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महमूद गजनवी के आक्रमण और 11 वीं शताब्दी में भारत के राज्य

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नमस्ते दोस्तों! आज के हमारे इस आर्टिकल में बात करेगे महमूद गजनवी के आक्रमण और 11 वीं शताब्दी में भारत के राज्य के बारे में। 11वि शताब्दी की शुरुआत में, भारत की राजनितिक स्थिति बहुत ही अस्थिर थी। उस टाइम पर भारत कई छोटे राज्यों में विभाजित था। और विभिन्न शासको के बीच सत्ता के लिए हमेशा संघर्ष ही होता रहता था। सही या गलत, यह विवाद हमेशा युध्धो द्वारा ही सुलजाया जाता था। उस टाइम पर हमारा देश इतना शक्तिशाली नहीं था। और लोगो में राष्ट्रिय भावना की बहुत की ज्यादा कमी थी। सभी लोग अपने स्वार्थ के कारण, वे दुसरे शासक के बैनर के साथ मिलकर लड़ने को भी तैयार नहीं थे। परिणाम स्वरूप, तुर्की आक्रमणों से भारतीय शासको को एक के बाद एक पराजय मिली थी।

11 वीं शताब्दी में भारत के राज्य

11 वीं शताब्दी में भारत के प्रमुख राज्य का संक्षिप्त में विवरण निम्नलिखित है।

हिंदू राज्य  (Hindushahi Kingdom)

हिन्दू शाही की गणना उत्तर भारत में बहुत महत्वपूर्ण राज्यों में होती है। राजवंश की स्थापना 865 ई . में कलार नामक ब्राह्मण मंत्री थे, उन्होंने की थी। हिन्दू राज्य बहुत ही बड़ा राज्य था। हिन्दू राज्य चिनाब नदी से लेकर हिंदू कुश पर्वत तक फैला हुआ था। यह काबुल और पेशावर राज्य का एक हीस्सा था। हिंदू राज्य की राजधानी वहिंद थी। अरब शासक हिंदू राज्य को जितने में निष्फल रहे थे।

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महमूद के आक्रमणों के समय पर, एक हिंदू राज्य और जयपाल नाम का एक शासक था।वह एक बहुत ही महत्वाकांक्षी शासक था। वे महमूद गजनवी के पिता सुबुक्तगिन से दो बार हार गए थे। सीमावर्ती राज्य होने के कारण, हिंदू शाही राज्य को  सबसे पहले महमूद के आक्रमणों का सामना करना पड़ता था।

मुल्तान और सिंघ (Multan And Singh)

11 वीं शताब्दी की शुरुआत में, मुल्तान और सिंध राज्य पर मुसलमानों का शासन था। मुल्तान राज्य उस टाइम पर अबुल फतह दाउद द्वारा शासित था। अबुल फतह दाउद कार्मठी धर्म का था। पुरे सिंध राज्य पर अरबो का ही शासन चलता था। देखा जाये तो मुल्तान और सिंघ दोंनो ऐसे राज्य थे जिसमें महमूद के हमलो का सामना करने की बिलकुल भी हिम्मत नहीं थी।

कश्मीर (Kashmir)

महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण के समय कश्मीर राज्य पर उत्पन वंश का शासन था। यह वंश की स्थापना 855 ईस्वी में अवंती वर्मन द्वारा की गई थी। इस वंश के शासक काशम गुप्त ने कश्मीर राज्य में कई सारे उल्लेखनीय सुधर किए थे। 958 ई. में कश्मीर की रानी दीदा ने कश्मीर की राज्य चलाने की निति को संभाली थी। और रानी दीदा हिंदू राजवंश की राजकुमारी होने के साथ साथ कश्मीर की रानी भी थी।

रानी दीदी एक कुशल शासक थी। अपने शासनकाल के टाइम पर उन्होंने कश्मीर को समृधि के शिखर पर पहुचाया था। 1003 ई में रानी दीदी की मृत्यु के बाद, उनका भतीजा संग्रामराज कश्मीर राज्य का नया शासक बना था। उन्होंने कश्मीर में लोहार वंश की स्थापना की थी। इस राजवंश के शासको ने कश्मीर घाटी में मुस्लिम आक्रमणकरियो के प्रयत्नों को सदीयो तक निष्फल लिया था।

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कन्नौज (Kanauj)

11 वीं शताब्दी की जब शुरुआत हुई थी तब से, कन्नौज राज्य पर प्रतिहार नाम के वंश का शासन था। कन्नौज राजवंश की स्थापना 725 ई.स. में नागभट्ट प्रथम ने की थी। इस वंश के शासक का नाम मिहिरभोज था वह सबसे महान और शक्तिशाली था। मिहिरभोज ने न तो केवल अपनी सीमाए बधाई, और साथ में एक कुशल शासन प्रणाली भी लागु की थी।

