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पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट

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दोस्तों आज के इस महत्वपूर्ण आर्टिकल में हम आपसे बात करने वाले है पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट के इतिहास के बारे में, तो चलिए आगे बढ़ते है पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट आखिर क्या हुआ था। 750 से 1000 ईस्वी. के मध्य उत्तर भारत और डेक्कन में कई सारे शक्ति शाली साम्राज्य की वृद्धि हुई थी। जिसमे से महत्त्वपूर्ण राष्ट्र पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट थे इनमे से राष्ट्रकूट साम्राज्य एक ऐसा राष्ट्र था जो सबसे लंबे समय तक चलने वाला साम्राज्य था और उस समय का सबसे सर्वाधिक शक्तिशाली भी कहा जाता था। 750 ईस्वी. में गोपाल द्वारा पाल राजवंश की स्थापना की गयी थी और गोपाल इससे पहले एक मुखिया था लेकिन बाद में वह बंगाल का राजा बन गया था। देखा जाये तो बंगाल के गोपाल राजा पहले बौद्ध राजा थे। गौढ़ राजवंश ने उनके गढ़ कामरूप में पराजित करके उसने अपना शासन स्थापित किया था।

मध्य उत्तर भारत और देक्कन में 750-1000 ईस्वी. में कई शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित हुए, जिनमे पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट यह प्रान्त सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली थे।

पाल (PAAL)

ईस्वी. 750 में गोपाल द्वारा पाल राजवंश की स्थापना की गयी थी और पाल राजवंशी के स्थापक गोपाल पहले एक मुखिया थे लेकिन उसके बाद में वह बंगाल का राजा बन गया था। देखा जाये तो बंगाल के गोपाल राजा पहले बौद्ध राजा बने थे। बौद्ध राजा गोपाल ने अपना प्रभुत्व तब स्थापित किया जब गौड़ राजवंश को उनके गढ़ कामरूप में पराजित किया था। जब गोपाल राजा की मृत्यु हुई थी तब बंगाल और बिहार के कई सारे हिस्से उनके नियंत्रण में थे। बादमे गोपाल ने बिहार के ओदंतपुरी में एक मठ का निर्माण किया था जो उसका सब श्रेय गोपाल को जाता है। धर्मपाल को गोपाल का उत्तराधिकारी बनने का पद मिला था। धर्मपाल ने ईस्वी. 770 से 810 की अवधि के दौरान शासन किया था। उसके शासनकाल के दौरान पाल साम्राज्य उत्तर और पूर्वी भारत में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बन गया।  उन्होंने गुर्जर प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों के खिलाफ एक लंबा युद्ध लड़ा। गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय के खिलाफ अपनी अपमानजनक हार के बावजूद, वह पाल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को बचाने में सक्षम था और पूरे बंगाल और बिहार में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। एक प्रसिद्ध बौद्ध राजा धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की जो भारत में बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए एक प्रसिद्ध केंद्र था। यह विश्वविद्यालय बिहार के कहलगांव, भागलपुर में स्थित है।

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देवपाल धर्मपाल का उत्तरा अधिकारी था। देवपाल ने अपना साम्राज्य को समृद्ध असम, ओडिशा और कामरूप तक बढाया था। उसके शासनकाल के दौरान पाल सेनाओं ने एक बहुत ही सफल अभियान चलाया था।

देखा जाये तो देवपाल के बाद सिंहासन पर ऐसे राजा का आगमन हुआ के वह बहुत ही कम प्रख्यात हुए थे या फिर यह भी कह सकते है की वह बहुत ही कम जाने जाते थे। इसके बाद महिपाल पाल साम्राज्य का राजा बना। उसने 995 ई. से 1043 ई. तक शासन किया। उसको पाल वंश के दूसरे संस्थापक के रूप में जाना जाता था, उन्होंने पाल साम्राज्य के सभी खोए हुए क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया। महिपाल के निकटतम वारिस बहुत ही कमजोर थे और उसके साम्राज्य पर वह अपनी पकड़ को अखंड बनाकर नहीं रख सके थे।

प्रतिहार (Pratihara)

6 वीं शताब्दी ईस्वी. में राजा हरीचंद्र द्वारा गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना की गयी थी। राजा हरिचंद्र 11 वीं सदी तक ही अपने साम्राज्य के प्रभावशाली राजा बने रहे थे। इस राजा हरिचंद्र के बारे में यह कहा जाता है, की उनकी उत्पति उज्जैन या मंदसौर से हुई थी। इस वंश का पहला और महत्वपूर्ण शासक नागभट्ट-प्रथम था। नागभट्ट ने 730 ईस्वी. से 756 ईस्वी. तक अपना शासन जमाये रखा था। नागभट्ट के साम्राज्य में ग्वालियर, भरूच और मालवा भी शामिल थे। नागभट्ट के साम्राज्य की राजधानी अवनि थी।

