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राजा राममोहन राय का जीवन परिचय

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भारत के इतिहास की बात करें तो पुराने समय में भारत में कई सारी परंपरा और रीति रिवाज हुआ करते थे। भारत पहले से ही अपनी परंपराओं के लिए और अपनी संस्कृति के लिए जाना चाहता है। परंतु पुराने समय में कई सारे कुरिवाज समाज में फैले हुए थे। इन कुरिवाज के चलते कई सारे लोगों को परेशानी जेलनी पड़ती थी। ऐसे में सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कई सारे महान नेता ने अपनी आवाज उठाई। आज के इस लेख में हम ऐसे ही एक महान पुरुष राजा राममोहन राय के बारे में जानकारी प्राप्त करेगे। उम्मीद है आप इस लेख को ध्यान से पड़ेगे ताकि आपको राजा राममोहन राई के बारे में और उनके जीवन प्रणाली के बारे में जानकारी मिल शके।

आधुनिक भारत और बंगाल के नवयुग का स्थापन करने का संपूर्ण श्रेय राजा राम मोहन राय को जाता है। राजा राममोहन राय ने सदियों से चलती आई हिंदू परंपराए और उसकी वजह से होने वाली परेशानी के लिए अपनी आवाज़ उठाई। इस परंपरा से सबसे ज्यादा महिलाओं को परेशानी उठानी पड़ती थी। इसी लिए इन परंपराओं  को तोड़कर महिलाओं और समाज के लोगों के लिए कई सारे समाजिक कार्यों को करने की शुरुआत की थी। राजा राम मोहन राय ने भारत के इतिहास की सबसे बड़ी कुप्रथा सती प्रथा के विरुद्ध में सबसे पहले अपनी आवाज उठाई और इस परंपरा के खिलाफ अपना विरोध प्रकट किया। इन सबके अलावा राजा राममोहन राय ने कई सारे कार्य किए हैं, जिसकी वजह से आज भी भारत के लोगों के मन में उनके प्रति सम्मान की भावना है। राजा राम मोहनराय एक महान शिक्षा देने वाले व्यक्ति के साथ साथ अच्छे विचारक और प्रवर्तक भी थे। वह कोलकाता में स्थित एकवेश्वर संगठन के कार्यकर्ता भी थे। जीस वक्त भारतीय संस्कृति और भाषा को सम्मान दिया जाता था, उस वक्त राजा राममोहन राय ने इंग्लिश, विज्ञान, वेस्टर्न मेडिसिन और टेक्नोलॉजी जैसे विषयों में शिक्षा प्राप्त की थी।

नाम (Name)राजा राममोहन राय
जन्म दिन (Birth Date)22 मई 1772
जन्म स्थान (Birth Place)बंगाल के हूगली जिले के में राधानगर गाँव
पिता (Father)रामकंतो रॉय
माता (Mother)तैरिनी
पेशा (Occupation)ईस्ट इंडिया कम्पनी में कार्य,जमीदारी और सामाजिक क्रान्ति के प्रणेता
प्रसिद्धि (Famous for)सती प्रथा,बाल विवाह,बहु विवाह का विरोध
पत्रिकाएं (Magazines)ब्रह्मोनिकल पत्रिका, संबाद कौमुडियान्द मिरत-उल-अकबर
उपलब्धि (Achievements)इनके प्रयासों से 1829 में सती प्रथा पर क़ानूनी रोक लग गई
विवाद (Controversy)हमेशा से हिन्दू धर्ममें अंध विशवास और  कुरीतियों के विरोधी रहे
मृत्यु (Death)27 सितम्बर 1833 को ब्रिस्टल के पास स्टाप्लेटोन में
मृत्यु का कारण (Cause of death)मेनिन्जाईटिस
सम्मान (Awards)मुगल महाराजा  ने उन्हें राजा की उपाधि दी फ्रेंच Société Asiatique ने संस्कृत में के अनुवाद उन्हें 1824 में सम्मानित किया