कन्नौज राज्य महमूद गजनवी के आक्रमणों के दौरान राज्यपाल के अधीन था। गवर्नर ने दो बार हिंदू शासको को गजनवी के हमलो के खिलाफ लड़ने के लिए सहायता प्रदान की थी। और इन दोनों लड़ाईयो में हिस्न्दु शाही शासको को मरना पड़ा था। इन दोनों लड़ाईयो की पराजयों का कन्नौज राज्य पर भी प्रतिकुल प्रभाव पड़ा था।

मालवा (Malwa)

महमूद गजनवी के आक्रमणों के समय, पुरे मालवा राज्य पर परमार वंश का शासन था। परमार राजवंश की स्थापना 9 वीं शताब्दी की शुरुआत में हुई थी और उसकी स्थापना कृष्णराज ने की थी। 11 वीं शताब्दी की शरुआत में मालवा में सिंधुराज वंश ने शासन किया था। सिंधुराज ने  995 ई. से 1018 ई.  तक मालवा पर शासन किया था। वह एक कुशल शासक साबित हुआ था। सिंधराज का उत्तराधिकारी भोज परमार वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था।

अपने शासनकाल ( 1018 – 1060 ईस्वी ) के समय पर, मालवा राज्य ने विभिन्न क्षेत्रो में अभूत ही आश्चर्यजनक प्रगति की थी और वह कला और साहित्य के भी माहन प्रेमी थे। उन्होंने अभी धर्मो के प्रति सहिष्णुता की निति अपनाई थी। प्रख्यात इतिहासकार डॉ.एस .एन सेन के सब्दो में कहा जाये तो उनके कई गुणों के कारण, उन्हें मध्यकालीन भारत के महान शासको में गिना जा सकता है।

गुजरात (Gujarat)

महमूद गजनवी के आक्रमणों के दौरान गुजरात राज्य पर सोलंकी वंश का शासन था। सोलंकी वंश की स्थापना मूलराज ने दशवीं शताब्दी के मध्य में की थी। इसकी राजधानी अन्हिलवाडा थी। 1025 ईस्वी में महमूद के गुजरात राज्य पर आक्रमण के दौरान, इस पर भीमदेव प्रथम का शासन था।इसलिए गुजरात राज्य के पास महमूद गजनवी के आक्रमणों का सामना करने की हिम्मत नहीं थी।

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बंगाल (Bengal)

महमूद गजनवी के आक्रमण के समय में पुरे बंगाल राज्य पर पाल वंश का शासन था। यह वंश की नीव 8 वीं शताब्दी  में गोपाल नामक राजा ने रखी थी। और उनका उत्तराधिकारी धर्मपाल वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उन्होंने अपने शासनकाल के समय पर पाल साम्राज्य को एक साम्राज्य में बदल दिया था।

महिपाल प्रथम ( 988 – 1038 ) महमूद का समकालीन रूप था। महिपाल बंगाल के गौरव को पुन:स्थापित करना चाहता था। राजेंद्र चोल ने अपने शासनकाल के समय पर बंगाल पर आक्रमण किया था और उस पर भरी नुकशान भी पहुचाया था। और सौभाग्य से, महमूद ने बंगाल राज्य पर कब्ज़ा कर लिया।

बुंदेलखंड (Bundelkhand)

11 वीं शताब्दी में बुंदेलखंड राज्य पर चंदेल वंश का शासन था। यह राजवंश की स्थापना 9 वीं शताब्दी की शरुआत में नानक चंदेल ने की थी। चंदेल की राजधानी का नाम खजुराहो नहीं था। महमूद के के भारतीय आक्रमणों के समय राजा गांधी ने बुंदेलखंड राज्य पर शासन किया था। राजा गांधी एक शक्तिशाली शासक था और उसके शासन से बुंदेलखंड का सर्वागीण विकास हुआ था। राजा गंड के बड़े बेटे ने महमूद के खिलाफ बड़ी कायरता से बाहर कन्नौज के शासक राजपाल की हत्या कर दी थी।

अन्य राज्य (Other Kingdoms)

उपरोक्त प्रमुख राज्यों के आलावा भी उस समय उत्तर भारत में कई अन्य छोटे राज्य भी थे जैसे की  ग्लालियर, थानेसर, बुलंदशहर और चेंडी। और यहाँ तक की यहाँ के शासक भी इतने ज्यादा बहादुर नहीं थे की महमूद के किये गये आक्रमणों का सामना कर सके।

11 वीं शताब्दी में दक्षिण भारत के राज्य और उनका इतिहास

11 वीं शताब्दी के समय में, केवल दो राजा-चोल और चालुक्य , दक्षिण भारत में प्रमुख थे। इन दो राजाओ का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।

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चोल साम्राज्य (The Chola Kingdom)

