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मोहन जो दड़ो का इतिहास

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नमस्कार दोस्तों! मोहन जो दड़ो बहुत ही मशहूर जगह है। जो पाकिस्तान के सिंध प्रात में आती है, इस जगहे पर सिंधु संस्कृति के कुछ अवशेष पाए गए है। मोहन जो दडो दुनिया के सबसे पूरा ने शहर में से एक है। सिन्धु संस्कृति के शहर में मोहन जो दडो का नाम शामिल किया गया है, जहा आज से हजारो साल पहले स्वस्थ सभ्य एवं एक बहतर जीवन जी रहे थे। मोहन जो दडो विश्व की सबसे प्राचीनतम शहर में से एक है। सिंधु संस्कृति के मुख्य शहरो में मोहन जो दडो, लोथल, कालीबंग, धोलावीर और रखिगढ़ी आते है। तो हमारे आज के इस आर्टिकल में हम आपको सिंधु घाटी से जुड़े कुछ महत्व पूर्ण तथ्यों इसके विनाश के कारण बारे में बताएँगे।

मोहन जो दडो का मतलब सिंधी भाषा में ” मुर्दों का टीला” होता है, जो दक्षिण एशिया के सबसे पुराना शहर कहा गया है। योजनाबद्ध तरीके से बने इस शहर की खोज भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की गई थी। इसे हड़प्पा संस्कृति भी कहा जा सकता है।

मोहन जो दडो की सभ्यता और इतिहास 

मोहन जो दड़ो सिन्धु घाटी की सभ्यता का सबसे परिपक्क शहर है। मोहन जो दडो के नगर अवशेष सिंधु नदी के तट पर सक्खिर जिले में स्थित है। मोहन जो दडो का सही में शब्द का  उच्चार “मुअन जो दड़ो” होता है और इसकी खोज राखालदास बनर्जी ने 1921 इस्वी में की थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मार्शल के निर्दर्श पर खुदाई का कार्य शरु हुआ। इस जगह खुदाई के समय काफी मात्र  इमारते, मूर्तिया, सुंदर चित्रकारी, मिट्टी एवं धातु के बर्तन, तराशे हुए पत्थर,  जल कुंड, मजबूत दीवारे, और मोहरे मिले थे। जिसे यह बात पता चलती है, की यह शहर व्यवस्थित ढंग से बनाया हुआ था। 100 वर्ष में अब तक सिफ इस शहर के  एक तिहाई भाग की ही खुदाई हुई है, और वे अभी बन कर दी गई है। कहा जाता है, की यह शहर 125 हेक्टर में फेला हुआ था। तथा इसमें जल कुंड भी हुआ करते थे। यह पाकिस्तान के लरकना जिले में सिन्धु नदी के किनारे स्थित है।

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1856 में एक अंग्रेज इंजीनयर ने रेलोरोड़ बनाते समय इस प्राचीन सभ्यता की  खोज की थी रेलवे की ट्रैक बनाने के लिए यह इंजिनियर पत्थर की खोज कर रहा था जिससे वो गिट्टी बना सके यहाँ उन्हें बहुत मजबूत और पुराने ईंटे मिली थी, जो हुबहू आज के इंट जैसी थी, और वहा के आदमीं ने बताया की सबके घर इस इंट से ही बने है। जो उन्हें खुदाई के समय मिले थे, तब इंजिनियर को समज आ गया की यह जगह किसी प्राचीन शहर से जुडी है। इस इंजिनियर को सबसे पहले सिन्धु नदी के पास बसे इस सबसे पुराणी सभ्यता केबारे में पता चला और इसलिए इस सिन्धु घाटी की सभ्यता कहा जाता है। यह अपने आप में छुपी पहली की तरह है।