राजा राममोहन राय का जन्म और उनका परिवार (Birth and family of Raja Ram Mohan Roy)

उनका जन्म साल 1772 में 22 मई  दिन बंगाल में स्थित हुगली जिले के राधानगर गाव में उत्साह के साथ हुआ था। पिता का नाम रामकतो जी था और माता का नाम तैरिनी जी था। राजा राममोहन राय का जन्म वैष्णव धर्म का आचरण करने वाले परिवार में हुआ था। उनके परिवार में सभी लोग धर्म से जुडि बातों के लिए कट्टर थे।

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राजा राममोहन राय की शादी छोटी उम्र में हो चुकी थी। वे जब 9 साल के थे तभी उनकी पहेली शादी हो चुकी थी। परंतु उनकी पहली पत्नी का थोड़ी समय में देहांत हो गया था। इसके पश्चात 10 साल की उम्र में उन्होंने दोबारा शादी की थी।  इस शादी से उनको 2 बेटे हुए। साल 1826 में उनकी दूसरी पत्नी ने भी अपने प्राण त्याग दिए। उनकी तीसरी पत्नी भी ज्यादा वक्त तक जीवित नहीं रही, उनका भी देहांत हो गया था।

राजा राममोहन राय की शिक्षा (Education of Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय इतने विद्वान थे कि उन्होंने केवल 15 साल की उम्र में बंगाल, पर्शियन, अरेबिक और संस्कृत जैसी भाषाओं को सीख लिया था। राजा राममोहन राय ने अपने गांव की स्कूल में से संस्कृत और बंगाली भाषा की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की थी। अरेबिक और पर्शियन भाषा उन्होंने पटना में स्थित मदसरे में सीखी थी। इंग्लिश भाषा की शिक्षा उन्होंने 22 साल की उम्र में प्राप्त की थी। संस्कृत भाषा सीखने के लिए वे काशी गए थे। काशी में जाकर उन्होंने वेदों एवम उपनिषदों का अध्ययन भी करना सरु कर दिया था। इन सबके अलावा बायबल और साथ ही कुरान तथा इस्लामीक ग्रंथों को भी पड़ा था ।

राजा राममोहन राय का प्रारंभिक जीवन (The early life of Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय उन सभी हिंदू पूजा और परंपराओं के विरुद्ध में थे जिसकी वजह से समाज में कुरीतियों और अंधविश्वास का फैलावा हो रहा था। हालाकि उनके पिताजी अपने धर्म और परंपराओं का कट्टर पालन करने वाले वैष्णव धर्म के ब्राह्मण थे। राजा राममोहन राय को संन्यास लेने की  इच्छा 14 साल की उम्र में हुई थी, परंतु उनकी मां ने साफ माना कर दिया था।

राजा राममोहन राय और उनके पिताजी के बीच में मतभेद होने का मुख्य कारण राजा राममोहन राय का भारत की परंपराओं के विरुद्ध अपनी आवाज उठाना और धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध लोगों को सही संकेत देना ने के कार्य से बढ़ गया था। उन दोनों के बीच झगड़ा बढ़ने लगा था, जिसकी वजह से राजा राममोहन राय ने अपने घर को त्याग करने का फैसला ले लिया, और हिमालय की तरफ जाकर स्थित हो गए।

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राजा राममोहन राय ने घर आने से पहले भारत के विभन्न प्रदेशो में जाकर भ्रमण किया। साथ ही सत्य को भी जाना। इस घटना के कारण उनके मन में धर्म के प्रति जिज्ञासा बढ़ने लगी थी, परंतु वह घर वापस आ गए थे।

उनके परिवार का मानना था कि उनकी शादी करवा देने से उनके विचारों में बदलाव आ जाएगा, लेकिन उनकी सोच गलत साबित हुई वैवाहिक और विवाह की जिम्मेदारी की वजह से कभी उनके विचारों में  बदलाव नहीं आया।