महमूद गजनवी के आक्रमणों के समय में दक्षिण भारत का चोल राज्य सबसे प्रसिद्ध राज्य था। चोल साम्राज्य की स्थापना विजयालय ने 850 ई में की थी। इस साम्राज्य की राजधानी तंजौर नथी थी। राजराज प्रथम ( 985 – 1014 ईस्वी ) और राजिंदर प्रथम ( 1014 – 1044) यह चोल वंश दो महान शासक थे और गजनवी के समकालीन भी थे। चोल साम्राज्य को साम्राज्य में बदल ने का पूरा श्रेय राजराज प्रथम को ही जाता है। राजराज प्रथम ने ही चेर, गंगा, कलिंग और पश्चिमी चालुक्य हो हराया था।

राजराज प्रथम ने ही श्रीलंका के शासक महिंदा वी को  हराया था और पुरे उत्तरी श्रीलंका पर विजय हासिल किया था। उनके उत्तराधिकारी का नाम राजिंदर प्रथम था और उन्हों ने भी चोल साम्राज्य की शक्ति और गौरव की वृधि में एक सराहनीय योगदान दिया था। उन्होंने केरल, पश्चिम चालुक्य, गंगा, श्री विजय और श्रीलंका के शासको को हराया था और अपने चोल साम्राज्य के क्षेत्र का विस्तार किया।

उत्तरी चालुक्य राज्य (The Later Chalukya Kingdom)

11 वीं सदी के समय पर उत्तर चालुक्य राज्य  दक्षिण भारत का दूसरा सबसे प्रसिद्ध राज्य था। इस राज्य की स्थापना तैल तीसरे के द्वारा 973 ईस्वी में हुयी थी। तैल तीसरे ने यह राज्य पर 997 ई तक शासन किया था। इस राज्य की राज्शानी का नाम कल्याणी नहीं था। स्त्यस्य ( 997 – 1008 ईस्वी ), विक्रमादित्य पंजवा ( 1008 – 1016 ईस्वी ) और जय सिंह द्वितीय ( 1016 – 1042 ईस्वी) यह तीनो महमूद गजनवी के समकालीन शासक थे। दक्षिण भारत में, उत्तर चालुक्य राज्य और चौल में संप्रभुता के लिए बहुत ही उग्र संघर्ष जारी रहा था।

अन्य राज्य (Other Kingdoms)

उपर दिखाए गए राज्यों के अलावा चेर और पांडे राज्य भी दक्षिण भारत में स्थिर थे। यह राज्य बहुत  मह्त्वुपूर्ण राज्य नहीं थे। उपर्युक्त विवरण के यह साफ पता चलता है की महमूद के किये गये हमलों के समय पर भारत की राजनितिक स्थिति बिलकुल भी अच्छी नहीं थी।

देश में ऐसा कोई भी शासक नहीं था जो संघर्षरत शासको को नियंत्रित कर सके और वेदेशी आक्रमणकारियो के खिलाफ उनका समन्वय कर सके। और अपनी दुरदर्शिता के कारण, दक्षिण भारत के शासक उत्तर भारत के धटनाक्रमो के बारे में चिंतित नहीं थे। ऐसी स्थिति महमूद गजनवी के  आक्रमणों के लिए बहुत ही उपयोगी साबित हुई थी।

महमूद गजनवी के द्वारा किए गए हमले (Invasion Of  Mahmood Ghaznavi)

महमूद गजनी राज्य का एक शासक था। उन्होंने 998 ई . से 1030 ई. तक गजनी राज्य पर शासन किया था। और  गजनवी ने अपने राज्य की स्थिति मजबूत करने के बाद, उन्होंने अपना ध्यान भारत की और बढाया था। गजनवी ने १००० ईस्वी और 1027 ईस्वी के बीच 17 बार मध्य भारत पर आक्रमण किया था।

महमूद के द्वारा किये हुये सारे हमलों में महमूद गजनवी सफल रहा था। इन सभी हमलो के साथ साथ महमूद की प्रतिष्ठा बहोत ही ज्यादा बढ़ गई थी और दूसरी नजर से देखा जाये तो महमूद गजनवी के आक्रमण भारत के लिए बहुत ही विनाशकारी साबित हुए थे। और इन सभी आक्रमणों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।

महमूद गजनवी का पहला आक्रमण 1000 ई: (Mahmood Ghaznavi’s First Invasion 1000)

महमूद गजनवी अपना पहेला आक्रमण भारत पर सितंबर 1000 ई: में किया था। यह आक्रमण पंजाब की उत्तर -पश्चिम सीमा तक ही सिमित था। इसीलिए कुछ इतिहासकार इस आक्रमण को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दते है।

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महमूद गजनवी का दूसरा आक्रमण 1001 ई: (Mahmood Ghaznavi’s Second Invasion 10001)