मोहन जो दडो के इतिहास एवं सभ्यता की विशेषता

  • पुरातत्व विभाग के द्वारा की गई खुदाई से मिले कुछ अवशेषों के आधार पर मोहन जो दडो का सिन्धु घाटी सभ्यता एवं इतिहास का सबसे विकसित और प्राचीनतम नगर का पता चला है।
  • खुदाई के दौरान यह मालूम पड़ा है की हजारो साल पहले वसा यह नगर योजनाबद्ध तरीके से बनाया गया था जहाँ पे लोग बेहद सभ्य और स्वस्थ तरीके से जीवन यापन करते थे।
  • मोहनं जो दडो नगर के अन्य विशेता ओ में से एक विशेषता यह भी थी की वहां के लोगो को गणित का ज्ञान था।
  • खुदाई के समय मिली गई सभी एक ही साइज की इटे थी इस से यह पता चलता है की प्राचीन काल के लोगो को भी मापन, जोड़ना, घटाना, सब आता था और सभी ईटे एक ही वजन और साइज की थी।
  • मोहन जो दडो खुदाई के समय मिले सबूतों के आधार पर यह मालूम पड़ता है की उस समय के लोगो को खेती की भी जानकारी अच्छी थी।
  • उस समय गेहूँ और दो मुख्य फसले भी थी जो खुदाई के समय काले गेहू मिले है, उन्हें उस समय के दौरान आज भी सभाल के रखा गया है।
  • पूरातत्व विभाग के कुछ खोजकर्ता का कहना है की प्राचीन काल के लोगो को आज के समय के वस्त्र पहने का ज्ञान था।
  • मोहन जो दडो जो विश्व की प्राचीन और विकसित सभ्यता औ मेसे एक है, वहाँ के  लोगो को धातु एवं सोने और चाँदी के गहने पहने का शोख था।
  • खुदाई के दौरान गर्म और सूती के वस्त्र भी मिले उसके हिसाब से उस समय के लोग मोसम के मुताबिक कपडे पहना करते थे।
  • आज की तरह ही उस समय विकसित थी  सिन्धु घाटी की सभ्यता प्राचीन काल के लोग यात्रा करने के लिए विभिन साधन जैसे भैसागाडी, बैलगाड़ी आदि का इस्तेमाल किया करते थे।
  • खुदाई के समय साबू, कंधी, क्रीम और दवाईया मिली है जिसे यह साबित होता है की उस समय के लोगो को फैशन आदि करने का ज्ञान था और उस दौरान चिकित्सक भी हुआ करते थे।
  • पुरातत्व विभाग को  कुछ ऐसे अवशेष मिले है जिसे यह पता चलता है की वहां के लोगो में आपस में प्रेम, भाईचारे और मिलजुल कर रहते थे और युद्ध का कोई नामु निशान नही था।
  •  सिन्धु घाटी की सभ्यता के प्राचीन शहर की सडको और गलियों में हम आज भी घूम सकते है।
  • इसके अलावा बहुत सी चित्रकारी, मुर्तिया, सिक्के,दिए, बर्तन, ओजार भी मिले थे जिहे विदेश के संग्राहलय में रख गया है
  • खुदाई के समय कुछ लिपिक भी मिली है जिसे यह साबित होता है की उस समय के लोगो पढने और लिखने का ज्ञान था।

मोहन जो दडो का प्रसिद्ध जल कुंड

सिन्धु घाटी की साभ्यता में देव मार्ग नामक गली में करीब 40 कूट लम्बा और 25 फुट चौड़ा प्रसिद्ध जल कुंद है किसकी गहराई 7 फुट है और इस कुंद में उतर और दक्षिण की और सीढिया है। इस कुंड के तिन तरफ बौद्धों के कक्ष है और इसकी उतर में 8 स्नान घर है यह कुंड काफी समजदारी से बनवाया गया हो ऐसा लगता है क्योकि की इस कुंड का द्वार किसी दुसरे के सामने नही खुलता है। यहाँ की इंट इतनी पकी है, की इसका कोई जवाब नही है कुंड में बाहर का अशुद्ध पानी न आए इस लिए कुंड को बनाते समय ईंटोकी दीवारों के ताल में चुने और चिरोडी का इस्तेमाल किया गया है दीवारों में डामर का इस्तेमाल किया गया है कूंड के पानी की व्यवस्थ के लिए दोहरे घेरे वाला कुआ बनाया गया है। कुंड के पानी को बाहर निकाल ने के लिए ईंटो के बिच नालिया भी बनवाई गई है और एक खासियत यह भी है की इस पक्की ईंटो से ढका गया था। इस यह प्रमाण होता है, की वे लोग इतने प्राचीन होने के बावजूद हमसे कम नही थे। सिन्धु घाटी की पहचान वहां की पक्की घुमर ईंटो से ढकी हुई नालियों से है, और यहाँ के पानी निकास का  ऐसा सुव्यवस्थित बंदोबस्त था, जो आज तक के लिखित इतिहास में नही मिलता है।

मोहन जो दड़ो के समय खेती कैसे होती थी?