शादी के पश्चात भी उन्होंने उपनिषद और हिंदू दर्शनशास्त्र की शिक्षा वाराणसी में जाकर प्राप्त की,परंतु उनके पिता की मृत्यु होते ही साल 1803 में वे मुर्शिदाबाद वापिस आ गए।

राजा राममोहन राय का करियर (Raja Ram Mohan Roy’s career)

अपने पिता के मृत्यु के बाद राजा राममोहन राय कोलकाता में ही जमीदार का काम करने लगे। साल 1805 में इस्ट इंडिया कंपनी के छोटे से पद के अधिकारी जॉन दिगबोई ने उन्हें पश्चिमी विस्तार कि सभ्यता और उनके साहित्य से उनका परिचय करवाया। 10 साल तक राजा राममोहन राय ने दिगबाय के नीचे ईस्ट इंडियन कंपनी कार्य किया था।साल 1809 से साल 1814 तक उन्होंने स्टैंडर्ड कंपनी के रेवेन्यू डिपार्टमेंट में स्थान प्राप्त करके अपना कार्य किया था।

राजा राममोहन राय की वैचारिक क्रांति का सफर (Journey of Ideological Revolution of Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय ने साल 1803 में हिंदू धर्म और उनकी परंपरा में होने वाले कुरिवाजो और अंधविश्वास पर अपना विचार प्रकट कीए। राजा राममोहन राय ने एकेश्वरवाद के उपदेश का अनुमोदन किया जिसके आधार पर उन्होंने कहा कि ईश्वर ने ही सृष्टि का निर्माण किया है। इस विचार को समझाने के लिए वेद एवं उपनिषद  कि संस्कृत भाषा को उन्होंने बंगाली, हिंदी और इंग्लिश भाषा में अनुवाद करके सबको इसके बारे में बताया था। उन्होंने समझाया कि दुनिया में एक दैविक महाशक्ति है, जो मनुष्य की जानकारी के बाहर रह कर पूरे संसार को और ब्रह्मांड को चलाती है।

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राजा राममोहन राय ने 1814 में आत्मीय सभा की स्थापना की, उसका मुख्य उद्देश्य समाज में प्रचलित सामाजिक मुद्दों और धार्मिक बातों पर पूर्ण विचारधारना करके परिवर्तन को लाना था।
राजा राममोहन राय के द्वारा कीए गए कार्यों में सबसे बड़ा कार्य समाज में हो रहे महिलाओं के प्रति अत्याचार को बंद करवाना था। उन्होंने महिलाओं के अधिकार की रक्षा करने के लिए कई आंदोलन चलाए थे, जिसमें  में विधवा महिला के लिए और महिलाओं को जमीन से संबंधित हक दिलाना मुख्य स्थान पर रहा था। राजा राममोहन राय के मन में यह विचार तब प्रगट हुआ, जब उनकी पत्नी की बहन सती हो रही थी। इस घटना को देखकर उनके मन में बहुत धृणा पैदा हुई, और उन्होंने सती प्रथा का कठोर विरोध  प्रकट किया। साथ ही साथ उन्होंने बाल विवाह और एक से ज्यादा विवाह के खिलाफ भी अपना विरोध प्रकट किया।

उन्होंने समाज के लिए शिक्षा को महत्वपूर्ण मानकर महिलाओं की शिक्षा के पक्ष कई सारे कार्य किए। उन  के हिसाब से इंग्लिश भाषा भारतीय भाषाओं से ज्यादा समृद्ध भाषा है।