महमूद गजनवी ने 1001 ई: में पंजाब राज्य के हिंदू शासक जयपाल पर अपना दूसरा आक्रमण किया था। कारण यह था की जयपाल महमूद किसी भी समय गजनवी सत्ता को चुनौती दे सकते थे। और इसिलिए अपनी प्रतिष्ठा के लिए गजनवी ने अपनी एक बड़ी सेना के साथ हिंदू शाही राज्य की राजधानी वाहिंदी पर आक्रमण किया। इसके बाद इस भीषण युद्ध में जयपाल की हार हुई और उन्हें बंदी बना लिया गया।

जयपाल अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सके और इसीलिए जयपाल की मृत्यु हो गई। और इस प्रकार से हिंदू  शाही वंश के महान शासक यानि की जयपाल का मृत्यु हो गया था। जयपाल की मृत्यु के बाद जयपाल के पुत्र आनंदपाल 1002 ईस्वी में सिंहासन पर बैठे।

महमूद गजनवी का तीसरा हमला 1004 ई: (Mahmood Ghaznavi’s Third Invasion 1006)

महमूद गजनवी ने 1004 ई: में भीरा राज्य के शासक बीजी राय पर अपना तीसरा आक्रमण किया था। बीजी राय ने गजनवी की सेना के खिलाफ बहुत ही कड़ा संधर्ष किया था फिर भी वह अंत में हार गए थे। और उन्होंने मुसलमानों द्वारा अपमानित होने के  बजाय आत्महत्या करना ज्यादा पसंद किया।

महमूद गजनवी का चौथा आक्रमण 1006 ई: (Mahmood Ghaznavi’s Fourth Invasion 1006)

महमूद गजनवी ने अपना चौथा आक्रमण मुल्तान राज्य पर किया था। उस टाइम पर मुल्तान राज्य अबुल फ़तेह दाउद द्वारा शासित था। अबुल फ़तेह दाउद कर्मठी संप्रदाय का था। महमूद को यह संप्रदाय से बहुत ही नफरत थी। अबुल फ़तेह दाउद ने भेडा पर अपने हमले के दौरान महमूद की सेना को भी रोका था। और इसीलिए गजनवी ने मुल्तान राज्य पर आक्रमण करने का फैसला किया था।

अबुल फ़तेह दाउद ने बड़ी बहादुरी के साथ गजनवी की सेना का सामना किया फिर भी वह हार गए। और महमूद ने मुल्तान राज्य पर अपना अधिकार कर लिया। महमूद ने आनंदपाल के बेटे सुखपाल को मुल्तान राज्य का गवर्नर नियुक्त किया था। सुखपाल ने इस्लाम धर्म अपनाया था।

महमूद गजनवी का पांचवा आक्रमण 1007 ई: (Mahmood Ghaznavi’s Fifth Invasion 1007)

महमुद गजनवी की गजनवी राज्य  में वापसी के कुछ समय बाद, सुखपाल ने इस्लाम धर्म त्याग कर दिया और अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की थी। महमूद ने सुखपाल को सबक सिखाने के लिए 1007 ई. में फिर मुल्तान राज्य पर हमला किया। इसके बाद उसने सुखपाल को हराया और उसे कैदी बना लिया। और इसके बाद शहर में लूट मार भी की गई।

महमूद गजनवी का छठा आक्रमण 1008 ई:  (Mahmood Ghaznavi’s Sixth Invasion 1008)

पंजाब राज्य के हिंदू शासक, आनंदपाल महमूद, भारत में गजनवी की तेजी से हो रही उन्नति को रोकना चाहते थे। इसलिए आनंदपाल ने भारतीय शासको से एक झंडे के नीचे आने की अपील की थी।  इसके परिणाम स्वरूप उज्जैन,कलिंगार, दिल्ली,ग्वालियर, कन्नौज और अजमेर के शासको ने आनंदपाल का समर्थन किया। इस तरह आनंदपाल के पास एक बड़ी सेना एकत्रित हो गई।

आनंदपाल की यह सेना महमूद गजनवी की शक्ति के लिए एक बहुत ही बड़ी चुनौती थी।  इस में कोई सवाल नहीं है की महमूद गजनवी इस शक्ति को सहन करने के लिए बिलकुल तैयार नहीं था।  और उसने बड़ी ही विशाल सेना के साथ वाहिंदी पर आक्रमण किया। यह भयंकर युद्ध में आनंदपाल को करारी हार का सामना करना पड़ा था। इस शानदार जित ने महमूद की प्रतिष्ठा को बहुत ही ज्यादा बढ़ा दिया।

और इस जित के दम पर उसने पंजाब राज्य पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया।  बहुत ही प्रसिद्ध इतिहासकार एस.आर शर्मा के अनुसार, राष्ट्रिय आधार पर सबसे संगठित, दृढ और बहुत ही बड़े पैमाने पर विदेशियो के खिलाफ मध्य युग में भारत के हिंदुओ द्वारा ऐसा प्रयास निष्फल रहा।