सिन्धु घाटी सभ्यता के खुदाई के दौरान कुछ सबूतों मुताबिक उस समय यहाँ खेतिहर और पशुपालक सभ्यता रही होगी सिन्धु के पत्थर और राजस्थान के तंबो से बनाये गए उकरण यहाँ खेती करने के लिए काम में लिए जाते थे। इतिहासकार इरफ़ान हबीब केअनुसार यहाँ के लोग रबी की फसल बोते थे। गेहू, सरसों, कपास, जौ और चने की खेती के पुख्त साबुत खुदाई के समय मिले थे। कहा जाता है, की यहाँ और भी कई तरह की खेती की जाती थी, केवल कपास को छोड़कर सभी के बिज मिले है।  विश्व के सबसे पुराने दो सूत के कपड़ो में से एक का नमूना भी मिला है, यहाँ में खुदाई के समय वस्त्र के रंगाई का कारखाना भी मिला है।

मोहन जो दड़ो की नगर योजना 

सिन्धु घाटी की सभ्यता की इमारते भले ही खंडहरो में बदल चुकी हो लेकिन शहर की सडको और गल्यो के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए यह खंडहर काफी है। यहाँ की सड़के आदि सीधी है, और पूरब की बस्तिया रहिसो की है। क्योकि यह बस्तियो के घर बड़े है और चौड़ी सड़के एवं बहुत सारे कुए है। मोहन जो दड़ो की सडक इतनी बड़ी है, की यहाँ पे आराम से दो बैलगाड़ी निकाल सकती है यहाँ के मार्ग के दोनों और घर है, और खास बात तो यह है की यहाँ के घर के  द्वार सडको के सामने नही बल्कि गलियों में खुलते है। सडको पे केवल घरो की पीठ दिखाई पड़ती है। अगर कहा जाए तो मोहन जो दड़ो का शहर वास्तव में स्वस्थ के प्रति काबिले तारीफ है। क्योकि हमसे कई साल पीछे होने के बावजूद यहाँ की नगर नियोजन व्यवस्था है, वे बहुत ही कमाल की है। मोहन जो दड़ो में करीब 700 कुए थे और इतिहासकरो का कहना है की मोहन जो दड़ो सिंधु घाट सभ्यता में पहली संस्कृति है जो कुए खोद कर भू जल तक पहुची है। यहाँ की बेजोड़ पानी निकासी कुए, कुंड और नदियो को देखकर ऐसा कहा जा सकता है की मोहन जो दड़ो सभ्यता असल में जल संस्कृति थी।

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मोहन जो दड़ो महास्नाघर

महास्नाघर सिन्धु घाटी सभ्यता के प्राचीन नगर मोहन जो दड़ो में स्थित एक बहुत ही  प्रसिद्ध हौज है। यह मोहन जो दड़ो के उतर विभाग में स्थित है, और एक कुत्रिम टीले के उपर बनाया बया था। यह हौज 11.88 मीटर लम्बा और 7 मीटर चौड़ा है, और इस स्नाघर की महत्वपूर्ण बात यह है, की  इसमें उतरने के लिए एक सीधी उत्तर में और एक सीधी दक्षिण की तरफ बनाई गई है। इसका निर्माण भट्टी से निकाली गई पक्की ईंटो से किया गया है, और पानी को चने से रोकने के लिए चिनाई के मसाले और ईंटो के उपर डामर पार्ट की गई है। स्नाघर का क्या महत्व है? यह तो मालूम नही चला लेकिन इसको बनने में जो शक्ति और खर्च से अंदाजा लगाया जा सकता है, की यह मोहन जो दड़ो के लोगो के लिए महत्वपूर्ण स्थल था। अंग्रेजी भाषा में मोहन जो दड़ो के महास्नाघर को (THE GREAT  BATH) “द ग्रेट बाथ” कहते है।

मोहने जो दड़ो की  मूल्यवान कलाकृति

सिंधु घाटी की  खुदाई के दौरान कई सारी मुर्तिया मिली है जिसमे एक प्रसिद्ध नाचती हुई लड़की की कांस्य की मूर्ति मिली है, और साथ में कुछ पुरुषो की भी मुर्तिया मिली। वो सभी पुरुषो की मुर्तिया पर नक्काशी का काम किया गया है वह सभी रंगीन है। कुछ इतिहासकारों  का मानना है की पुरुष की मूर्ति राजा की है तो दुसरो का मानना है वो मूर्तिकला और धातु विज्ञान की परिपक्वता है।

मोहन जो दड़ो से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण एवं रहस्यमयी तथ्य