सरकारी स्कूलों को मिलने वाला सरकारी फंड जो संस्कृत भाषा के लिए मिलता था, उसके खिलाफ अपना विरोध जाहिर किया।  साल 1822 में उन्होंने एक नई इंग्लिश मीडियम स्कूल की शुरुआत करवाई। राजा राममोहन राय के द्वारा ब्रह्म समाज की स्थापना साल 1828 में की गई थी इस संस्थान के द्वारा वह धार्मिक ढोंग करने वाले लोग और समाज में कृष्चेनिती के बढ़ रहे प्रभाव को देखना और उसे समझना चाहते थे। साल
1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया। उस समय राजा राममोहन राय के सती प्रथा के विरुद्ध किए जाने वाले आंदोलन को सफलता मिल गई।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में कार्य करते हुए इस नतीजे पर पहुंचे कि वेदांत के सिद्धांतों और उपदेशों को वापीस परिभाषित करने की जरूरत हो गई है। उनका उद्देश्य पश्चिमी एवं भारतीय संस्कृति का संगम कराना था।

ब्रिटिश हुकूमत के रहते सामाजिक और आर्थिक समस्या के कारण भारत कई सारी परेशानियों से जूझ रहा था, ऐसे वक्त में राजा राममोहन राय ने अपना योगदान दिए थे जो नीचे बताई गए है।

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राजा राममोहन राय का शैक्षणिक योगदान (Educational Contribution of Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय ने English medium school की स्थापना के साथ साथ कोलकाता शहर में हिंदू कॉलेज की स्थापना भी की थी। समय रहते हिंदू कॉलेज देश का सबसे बड़ा शैक्षणिक संगठन मैं बदल गया था। राजा राममोहन राय ने विज्ञान के साथ संबंधित विषयों जैसे कि भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान को आगे लाने के लिए प्रोत्साहित किया था। उनका मानना था कि देश का नव युवा और सभी बच्चे कुछ ना कुछ तकनीकी माहिती प्राप्त करे, इसके लिए यदि इंग्लिश पढ़ना पड़े तो भी बेहतर  होगा।

साल 1815 में शिक्षा के क्षेत्र को आगे लाने के लिए  कलकत्ता गए थे। उनके हिसाब से यदि भारत के लोगों को गणित, जियोग्राफी तथा लेटिन भाषा की शिक्षा नहीं प्राप्त होगी तो भारत देश पीछे रह जाएगा। सरकार ने उनके विचार पर अपनी अनुमति दे दी। हालांकि उनकी मृत्यु होने तक इसका अमल नहीं हो पाया था। उन्होंने सबसे पहले अपनी मातृ भाषा के विकास लिए कार्य किया था। उनके द्वारा रचित गुडिया व्याकरण बंगाली भाषा के साहित्य की अनुपम रचना है।

राजा राममोहन राय के सामाजिक सुधार (Social Reforms of Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय और सती प्रथा (Raja Ram Mohan Roy and the practice of Sati)

उस समय भारत में हर जगह सती प्रथा का प्रचलन फैल चुका था। ऐसे हालत में राजा राममोहन राय ने अपने कठोर प्रयास से गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने उनका समर्थन करते हुए सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के लिए सहायता की थी। उन्होंने बंगाल में सती  रेगुलेशन 17 को साल 1829 में बंगाल में कोड को पास किया था। जिसके आधार पर बंगाल में सती प्रथा पर रोक लगाकर सती प्रथा को कानूनी तौर पर अपराध घोषित कर दिया था।

क्या थी सती प्रथा?

सती प्रथा में कुछ इस प्रकार की क्रिया होती है। अगर किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी पत्नी को भी उसकी चिता के साथ जला दिया जाता है। इस प्रक्रिया में चिता पर बैठने वाली महिला को सती कहा जाता था। सती प्रथा की शरुआत भारत के विभिन्न क्षेत्रो ने अलग अलग कारणों को देखते हुए की गई थी।

सती प्रथा का सबसे ज्यादा प्रभाव 18वी सदी में हुआ था। इस कुप्रथा को ब्राह्मण और अन्य सवर्णों के द्वारा फैलाया गया था। राजा राम मोहन राय सती प्रथा का विरोध करने के लिए इंग्लैंड के सर्वोच्च न्यायायलय में जाकर इस प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए अपनी गवाही दी।