महमूद गजनवी का सातवाँ आक्रमण 1009 ई: (Mahmood Ghaznavi’s Seventh Invasion 1009)

आनंदपाल पर अपनी जित से उत्साहित होकर गजनवी ने नगरकोट राज्य 1009 ई: में आक्रमण किया। नगरकोट राज्य के लोगो ने बहुत जल्दी ही महमूद गजनवी की अधीनता स्वीकार कर ली थी। इसके बाद महमूद ने नगरकोट राज्य के मंदिरों को लूट लिया और वहा से बहुत ही धन प्राप्त किया।

इन सब के आलावा इस लूटपाट में मुसलमानों को मध्य एशिया के लोगो के हाथो में कुछ दुर्लभ वस्तुए मिली जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया था। यह विशाल संपत्ति की जलक देखने के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम देशो के लोग गजनी आए थे।

महमूद गजनवी का आठवां आक्रमण 1009 ई: (Mahmood Ghaznavi’s Eighth Invasion 1009)

महमूद गजनवी ने 1009 ई. में अपने आठवे आक्रमण में नारायणपुर ( राजस्थान ) के शासन को हराया था और अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए उनको मजबूर किया था।

महमूद गजनवी का नौवाँ आक्रमण 1010 ई : (Mahmood Ghaznavi’s Ninth Invasion 1010)

मुल्तान राज्य में, अबुल फ़तेह दाउद ने महमूद गजनवी के खिलाफ अपनी गतिविधियो को एक बार फिर से शुरू किया था।  और इसीलिए गजनवी ने मुल्तान राज्य पर हमला किया और उसे आक्रमण में हरा दिया।

महमूद गजनवी का दसवां आक्रमण 1013 ई : (Mahmood Ghaznavi’s Tenth Invasion 1013)

महमूद गजनवी ने 1013 ई: में थानेश्वर राज्य पर हमला किया था। हिंदूओ के प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों में से थानेश्वर एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल था। वहा पर कई मंदिर स्थित थे जहा पे महमूद को बहुत ही धन मिल सकता था। महमूद ने एक बड़ी सेना के साथ यहाँ अक्रमन करके यहाँ के लोगो को चौका दिया था।   इसलिए वे लोग जगह की रक्षा नहीं कर सके।  महमूद गजनवी ने बहुत ही बड़ी संख्या में हिंदुओ को मार डाला था। तब महमूद ने मनमाने ढंग से थानेश्वर राज्य को लूट लिया और कई सारे मंदिरों को नष्ट कर दिया था। इस आक्रमण में गजनवी को बहुत ही बड़ी रकम मिली थी।

महमूद गजनवी का ग्यारहवां हमला 1014 ई: (Mahmood Ghaznavi’s Eleventh Invasion 1014)

महमूद गजनवी से हारने के बाद भी आनंदपाल ने हर नहीं मानी थी।  नंदना को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया था। 1012 ई: में आनंदपाल की मृत्य हो गई थी उसके बाद उनका पुत्र त्रिलोचनपाल सिंहासन पर बथा था। महमूद गजनवी उसे भी अपने अधीन करना चाहता था। ईसलिए उन्होंने 1014 ईस्वी में नंदना राज्य पर आक्रमण किया। उसमे त्रिलोचनपाल हार गया और कश्मीर का भाग भी गया।

महमूद गजनवी का बारहवाँ आक्रमण 1014 ई : (Mahmood Ghaznavi’s Twelth Invasion 1015)

त्रिलोचनपाल को गिरफ्तार करने के इरादे से महमद गजनवी ने कश्मीर पर आक्रमण किया था। और त्रिलोचनपाल क्लिंगर राज्य में भागने में सफल हो गया। और गजनवी ने कश्मीर में खूब लूटपाट की।

महमूद गजनवी का तेरहवा आक्रमण 1018 ई: (Mahmood Ghaznavi’s Thirteenth Invasion 1018)

1018 ई. में महमुद गजनवी ने सबसे पहले मथुरा पर आक्रमण किया था। यहाँ पर उसने कई सारे मंदिरों को लूटा और नष्ट कर दिया था। इसके बाद महमूद के सैनिक रस्ते में विभिन्न स्थानों पर लूटपाट करते हुए कन्नौज राज्य तक पहुचे। उस समय पर उत्तर भारत में कन्नौज सबसे प्रसिद्ध राज्य था। राजा राजपाल बहुत ही ज्यादा डरपोक थे। उसने बिना किसी लड़ाई के गजनवी के अधिकारों को स्वीकार कर लिया था। तब महमूद गजनवी ने कस्बे और मंदिरों में बहुत ही लूटपाट की।

महमूद गजनवी का चौदहवाँ हमला 1019 ई : (Mahmood Ghaznavi’s Fourteenth Invasion 1019)

