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मीराबाई की जीवनी

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नमस्कार दोस्तों आज के इस महत्वपूर्ण आर्टिकल में हम आप से बात करने वाले है मीराबाई के जीवन परिचय के बार में तो चलिए जानते है की मीराबाई की जीवनी क्या थी।

पायो जी मैनें नाम रतन धन पायो। वस्तु अनमोल दी म्हारे सतगुरु, किरपा कर अपनायो। जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो। खरचै नहीं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो। सत की नाव खेवहिया सतगुरु, भवसागर तर आयो। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस पायो। इस सभी पक्तियों को पढ़कर आपके मन में यह बात ज़रुर आगयी होगी की में किस के बारे में बात कर रहा हूँ, जी हा आपको बता दे की वह है भक्ति युग की महान विद्वान “मीराबाई“।

मीराबाई का जीवन परिचय (Biography of Mirabai)

मीराबाई का जन्म 1498 ई. में हुआ था। मीरा बाई का जन्म स्थान कुडकी (मेड़ता) में हुआ था। मीराबाई के पिता का नाम राव रत्नसिंह था और मीराबाई के माता का नाम वीर कुमारी था। मीरा बाई के पति का नाम भोजराज था, मीराबाई और भोजराज का विवाह 1516 ई. में हुआ था। उसके बाद भोजराज की 1521 ई. में मृत्यु हो गयी थी। मीरा बाई के दादा का नाम राव दुदा था। मीराबाई एक हिन्दू आध्यात्मिक कवयित्री थे, मीराबाई के प्रति भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित भजन उत्तर भारत के विस्तार में बहुत ही लोकप्रिय थें। मीराबाई के भजन और स्तुति की रचनांए कर आमजन को भगवान के और समीप पहुँचाने वाले संतो और महत्माओ में मीरा बाई का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है।

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मीरा एक राजपूत परिवार से ताल्लुक रखती थीं। वह एक राजपूत राजकुमारी थी, जो मेड़ता महाराज के छोटे भाई रतन सिंह की इकलौती संतान थी। उनकी शाही शिक्षा में संगीत और धर्म के साथ-साथ राजनीति और प्रशासन भी शामिल था। कृष्ण के प्रति उनकी आजीवन भक्ति तब शुरू हुई जब एक भिक्षु ने उन्हें एक बच्चे के रूप में कृष्ण की एक मूर्ति दी, जिसे उन्होंने एक दिव्य प्रेमी के रूप में पूजा की थी।

मीराबाई का जन्म तथा शिक्षा (Birth and education of Mirabai)

प्रसिद्ध कृष्ण भक्त कवयित्री मीराबाई जोधपुर, राजस्थान के मेवाड़ के राजकुल की राजकुमारी थी। मीराबाई के जन्म तिथि के संबंध में विद्वानों में एक मत नहीं है। देखा जाये तो कुछ विद्वानों मीरा बाई का जन्म 1430 ई. में मानते है और कुछ विद्वानों मीरा बाई का जन्म 1498 ई. में मानते  है। मेड़ता महाराज के छोटे भाई रतन सिंह की एकमात्र संतान मीरा बाई थी। मीरा बाई का जीवन बहुत ही दुःख भरा और कष्ट में व्यतीत हुआ था।  मीराबाई सिर्फ दो साल की थी तभी उनकी माता की मृत्यु हो गई थी। मीराबाई की  माता के मृत्यु के बाद उसके दादा राव दुदा उन्हें मेड़ता ले आए और अपनी देख रेख में मीराबाई का पालन-पोषण किया था। मीरा बाई के दादा राव दुदा एक योद्धा होने के साथ साथ भक्ति ह्र्दय मनुष्य भी थे और राव दुदा के घर साधू संतो का आना जाना लगा ही रहता था। देखा जाये तो इसिलए मीराबाई बचपन से ही ऐसे धार्मिक लोगों के सम्पर्क में आती रहीं। मीरा बाई ने इसके साथ साथ तीर-तलवार जैसे-शस्त्र-चालन, घुड़सवारी, रथ-चालन आदि के साथ साथ संगीत तथा आध्यात्मिक शिक्षा भी प्राप्त की थी।

मीराबाई का जीवनकाल सम्बंधी तथ्य (Lifetime facts of Mirabai)