मूर्ति पूजा का विरोध

राजा राममोहन राय ने मूर्ति पूजा के प्रति भी अपना विरोध प्रगट किया था। साथ ही एकेश्वरवाद के पक्ष में भी अपने विचारो को प्रगट किया। राजा राममोहन राय ने क्रिश्चयन लोगो के द्वारा फैली हुए “ट्रिनीटेरिएस्म” मान्यता के खिलाफ भी अपना विरोध जाहिर किया। क्रिश्चयन मान्यता के अंतर्गत भगवान 3 व्यक्तियों में ही होता हैं 1:गॉड, 2:सन(पुत्र) तीसरा जीसस और होली स्पिरिट।

उन्होंने अलग अलग साम्प्रदाय के धर्मों की पूजापाट करने की रित और बहुदेव वाद के प्रति अपना विरोध किया। राजा राममोहन राय के हिसाब से एक ही भगवान हैं और इस बात के लिए वे पक्षधर थे। वे चाहते थे की लोगो में तर्क शक्ति और विवेक का विकसित हो। अपना पक्ष रखते हुए उन्हों ने कहा की: “मैंने पूरे देश के दूरस्थ इलाकों का भ्रमण किया हैं, और मैंने देखा कि सभी लोग ये विश्वास करते हैं एक ही भगवान हैं जिससे दुनिया चलती हैं”
इस के बाद उन्हों ने आत्मीय सभा की स्थापना की। आत्मीय सभा का उपदेश धर्म और दर्शन शास्त्र पर महान विद्वान पंडितो से चर्चा करना था।

महिलाओ की वैचारिक स्वतंत्रता (Women Liberty)

राजा राममोहन रॉय ने महिलाओं को स्वतंत्रता दिलाने के लिए वकालत का काम भी किया था। वह समाज के बिच में स्त्री को उपयुक्त दरज्जा देने के पक्ष में थे। सती प्रथा जैसी कुप्रथा के विरोध के के साथ साथ उन्होंने विधवा महिला के विवाह करने के पक्ष में भी अपने विचार प्रगट करते हुए अपनी आवाज़ उठाई। उनके मुताबिक बालिकाओ को भी समान रूप से बालको के जितने अधिकार मिलने चाहिए। राजा राममोहन रॉय इसके लिए ब्रिटिश हुकूमत को भी चलित कानून में सुधारा करने के लिए अनुरोध किया। उन्होंने महिला को शिक्षा प्रदान करने के लिए भी अपनी आवाज़ उठाई थी। जिसके लिए उन्होंने स्त्रिओ को स्वतंत्र रूप से विचार करने के लिए और अपने हक़ और अधिकारों की सुरक्षा करने के लिए उनमे आत्मविश्वास की जगाया।

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जातिवाद का विरोध (Opposition to Caste System)

उस दौरान भारत के समाज में जातिवाद सभी तरह से खराब हो गया था। जातिवाद अब कर्म के आधार पर ना होते हुए वर्ण के आधार पर चला गया था। तब से लेकर आज तक यह जातिवाद भारत में फैला हुआ है। परन्तु जातिवाद के कारण होने वाली असमानता को दूर करने के लिए राजा राममोहन रॉय ने आपनी अवज़ उठाई। उनके हिसाब से यहाँ हर कोई परम पिता इश्वर के बेटे बेटिया है और उन्हों ने अपने सभी मनुष्य बिना किसी भेद भाव के बगैर सामान रूप से बनाया है। समाज मे फैली हुइ एक दुसरे के प्रति घृणा और शत्रुता को ख़त्म करना चाहिए। सभी मनुष्य को समान हक और अधिकार देने चाहिए। राजा राम मोहन के इस विरोध के लिए वे सभी की आँख में खटकने लगे थे।

वेस्टर्न शिक्षा की वकालत (Advocate of Western Education)