कन्नौज राज्य के शासक राज्यपाल द्वारा महमूद गजनवी को स्वीकार किए जाने पे राजपूतो को बहुत ही अपमानित महसूस हुआ था। इसीलिए कलिंग राज्य के शासक गंड के पुत्र विद्याधर ने अपमान का बदला लेने के लिए कन्नौज राज्य पर हमला किया। और गवर्नर युद्ध में मारा भी गया था।

इसे महमूद कभी सहन नहीं कर सका। इसके बाद महमूद ने 1019 ई. मव कलिंग राज्य पर हमला किया। राजा गंड ने महमूद के साथ एक समजोता किया और उसे बहुर ही सारा धन देने के लिए तैयार हो गया।

महमूद गजनवी का पंद्रहवाँ आक्रमण 1020 ई : (Mahmood Ghaznavi’s Fifteenth Invasion 1020)

ग्वालियर राज्य के शासक अर्जुन ने महमूद गजनवी के खिलाफ कलिंग राज्य के शासक का समर्थन किया था। गजनवी इसे बिलकुल भी सहन नहीं कर सकता था इसीलिए उसने 1020 ई. में ग्वालियर राज्य पर आक्रमण कर दिया। और अर्जुन ने कुछ विरोध के बाद महमूद गजनवी की अधीनता को स्वीकार कर लिया।

महमूद गजनवी का १६वा आक्रमण 1025 ई : (Mahmood Ghaznavi’s Sixteenth Invasion 1025)

भारत पर महमूद गजनवी के हमलो में सोमनाथ ( गुजरात ) सबसे प्रसिद्ध था। यह आक्रमण महमूद का 16 वा आक्रमण था और इसे 1025 ईस्वी में अंजाम दिया गया था।  सोमनाथ का मंदिर अपनी विशालता और अपार धन के लिए पूरी दुनिया भर में बहुत ही प्रसिद्ध था।

यह मंदिर में 1000 ब्राह्मण, 500 देवदासिया और 200 संगीतकार हररोज भगवान सोमनाथ की पूजा करने के लिए मौजूद रहते थे। मंदिर में हर रोज सैकड़ो भक्तो का हुजूम उमड़ता था, और इसके बाद बहुत सारा धन जमा हो जाता था।

सोमनाथ मंदिर के रखरखाव के लिए दस हजार गाव की  जमीन आवंटित की गई थी। इसके आलावा यह मंदिर में एक बहुत ही बड़ी धंटी थी जो कई टन सोने से बनी है।  सोमनाथ मंदिर की मूर्ति और उस पर बनी छतरी बहुत ही कीमती हीरो और जवाहरात से जड़ी हुयी है। तो इस प्रकार यह मंदिर में इतनी संपत्ति थी की महमूद ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

महमूद गजनवी की चर्च द्रष्टि बहुत ही लंबे समय से सोमनाथ मंदिर से जुडी हुई थी। गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला करने के इरादे से 17 अक्टूबर,1025 ई . को गजनवी राज्य को छोड़ दिया। हमले के समय महमूद के पास 80,000 पैदल सेना और 30,000 घुड़सवार थे।  वह सब बिना किसी विरोध के मुल्तान राज्य और राजस्थान होते हुए गुजरात की राजधानी अनिलवार पहुच गए। इस संकट के समय पर गुजरात के शासक भीमदेव ने अपनी राजधानी छोड़ दी थी।

तो इस प्रकार गजनवी ने सामनाथ मंदिर को बहुत ही आसानी से लुट लिया और पूरी तरह से नष्ट कर दिया।  महमूद गजनवी को लुट के रूपमें सोमनाथ मंदिर से अपार हीर, जवाहरात, सोना और चंडी मिला था।  सोमनाथ मंदिर की जित महमूद गजनवी की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि थी।

महमूद गजनवी का सत्रहवाँ आक्रमण 1027 ई : (Mahmood Ghaznavi’s Seventeenth Invasion 1027)

जब महमूद गजनवी सोमनाथ मंदिर को लुट के वापस गजनी लौट रहा था तब उसे मुल्तान राज्य के जाटो ने रोक दिया था। उस समय पर महमूद ने जट्ट के साथ युद्ध करना सही नहीं समजा था। महमूद गजनवी ने 1027 ई. में जट्ट को सबक  सिखाने के लिए मुल्तान राज्य पर आक्रमण किया।

जट्ट ने महमूद का बहुत ही बहादुरी के साथ सामना किया लेकिन फिर भी अंत में वह हार गया। गजनवी ने उन्हें बहुर ही बड़ी संख्या में मार डाला। और उनके घरो को लुट लिया और उनकी महिलाओ और बच्चो को उसने गुलाम बना लिया। यह आक्रमण महमूद गजनवी का भारत पर अंतिम आक्रमण था।

महमूद गजनवी के हमलों का निशाना (Motives Of Mahmood Ghaznavi ‘S Invasions)