मीराबाई के जन्म काल के बाद उसके जीवन-वृत के दौरान बहुत ही मतभेद है। मीराबाई के उपर श्यामचंद्र कपूर ने आपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास‘ में उल्लेख किया है- प्रियादास ने संवत 1769 वी. में भक्तमाल की टिका ‘भक्तिरओक्सस्व बोधिनी‘ में लिखा गया है की मीराबाई का जन्म स्थल मेड़ता थी। ऐसे ही नागरीदास ने लिखा हे की मेड़ता की मीराबाई के विवाह राणा अनुज से हुआ था। कर्नल टॉड ने ‘एनलस एन्ड एंटिक्तिज ऑफ़ राजस्थान‘ में मीरा बाई का विवाह राणा कुम्भा से तैय किया था। पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपने उदयपुर राज्य के इतिहास में लिखा है कि महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज का विवाह मेड़ता के राव वीरमदेव के छोटे भाई रत्ना सिंह की पुत्री मीराबाई से वर्ष 1573 में हुआ था। याद रहे कि कर्नल टॉड या विद्वानों ने उनके आधार पर मीरा को कुम्भ की स्त्री माना है, उन्होंने किवदंतियों के आधार पर भूल की है। सबसे पहले विलियम क्रुक ने बताया कि मीरा बाई असल में राणा कुंभा की पत्नी नहीं, बल्कि सांगा के बेटे भोजराज की पत्नी थीं।
पंडित रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास में लिखा है कि- “उनका जन्म संवत 1573 ई. में केकड़ी नामक गाँव में हुआ था और उनका विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी से हुआ था।” वेसे गणपतिचन्द्र गुप्त ऐक डोक्टर थे और उसकने कहा है की मीराबाई का जन्म सन. 1498 ई. (संवत 1555 वी.) के लगभग माना गया है।

मीराबाई का कृष्ण से लगाव (Meera Bai’s love for Krishna)

मीराबाई को उसके बचपन से ही कृष्ण की ऐसी छवि बस गई थी कि वे अपनी युवावस्था से लेकर मृत्यु तक कृष्ण को ही अपना सब कुछ मानती थीं। जोधपुर के राठौड़ रतन सिंह की इकलौती बेटी मीराबाई बचपन से ही कृष्ण भक्ति में लीन थीं। बचपन की एक घटना के कारण कृष्ण के प्रति उनका प्रेम अपने चरम पर पहुंच गया। उनके बचपन में एक दिन उनके पड़ोस में एक अमिर व्यक्ति के यहाँ एक बारात आई। सभी महिलाएं छत से खड़ी होकर बारात देख रही थीं। मीरा बाई भी बारात देखने छत पर आईं बादमे उसी बारात को देखकर मीराबाई ने अपनी मां से पूछा, ”मेरा दूल्हा कौन है?” इस पर मीरा बाई की मां ने उपहास में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि “वह तुम्हारा दूल्हा है“। यह बात मीरा बाई के बच्चे में गांठ की तरह फंस गई और अब वह कृष्ण को अपना पति मानने लगी थी बादमे मीराबाई का कृष्ण के प्रति लगाव और बढ़ता गया।

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मीरा बाई का विवाह 

मीराबाई के अद्वितीय (अप्रतिम) गुणों को देखकर मेवाड़ के राजा राणा संग्राम सिंह ने मीराबाई के घर अपने बड़े पुत्र भोजराज के विवाह का प्रस्ताव भेजा, बादमे इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और मीराबाई ने भोजराज से शादी कर ली। मीराबाई ने पहले तो इस शादी के लिए मना कर दिया था, लेकिन परिवार के जोर लगाने के बाद मीरा बाई मान गई। वह फूट-फूट कर रोई और विदाई के समय श्रीकृष्ण की वही मूर्ति ले गई, जिसे उनकी मां ने उन्हें अपना दूल्हा बताया था। मीराबाई ने लज्जा और परंपरा का त्याग कर अनुपम प्रेम और भक्ति का परिचय दिया।