राजा राममोहन राय ने पहेले से ही कुरान, उपनिषद, वेद और बाइबल जैसे धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन करके उस पर अपनी मजबूत पकड़ थी बनाली थी। इन सबका अध्ययन करने से उनका दूसरी भाषा के प्रति खीचा चला जाना स्वाभाविक था। राजा राम मोहन इंग्लिश भाषा के द्वारा भारत के लोगो का विज्ञान की भाषा में वैचारिक और सामाजिक समृध्धि देख सकते थे।

राजा राममोहन राय के वक्त में जब प्राचिविद और पश्चिमी संस्कृति की लड़ाई चल रही थी, तब उन्होंने इन दोनों के संगम के साथ आगे बढने कीअपनी इच्छा को प्रगट किया था। उन्होंने लोगो को भौतिक विज्ञानं, गणित, वनस्पतिशास्त्र और फिलोसफी जैसे विषयों का अध्ययन करने के साथ साथ वेदों और उपनिषदों का भी अध्ययन करने की बात पर ध्यान देने के बारे में और उनकी आवश्यकता के बारे में बताई।

राजा राममोहन राय ने लार्ड मेक्ले का भी साथ दिया था, जो हिंदुस्तान की शिक्षा की प्रणाली को परिवर्तित करके इंग्लिश भाषा को डाल ना चाहते थे। उनका मगसद हिंदुस्तान को समृध्धि की और ले जाना था। साल 1835 में भारत में English Education System प्रचलित हुई। राजा राममोहन राय English Education System के प्रचलन को देखने के लिए जीवित नहीं रहे थे। परन्तु इसके प्रति सकारात्मक कदम उठाने में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा है।

भारतीय पत्रकारिता के जनक (Father of Indian Journalism)

हिंदुस्तान में पत्रकारिता के प्रचलन के लिए उन्होंने सबसे बड़ा योगदान दिया है। राजा राममोहन राय अपने संपादन में भारत की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक तथा दूसरी परेशानीयों को केंद्र में रखते थे। उनके प्रकाशित किये गए संपादन से लोगो में जागरूकता बढ़ गई। उनके संपादन का देश की जनता पर गहरा प्रभाव पडता था। वो अपने विचार को बंगाली भाषा और हिंदी भाषा के साथ साथ इंग्लिश में भी संपादित करते थे। उनके शब्द में तीक्ष्णता रहती थी। जिससे उनकी आवाज़ न केवल आम लोगो तक बल्कि ब्रिटिस सरकार तक भी पहुच जाती थी।

राजा राममोहन राय के द्वारा प्रकाशित किये गए लेख की तरीफ करते हुए रॉबर्ट रिचर्ड्स ने कहा है की “राममोहन का लेखन ऐसा हैं जो उन्हें अमर कर देगा,और भविष्य की पीढ़ी को ये हमेशा चोका देगा की एक ब्राह्मण और ब्रिटेन मूल के ना होते हुए भी वो इतनी बेहतरीन इंग्लिश भाषा में कैसे लिख सकते हैं”।

आर्थिक समस्याओं सम्बन्धित विचार (Economic Ideas)

आर्थिक क्षेत्र के विषय में राम मोहन के विचार स्वाधीन थे। वह हर सामान्य आदमी की संपत्ति की रक्षा करने के लिए सरकार के हस्ताक्षर चाहते थे। उनके लेख भी भारतीयों के खुदके पैतृक विरासत के अधिकारों की सुरक्षा पर होते थे। जिसके अलावा उन्होंने जमीनदार से किशानों के हित और अधिकार को बचाने के लिए भी सरकार के हस्ताक्षर की मांग की थी। राजा राममोहन राय को लार्ड कार्नवालिस द्वारा दिए गये 1973 परमानेंट सेटलमेंट से होने वाले खतरे के बारे में पता था। इसलिए वो ब्रिटिश हुकूमत से ये मांग कर रहे थे, कि वो किसानों को जमीं के मालिको से बचाए। उन्होंने जमीन से जुडी बाबतो में स्त्री के अधिकारों की सुरक्षा का भी समर्थन किया था।