महमूद गजनवी के आक्रमणों का मुख्य उद्देश्य क्या था? यह संबंध में इतिहासकारों के तीन प्रचलित विचार है। केवल इन तीनो के उचित बैठक के माध्यम से ही हम सही निर्णय पर बहुत ही आसनी से पहुच सकते है। पहला विचार यह है की महमूद गजनवी एक लालची चोर था।

इसलिए उसने सिर्फ लोट करने के लिए ही भारत पर कई सारे हमले किए थे। और एक अन्य द्रष्टिकोण के अनुसार महमूद ने इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए कही सारे युद्ध लादे थे। और तीसरे द्रष्टिकोण के अनुसार महमूद गजनवी के आक्रमणों का उदेश्य न तो धन जुटाना था और ना ही कोई उपदेश देना था।

वास्तव में कहा जाये तो वह एक राजनितिक मकसद से प्रेरित था। वह आक्रमण करके एक विशाल साम्राज्य की नीव रखना चाहता था। इस तरह प्रत्येक विचारधारा की पुष्टि और खंडन में विद्वानों ने अपने विचार सामने रखे है।

धन लूटमार (Plundering)

अधिकांश इतिहासकारों के मत अनुसार महमूद गजनवी एक महान लुटेरा था और भारत पर उनके आक्रमणों का एक मात्र उद्वेश्य भारत के घन को लूटना था। और देखा जाये तो उन दिनों में गजनी राज्य एक बंजर और पहाड़ी विस्तार था  और वहा के लोग बहुत ही गरीब थे।

बहार की जगह से पैसा न मिलने पर यहाँ का जीवन नहीं चल सकता था। तो इसलिए महमूद गजनवी ने भारत से इस धन को लुटने की योजना बनाई जिसे उस समय गोल्डन स्पैरो कहा जाता था। अगर हम महमूद गजनवी के सतारा आक्रमणों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करते है तो या फिर किया जाता है तो महमूद गजनवी ने अपने हर एक आक्रमण के बाद लूटपाट पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया है।

हिंदू शासक जयपाल ने महमूद गजनवी को 2.5 लाख दीनार देकर उससे छुटकारा पाया था।इसका मतलब यह है की महमूद को पैसो का लालच नहीं होता हो वह कभी भी जयपाल को आजाद नहीं करता। महमूद गजनवी ने केवल उन स्थानों पर हमला किया है जहा उसे अपर धन लितने की आशा थी। यदि अगर उसका उदेश्य फ़क्त इस्लाम धर्म को फैलाना था, तो उसने कांगड़ा और सोमनाथ के मंदिर को लुटने का ना निशाना न बनाया होता।

महमूद गजनवी के चरित्र से यह भी पता चलता है की वह एक बहुत ही बड़ा लालची व्यक्ति था। उसने महान कवू फिरदौसी को साठ हजार सोने की अशर्फिया नहीं दी थी जैसा की उनके शाहनामें म दिया गया था। और यह भी कहा जाता है क महमूद गजनवी अपने मुत्यु के समय उस धन पर रोया था जो उसने जमा किया था। और ऐसा केवल बहुत ही लालची और स्वार्थी राजा ही कर सकता है।

धार्मिक उद्देश्य (Religious Motive)

कुछ इतिहासकारो का मानना यह है की इस्लाम धर्म के प्रचार के एकमात्र उदेश्य से महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया था। इने इतिहासकरो में वह उत्बी प्रमुख है। वो लिखते है की इस्लाम धर्म का प्रचार करने के लिए और हिंदी मंदिरों को नष्ट करने के लिए महमूद गजनवी ने इस देश पर आक्रमण किया था। इतिहासकारों के अनुसार महमूद गजनवी के हमले जिहाद थे। उन सभी ने इस द्रष्टिकोण के समर्थन में इन सभी तथ्यों को प्रस्तुत किया था।

उन्होंने मंदिरों और मुर्तियो को हटाने में बहुत ही उत्साह दिखाया था। मुर्तिया और मंदिर हिंदी धर्म के प्रतिक थे। उन सभी को तोड़कर वह मूर्ति पूजा के पाखंड सी हिंदूओ को अवगत करना चाहते थे।

महमूद गजनवी इस्लाम धर्म का उल्लंघन करने वाले लोगो को दंड देने के लिए गजनी से वापस वहा पे जाता था। उदहारण के तोर पर, नव परिवर्तित मुस्लिम सुखपाल जब फिर से हिंदू बन गया, तब महमूद गुजनवी तुरंत अपने सैनिको के साथ भारत आ गया था। और जब तक उसने नवांश को कैद नहीं कर लिया तब तक उसने राहत की सांस नहीं ली थी।