शादी के दस साल बाद मीराबाई के पति भोजराज का देहांत हो गया। उसके पति शायद युद्ध के बाद घावों से मर गए। पति की मौत के बाद मीराबाई पर ससुराल में कई तरह के अत्याचार किए गए। मीरा के पिता रत्न सिंह 1527 ई. में बाबर और सांगा के युद्ध में मारे गए और लगभग तब ससुर की मृत्यु हो गई। सांगा की मृत्यु के बाद भोजराज का छोटा भाई रत्न सिंह गद्दी पर बैठा, इसलिए यह निश्चित है कि मीरा अपने ससुर के जीवनकाल में विधवा हो गई थी। 1531 ई. में राणा रत्न सिंह की मृत्यु हो गई और उनके सौतेले भाई विक्रमादित्य राणा बने। कुछ ही समय में अति विशाल प्रेम के अंत के बाद, मीरा ने अलौकिक प्रेम को अपनाया और कृष्ण की भक्त बन गई। सत्संग, ऋषि-संत-दर्शन और कृष्ण-कीर्तन की आध्यात्मिक धारा में गिरकर वह संसार को व्यर्थ समझने लगी। राणा विक्रमादित्य और मंत्री विजयवर्गीय ने उन्हें अत्यधिक कष्ट दिए। राणा ने अपनी बहन उदयबाई को भी मीरा को समझाने के लिए भेजा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। वह पूर्ण गरिमा को छोड़कर भक्तिमय जीवन व्यतीत करती रही। मीरा के स्त्री होने के कारण, चित्तौड़ वंश की दुल्हन होने और अकाल में विधवा होने के कारण शायद ही किसी अन्य भक्त को अपने समाज और परिवेश से इतना विरोध सहना पड़ा हो। उन्होंने अपने काव्य में अनेक स्थानों पर इस पारिवारिक संघर्ष के आत्म-चरितात्मक उल्लेख किया है।

सन 1533 ई. के आसपास मीरा को ‘राव बीरामदेव‘ द्वारा मेड़ता बुलाया गया था। मीरा के चित्तौड़ के त्याग के बाद 1534 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। विक्रमादित्य मारा गया और तेरह हजार महिलाओं ने जौहर किया। 1538 ई. में जोधपुर के राव मालदेव ने बीरमदेव से मेड़ता छीन ली। वे अजमेर भाग गए और मीरा ब्रज की तीर्थ यात्रा पर चली गईं। 1539 ई. में मीराबाई की मुलाकात रूप गोस्वामी से वृंदावन में हुई। वह कुछ समय वहां रही और 1546 ई. से कुछ समय पहले द्वारका चली गई। उन्होंने ईश्वर की भक्ति, संसार की अनित्यता और निर्गुण पंथी संतों और योगियों के सत्संग से वैराग्य का अनुभव किया था। मीराबाई को तत्कालीन समाज में विद्रोही माना जाता था। उनकी धार्मिक गतिविधियाँ राजपूत राजकुमारी और विधवा के लिए स्थापित नियमों के अनुसार नहीं थीं। उसने अपना अधिकांश समय कृष्ण को समर्पित एक मंदिर में बिताया और पूरे भारत के साधुओं और तीर्थयात्रियों से मुलाकात की और भक्ति पदों की रचना की।

मीरा बाई पर हत्या के प्रयास 

मीराबाई के पति के मृत्यु के बाद देखा जाये तो मीराबाई की कृष्ण के प्रति भक्ति दिन-प्रतिदिन और भी बढ़ ती गई। मीराबाई कृष्ण के मंदिरों में जाकर वहां कृष्ण जी की मूर्ति के सामने नाचती रहती थी। मीराबाई के लिए आनंद का माहोल तो तब हुआ जब मीराबाई के कहने पे राजा ने महल में ही कृष्ण जी का मंदिर का निर्माण करवा दिया था। वहा महल में मंदिर के निर्माण के बाद भक्ति का माहोल ऐसा बनता है की वह साधू-संतो का आना-जाना शुरू ही रहता है और सब मिलकर भक्ति के माहोल में एक लिंग हो जाते है। मीराबाई के छोटे देवर को यह सब अच्छा नही लगता था यह सब देख ने के बाद उसे बहुत ही बुरा लगता था। ऊधा जी भी यह सब देख के मीराबाई को समजाते है, लेकिन मीराबाई तो दिन-दुनिया सब भूल कर भगवान श्री कृष्ण के भक्ति में रमती जाती है, और वैराग्य धारण कर जोगिया बन जाती है। जब मीराबाई के पति का देहांत होने के बाद विक्रमजित सिंहासन पर बेठ ते है उसके बाद विक्रमजित को मीराबाई को इस तरह साधू संतो के साथ उठ-बेठना विक्रमजित को बिलकुल पसंद नहीं था। मीराबाई को मारने के कम से कम दो प्रयासों को उनकी कविताओं में दर्शाया गया है। एक बार फूलों की टोकरी में एक विषैला सांप भेजा गया था, लेकिन टोकरी खोलने पर उन्हें कृष्ण की एक मूर्ति मिली। एक अन्य अवसर पर उन्हें एक प्याला जहर दिया गया, लेकिन इसे पीने के बाद भी मीराबाई को कोई नुकसान नहीं हुआ था इस तरह मीराबाई को मारने के प्रयास किये गये थे।