अंतरराष्ट्रीयवाद के चैंपियन

रविन्द्रनाथ टैगो ने राम मोहन के बारे में बताया था कि ”राममोहन ही वो मनुष्य हैं जो कि आधुनिक युग को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। उनको मालूम था की एक आदर्श समाज का निर्माण स्वतंत्रता को छीन कर, या किसी का शोषण करने से नहीं होगा। आदर्श समाज का निर्माण देशवासी के बिच के भाईचारे और साथ मिलजुल कर एक दुसरे की स्वतंत्रता की हिफाजत करने से होगा। राममोहन सभी प्रचलित धर्म, मनुष्य की सभ्यता के विकास और आधुनिक युग में सभी लोगो की समानता के लिए पक्षधर थे।

राष्ट्रवाद के जनक (Nationalism)

राजा राममोहन ने सभी लोगो की राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए भी अपनी आवज़ उठाई थी। साल 1821 में उन्होंने J.S Buckingham को एक पत्र लिखा जो कलकता शहर के जर्नल के Editor थे। वे यूरोप और एशियन देशों की आज़ादी में विश्वास रखते हैं। चार्ल्स एक्स ने साल 1830 की जुलाई क्रान्ति में France पर अपना अधिकार कर लिया, तब राम मोहन की ख़ुशी मिली।

राजा राममोहन ने हिंदुस्तान की आज़ादी और उसके लिए ठोस कदम उठाने के बारे में भी कहा। इस वजह से ही उन्होंने साल 1826 में आये Jury act का भी विरोध किया। Jury act में धार्मिक विभेदों का कायदा बनाया था। राजा राममोहन राय ने इसके लिए जे-क्रावफोर्ड को एक पत्र भी लिखा था। उनके एक मित्र के आधार पर उस पत्र में उन्होंने लिखा कि “हिंदुस्तान जैसे देश में ये सम्भव नहीं कि आयरलैंड के जैसे यहाँ किसी की भी आवाज़ को दबादी जाए” इससे यह कहा जा सकता है की उन्होंने हिंदुस्तान में राष्ट्रवाद के लिए अपना पक्ष लिया था। इसके पश्यात अकबर के लिए उनका लंदन जाना राष्ट्रवाद का ही उदाहरण हैं।

सामजिक पुनर्गठन (Social Reconstruction)

उस वक्त बंगाली समाज बहुत सारी कुप्रथा का समाना कर रहा था। यह भी सच हैं कि हिंदुस्तान में उस वक्त सबसे ज्यादा शिक्षित और समृध्ध समाज में बंगाली वर्ग का समावेश होता था। उस वक्त साहित्य और संस्कृतियों के संगम का युग था, जिसमें बंगाली वर्ग दुसरे वर्ग से सबसे ज्यादा आगे रहता था। इसके बावजूद बंगाली वर्ग में अंधविश्वास और कुप्रथा भी थी, जिसने लोगो के मन में गहरी जड़ों के माफिक अपनी जगह बना ली थी। जिसकी वजह से ही राजा राममोहन राय ने समाज के सामाजिक-धार्मिक रीतो को सम्पूर्णरूप से बदलाव लाने के लिए मन बनाया। उन्हों ने इसी दिशा में आगे जाकर ना सिर्फ ब्रह्मण समाज और एकेश्वरवाद जैसे सिद्धांत का निर्माण किया बल्कि सती प्रथा, बाल विवाह, जातिवाद, दहेज़ प्रथा, बिमारी का इलाज और बहुविवाह जैसी कुप्रथा के खिलाफ भी लोगो में जागृति की फैलाई।