वैसे तो महमूद गजनवी को इस्लाम धर्म का प्रचारक नहीं कहा जा सकता। क्युकी इसके लिए कई कारण है। जैसे से की, प्रो. हबीब के मत अनुसार इस्लाम धर्म इस अनुचित कृत्य की अनुमति नहीं देता जैसे महमूद गजनवी ने भारत में किया था। दूसरा कारण यह है की,  अगर यह मान लिया जाए की महमूद गजनवी इस्लाम धर्म का प्रचार करना चाहता था, तो इसके वास्तविक परिणाम तो उसके बहुत ही विरुद्ध है। जैसे की जिन लोगो पूजा स्थलों को लूट लिया था, जिनके रिश्तेदारों को बंदी बनाकर वह गजनी ले जाता था क्युकी उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग का वह लोग अनुसरण नहीं करते थे। इसलिए महमूद गजनवी उपदेश देने में सफल नहीं रहा था।

तीसरा कारण, महमूद गजनवी के आक्रमणों की क्रूरता के डर से जितने भी लोग ने इस्लाम धर्म को अपनाया था उनमे से ज्यादातर लोग मुसलमान बन गए थे। चौथ कारण महमूद गजनवी के आक्रमणों का शिकार हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्म के राजा ही थे।

जैसा की महमूद गजनवी ने धर्म का सहारा लिया था। क्युकी वह उनकी सेना में अधिकतम संख्या में सैनिक भर्ती हो और वह बहुत ही बड़े पैमाने पर लूटपाट का कार्यक्रम चला सके। यह सभी तर्क को देखते हुए, यह कहा जा सकता है की महमूद गजनवी के आक्रमणों का उदेश्य धर्म का प्रचार करना नहीं था।

राजनीतिक मंशा (Political Motive)

कुछ इतिहासकरो का यह मानना है की महमूद गजनवी एक महान योद्धा था। हर एक महान योद्धा की तरह महमूद गजनवी भी नए नए क्षेत्रो को जितना चाहता था और अपने साम्राज्य का विस्तार बढ़ाना चाहता था। इसी लिए महमूद गजनवी ने राजनितिक उदेश्यों के लिए भारत पर बार – बार आक्रमण किया था। इन सभी आक्रमणों में महमूद गजनवी ने इस्लाम धर्म का प्रचार किया और धन लूटा, पर इसका मुख्य उदेश्य युद्ध को जिनता था। इन सभी द्रष्टिकोण के समर्थन में उन्होंने निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए है।

महमूद गजनवी ने भारत में हिंदू राजाओ के साथ – साथ मुस्लिम राजाओ के साथ भी युद्ध किया था। वह फ़तेह दाउद के साथ एक मुसलमान के रूप में लड़ा था। पर फ़तेह दाउद करामथिया जनजाती का था। अगर महमूद गजनवी इस्लाम धर्म के प्रचार के इरादे से आक्रमण करता था तो वह मुस्लिम राज्य के खिलाफ जरुर युद्ध छेड़ देगा।

मध्य एशिया के शासक जिनसे साथ लडे थे वह ना तो केवल हिंदू धर्म के अनुयायी थे, बल्कि इस्लाम धर्म के भी अनुयायी थे। उन्होंने पंजाब राज्य को गजनी राज्य साम्राज्य के लिए खंडित कर दिया था। अगर उसका उदेश्य सिर्फ धन को ही लूटना था, तो उसे पंजाब राज्य को अपने साम्राज्य में सलग्न करने की आवश्यकता बिलकुल ही नहीं थी।

और यह भी माननीय नहीं है की महमूद गजनवी ने किसी राजनितिक उदेश्य के लिए भारत देश पर आक्रमण किए थे। यह बात बिलकुल सच है की महमूद गजनवी ने पंजाब राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया था। लेकिन उन्होंने पंजाब के आलावा भारत के किसी भी अन्य हिस्से में प्रवेश नहीं किया था।

Last Final Word:

उपरोक्त दिए गए तीन विचारो के गहन के अध्ययन के बाद, हम यह निष्कर्ष पर पहुचे है की महमूद गजनवी वास्तव में एक डाकू था। इसलिए इस के बारे में कई तर्क सामने रखे गए है।

महमूद गजनवी के ज्यादातर आक्रमण उन जगहों पर हुए थे जो समृद्ध थे। उन्होंने ने हर एक हमले के बाद वहा पे लूटपाट की थी। वह कैदियों से पैसे लेकर उन्हें रिहा कर देता था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को अपना निशाना बनाया था क्योकि उन्हें यहाँ से बहुत ही धन मिल सकता था और इसके आलावा कोई स्थान इतना समृद्ध नहीं था।

महमूद गजनवी के आक्रमणों ने भारत के जीवन और मूल्यवान वस्तुओ को नष्ट कर दिया था। डॉ.जे.एल. मेहता यह बात कहने में सही है की महमूद गजनवी एक बहुत ही लालची व्यक्ति था जो सिर्फ पैसो के लिए जीता था और इसके लिए मर गया।

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