मीरा बाई का द्वारका में वास

इन सब दुष्चक्र से पीड़ित मीराबाई अंत में मेवाड़ छोड़कर मेड़ता आ गईं, लेकिन यहां भी उनका स्वतंत्र व्यवहार स्वीकार नहीं किया गया। बादमे मीराबाई तीर्थ यात्रा पर निकली और अंत में द्वारका में बस गई। मीराबाई मंदिरों में जाती थी और वहां मौजूद कृष्ण भक्तों के सामने कृष्ण मूर्तियों के सामने नृत्य करती थी। 1543 ई. के बाद मीरा ने द्वारका में रणछोड़ की मूर्ति के सामने नाच-गाना शुरू कर दिया। 1546 ई. में चित्तौड़ से कुछ ब्राह्मणों को बुलाने के लिए द्वारका भेजा गया। कहा जाता है कि मीरा रणछोड़ से आदेश लेने गई और उसमें खो गई। ऐसा लगता है कि ब्राह्मणों ने अपनी गरिमा बचाने के लिए यह कहानी गढ़ी है। 1554 ई. में चित्तौड़ के मंदिर में मीरा के नाम से गिरिधरलाल की मूर्ति स्थापित की गई। यह मीरा का स्मारक और उनके पीठासीन देवता का मंदिर दोनों था। मीरा को गुजरात में काफी प्रसिद्धि मिली। हित हरिवंश और हरिराम व्यास जैसे वैष्णव भी उनके प्रति श्रद्धा दिखाने लगे।

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मीरा बाई की मृत्यु

मीराबाई अपने जमाने से लेकर आज तक लोकप्रियता के चरम पर हैं। उनके गीत या भजन आज भी हिंदी-गैर-हिंदी भाषी भारतीयों की जुबान पर हैं। मीरा के कई छंद भी हिंदी फिल्मी गीतों का हिस्सा बने। वह लंबे समय तक वृंदावन (मथुरा, उत्तर प्रदेश) में रहीं और फिर द्वारका चली गईं। जहां संवत 1560 ई. में वह भगवान कृष्ण की मूर्ति में लीन हो गई।
जब उदय सिंह राजा बने तो उन्हें यह जानकर बहुत निराशा हुई कि कैसे उनके परिवार में एक महान भक्त के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। फिर उसने अपने राज्य के कुछ ब्राह्मणों को मीराबाई को वापस लाने के लिए द्वारका भेजा। जब मीराबाई आने के लिए राजी नहीं हुई तो ब्राह्मणों ने जोर देकर कहा कि वे भी वापस नहीं जाएंगे। उस समय द्वारका में ‘कृष्ण जन्माष्टमी‘ के आयोजन की तैयारी चल रही थी। मीराबाई ने कहा कि वह इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी, उस दिन उत्सव चल रहा था। भजन में जुटे श्रद्धालु ने मीरा को नृत्य करते हुए श्री रणछोड़ राय जी के मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया और मंदिर के पट बंद कर दिए गए। जब दरवाजे खुले तो मैंने देखा कि मीरा वहां नहीं थी। उसका चीर मूर्ति के चारों ओर लिपटा हुआ था और मूर्ति चमक रही थी। मीरा मूर्ति में ही लीन थी, मीराबाई का शव भी कहीं नहीं मिला। उनका उनके प्रियतम प्यारे से मिलन हो गया था।

Last Final Word:

हमें उम्मीद है कि आपको मीराबाई का जीवन परिचय पसंद आया होगा और आपको मीराबाई की जीवनी के बारे में पूरी जानकारी मिली होगी, अगर आपको हमारे द्वारा दी गई जानकारी पसंद आई है, तो आप इस लेख को अपने दोस्तों के साथ भी साझा कर सकते हैं।

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