राजा राममोहन राय द्वारा लिखे गए पुस्तक (books written by Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय अपनी मेगेजिन को प्रकाशित किया था। इस मेगेजिन में इंग्लिश, हिंदी, पर्शियन और बंगाली भाषा का समावेश किया था। उन्होंने ने साल 1815 में ब्रम्ह्समाज की स्थापना की थी। जो ज्यादा वक्त तक नहीं चल पाया था। राजा राममोहन राय को क्रिश्च्निटी धर्म में भी रूचि उत्पन्न हो गयी थी। जिसके चलते उन्हों ने ओल्ड हरब्यू और न्यू टेस्टामेंटस को पढ़ा था।

राजा राममोहन राय ने साल 1820 में 4 गोस्पेल का एक अंश एथिकल टीचिंग ऑफ़ क्राइस्ट को प्रकाशित किया था। इस प्रकाशन का नाम उन्होंने प्रीसेप्ट्स ऑफ़ जीसस रखा था।

उनके समय अगर आपको कोई प्रकाशन को प्रकशित करना हो, तो आपको ब्रिटिश सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती थी। इस बात के राजा राममोहन राय खिलाफ थे, उनका कहना था की सच्चाई को किसी भी जरिये से लोगो को सामने लाने में कोई बाबंधी नहीं होनी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति सच्चाई को अख़बार के जरिये लोगो तक लाना चाहता है, तो ब्रिटिश हुकूमत को कोई अधिकार नहीं है की वह किसी बात को दबा सके। राजा राममोहन राय ने स्वतंत्रता के पक्षधर बनकर अनेक पत्रिकाए प्रकाशित की थी।

राजा राममोहन राय को कई सारे अनुवादन आए थे, जिसमे साल 1816 में इसोपनिषद के लिए, साल 1817 में कठोपनिषद के लिए और वर्ष 1819 में मुंदुक उपनिषद के लिए आवेदन आये थे। जिसके पश्चयात उनको गाइड टू पीस एंड हैप्पीनेस और एक बंगाली न्यूज पेपर सम्बाद कुमुदी में वर्ष 1821 में प्रकाशित किया था।

राजा राममोहन मिरत-उल-अकबर नाम के पर्शियन जर्नल को साल 1822 में लिखा था। साथ ही साथ उन्होंने साल 1826 मे गौडिया व्याकरण, वर्ष 1828 में ब्राह्मापोसना तथा वर्ष 1829 में ब्रहामसंगीत और वर्ष 1829 में दी युनिवर्सल रिलिजन को लिख कर प्रकशित किए थे।

राजा राम मोहन राय की मृत्यु (Death Of Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय साल 1830 में मुग़ल सम्राट अकबर द्वितीय के राजदूत बनकर यूनाइटेड किंगडम गए थे।

स्टाप्लेटोन में मेनिंजाईटिस की वजह से 27 सितम्बर 1833 के दिन ब्रिस्टल के पास उनकी मृत्यु हुई थी।

राजा राम मोहन राय को मिले हुए सम्मान

राजा राममोहन राय को राजा की उपाधि दिल्ली के मुग़ल सम्राट अकबर द्वितीय ने साल 1829 में दी थी। जब वे राजदूत बनकर इंग्लेंड गए थे, तब राजा विलियम चतुर्थ ने भी उनको सम्मानित किया था।

राजा राममोहन राय के द्वारा किए गए वेद तथा उपनिषद के संस्कृत भाषा से हिंदी, इंगलिश और बंगाली भाषा में अनुवाद के लिए साल 1824 में उनको फ्रेंच Société Asiatique के द्वारा सम्मानित किया गया था।

Last Final Word:

दोस्तों यह थी भारत के कुप्रथा के विरुध्ध खड़े होने वाले राजा राममोहन राय के बारे में जानकारी। हम उम्मीद करते है की आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आया होगा। यदि अभी भी आपके मन में कोई सवाल रह गया हो तो हमें कमेंट के माध्यम से बताइयेगा जरुर।

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