जी द्वारा किये गये सत्याग्रह आंदोलन के बारें में विस्तार से जानकारी इस आर्टिकल के माध्यम से दी है। इस तरह से गाँधी जी ने अलग अलग सत्याग्रह के माध्यम से हमारे भारत देश की आजादी में अपना अहम् योगदान दिया हैं, और आपको हम बतादें के यह सब गाँधी जी ने केवल अहिंसा और सत्य को अपना महत्वपूर्ण हथियार बना कर किया था।

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