नागभट्ट प्रथम की उपलब्धि: राजा नागभट्ट के जुनैद, अरब कमांडर और उसके उत्तराधिकारी तमिन को राजस्थान के युद्ध में पराजित कर दिया था। इसे नागभट्ट को सफलतापूर्वक अरब आक्रमण के खीलाफ पश्चिमी सीमाओं की रक्षा की और उसका बचाव भी किया था। वत्सराज नागभट्ट प्रथम के बाद एक नए राजा के रूप में सफल हुए और पाल राजा धर्मपाल को हराकर उन्होंने कन्नौज पर अधिकार स्थापित किया था।

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नागभट्ट द्व्रितीय 805 ईस्वी. के आसपास राजा वत्सराज को पराजित करके उनका उत्तराधिकारी बन गया था। हकिकत में, नागभट्ट द्व्रितीय गुर्जर प्रतिहार राजवंश का सबसे नामी चीन राजा था। राजा नागभट्ट द्व्रितीय को उसे अधिक 815 ईस्वी. को सोमनाथ के मंदिर को पुननिर्माण के लिए जाना जाता है। इस सोमनाथ मंदिर को 725 ईस्वी. में जुनायड की अरब सेनाओं ने नष्ट कर दिया गया था। मिहिरभोज को इस वंश का अन्य मुख्य राजा कहा जाता है।

मिहिरभोज यह वंश का अन्य मुख्य राजा था। मिहिरभोज राजा का शासनकाल 885 ईस्वी. तक चला था। मिहिरभोज राजा ने एक महान साम्राज्य का निर्माण किया था। मिहिरभोज ने युद्ध की एक श्रेणीबद्धता (अनुक्रम) के आधारित में विजय प्राप्त किया था और उसके बाद उसने गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे कई प्रदेशो पर उसने युद्ध करके उसमे कब्ज़ा कर लिया था।

राष्ट्रकूट (Rashtrakut)

राष्ट्रकूट कन्नड़ मूल के राजा थे और उनकी मातृभाषा कन्नड़ थी। 8 वीं सदी में दन्तिदुर्ग द्वारा राष्ट्रकूट वंश की स्थापना की गयी थी। दन्तिदुर्ग ने डेक्कन में राष्ट्रकूट को एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसने गुर्जरों को हराकर मालवा पर विजय प्राप्त की। उसने कीर्तिवर्मन द्वितीय को भी हराया और चालुक्य साम्राज्य पर आधिपत्य स्थापित किया। उनके उत्तराधिकारी कृष्ण प्रथम थे जो एक महान साम्राज्य निर्माता थे। कृष्ण प्रथम ने पूर्वी चालुक्यों और वेंगी की गंगा के खिलाफ जीत हासिल की थी। उन्हें एलोरा की चट्टानों को काटकर विशाल कैलाश मंदिर के निर्माण के लिए जाना जाता है। उनके उत्तराधिकारी गोविंदा तीसरे थे।

अमोधवर्ष (प्रतिकूल) प्रथम 815 से 880 ईस्वी. गोविंदा तीसरे का उत्तराधिकारी बना जिसका शासनकाल अपने सांस्कृतिक विकास के लिए लोकप्रिय बना था। गोविंदा तीसरे ने जैन धर्म का पालन किया था। गोविंदा तीसरे ने कन्नड़ भाषा में लिखी गई एक बहुत ही प्रख्यात पुस्तक कविराजमार्ग के लेखक भी थे। गोविंदा तीसरे राष्ट्रकूट की राजधानी मलखेड या मान्याखेड़ के वास्तुकार भी थे।

936 से 968 ईस्वी. में अमोधवर्ष प्रथम का उत्तराधिकारी कृष्ण तृतीय बना था। कृष्ण तृतीय ने पड़ोसी राज्यों के खिलाफ युद्ध करके अपनी व्यवस्थित सैनिक कार्यवाही के लिए बहुत ही प्रख्यात हुआ था। कृष्ण तीसरे ने तक्कोतम में चोलों के खिलाफ युद्ध का आगमन करके विजयी प्राप्त की थी।

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कृष्ण तीसरे ने तंजौर के साथ युद्ध करके हासिल किया उसके बाद कृष्ण तृतीय ने रामेश्वरम पर भी आक्रमण किया और उस पर भी कब्ज़ा कर लिया था। अमोघवर्ष ने रामेश्वरम में कृष्णेश्वर मंदिर सहित कई मंदिरों का निर्माण भी किया था। जब कृष्ण तृतीय की मृत्यु हुई बादमे पुरे राष्ट्रकूट में उसकी शक्ति में कमी आई थी।

Last Final Word:

दोस्तों यहाँ आपके लिए पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट से जुडी सभी तरह की जानकारी दी गई है जिसकी मदद से आपको पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट की कसोटी की तैयारी में पूर्ण मदद मिलेंगी। आपको इस पोस्ट में दी गई जानकारी पसंद आई होगी और आपके सभी सवालों का जवाब मिल गया होगा। इसके बावजूद अगर आपके मन में कोई शंका या शुभ कामना है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट करके उसे दूर कर सकते हैं।

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