पाकिस्तान में सिंधु नदी के पूर्वी तट पर स्थित मोहन जो दड़ो का सिंधी भाषा में अर्थ ” मृतकों का टीला” होता है।
सबसे पहले  सिन्धु घाटी के सभ्यता  की खोज भारत के पुरातत्व विभाग के सदस्य एवं मशहूर इतिहास राखलदास बनर्जी द्वारा साल 1922 में की गई थी।
सिंधु घाटी सभ्यता को इतिहासकारों के जरिये  प्रागैतिहासिक काल में रखवाया गया है।
सिंधु घाटी सभ्यता और मोहन जो दड़ो में घरों में पक्की ईंटों से स्नानघर और शौचालय बने होते थे।
सिन्धु घाटी की  सभ्यता में लोग धरती को अन्न, फल उपलब्ध करवाने वाली उर्वरता की देवी मानते थे और धरती की पूजा करते थे।
सिंधु घाटी सभ्यता अर्थात मोहनजोदड़ो नगर का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यहां स्त्री को मान-सम्मान दिया जाता था एवं स्त्री  पूजा को भी बल दिया जाता था।
सिन्धु घाटी की सभ्यता  का इतिहास काफी गर्वपूर्ण है, हालांकि कुछ रहस्य भी जुड़े हुए हैं। इससे जुड़ा एक रहस्य यह है कि मोहनजोदड़ो में पहली बार पहुंचने पर वैज्ञानिकों को कुछ मानव, जानवरों एवं पक्षियों के कंकाल मिले थे। जिसके बाद इस नगर को ”मौत का टीला” भी कहा गया।

मोहन जो दड़ो के विनाश का कारण

खोजकर्ता और वैज्ञानिको के आधार पर मोहन जो दड़ो के विनाश कारण प्राकृतिक आपदा और जलवायु मर बदलाव के कारण मानते है, और कुछ वैज्ञानिको के मुताबिक सिन्धु नदी में आई बाढ़ की वजह से यह तबाही हो गया तो कई लोग उसके विनाश का कारण भूकंप को मानते है।इसके अलावा कुछ ज्ञानानी  खोज में मिले नर कंकालो के आधार पर इसके विनाश का कारण बड़े विस्फोट को भी मानते है। कई खोज कर्ता ने कहना है की इस तबाही का कारण महाभारत के समय गुरु द्रौणचार्य के पुत्र द्वारा छोड़ा गया ब्रह्मस्त्र से यह नगरी बर्बाद हो गई एसा कहा जाता है की जब अश्वथामा को पिता की मृत्यु के बारे में पता चला तो उन्हों ने पांड्वो को मारने के लिए ब्रहांस्त्र छोड़ने की योजना बनाई तब अर्जुन उसके पीछे गया जिनके भय से अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ही ब्रेहास्त्र छोड़ दिया और अर्जुन ने भी ब्रेहास्त्र छोड़ा जिसके कारण सिन्धु घाटी की सभ्यता और महोन जो दड़ो नगर का विनाश हो गया।

मोहन जो दड़ो से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल के जवाब

मोहन जो दड़ो क्यों प्रसिद्ध है?

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मोहन जो दड़ो सिन्धु घाटी की सभ्यता के कई अवशेष मिले और विश्व के प्राचीन नगरो में से एक माना जाता है इस लिए वे प्रसिद्ध है।

मोहन जो दड़ो का अर्थ क्या होता है?

मोहन जो दड़ो का अर्थ ” मुर्दों का टीला” होता है।

सिन्धु संस्कृति की सभ्यता के मुख्य शहर कौन से है?

सिन्धु संस्कृति की सभ्यता के मुख्य शहरो में मोहन जो दड़ो, लोथल, कालीबंगन, धोलावीर और रखिगढ़ी आते है।

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मोहन जो दड़ो की विशेषता क्या थी ?

मोहन जो दड़ो की विशेषता यह थी सभ्यता,स्वस्थ के साथ गणित का अच्छा ज्ञान था।

मोहन जो दड़ो कहा पे स्थित है?

मोहन जो दड़ो पाकिस्तना में सिंधु नदी के किनारे स्थित है।

मोहन जो दड़ो के नगर नियोजन में कितने कुए है?

मोहन जो दड़ो के नगर नियोजन में 700 कुए है।

मोहन जो दड़ो के प्रसिद्ध कुंड की लंबाई और चौड़ाई कितनी है?

मोहन जो दड़ो के प्रसिद्ध कुंड की लंबाई 40फुट और चौड़ाई 25 फुट थी

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Last Final Word 

दोस्तों हमने इस आर्टिकल में आपको सिन्धु घाटी की संस्कृति मोहन जो दड़ो का इतिहास और उनकी विशेषता मोहन जो दड़ो के महास्नाघर, मोहन जो दड़ो प्रसिद्ध कुंड एवं मोहन जो दड़ो की विशेषता और उनके विनाश का कारण बताया तो हम यह आशा करते है की आपको इस आर्टिकल के जरिये मोहन जो दड़ो से जुडी सारी महत्वपूर्ण जानकारी मिल गई होगी।

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