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महावीर स्वामी की जीवनी

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महावीर स्वामी ने अपने पुरे जीवन में लोगो को सत्य, प्रेम और अहिंसा के मार्ग पर चलने के ज्ञान को प्रदान किया था। महावीर स्वामी ने सभी लोगो को साथ में मिलजुल कर रहने की शिक्षा दी है। जिसके साथ साथ पशु के साथ होने वाले अत्याचार के प्रति और उनकी बलि चडाने की प्रथा पर तथा लोगो के बिच में हो रहे जाती के प्रति भेदभाव को ख़त्म करने के लिए आवाज़ उठाई। महावीर स्वामी दुनिया के उन महान आत्मा में से है जिसने मानवता के लिए और उनके कल्याण के लिए अपने शाही राजपाट को और सत्ता को छोड़ कर तपस्वी बनने के रस्ते पर चले गए। महावीर स्वामी के जीवन को देखकर उनके जीवन से सबको प्रेरणा मिलती है। महावीर एक युवराज थे जिनके पास राजपाठ, राजमहल, सत्ता और उनके मनोरंजन के लिए सभी चीजे हाजिर थी, जिसके बावजूद उन्होंने अपने सभी सुखो का त्याग कर दिया और सत्य को प्राप्त करने के लिए निकल पड़े।

महावीर स्वामी का जन्म और प्रारंभिक जीवन (Mahavir Swami Birth and Early Life)

जैन धर्म के महान तपस्वी महावीर स्वामी का जन्म लगभग 599 ईसा पूर्व में चैत्र महीने की त्रयोदशी के दिन को वैशाली गणतंत्र के क्षत्रियकुंड के विस्तार में हुआ था। उन्हों ने इक्षवाकु वंश में जन्म लिया था। महावीर के पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम रानी त्रिशला देवी था। वे जन्म से ही असाधारण प्रकृति के थे। महावीर स्वामी उनकी छोटी उम्र से ही काफी ज्यादा कुशल और बुध्धिजीवी थे। उन्हों ने कठोर तप के माध्यम से अपने जीवन को सफल बनाया था। महावीर के दुसरे भी कई सारे नाम है जैसे की सन्मति, महावीर और वर्धमान। उनके हर नाम के रखने के पीछे एक कहानी रही है, जिसकी वजह से उनके ये नाम रखे गए है। महावीर का वर्धमान नाम इसी लिए रखा गया था, क्योकि उनके जन्म के पश्यात साम्राज्य में अधिक ज्यादा उन्नति हुई, साथ ही साथ राज्य का विकास भी हुआ था। जबकि महावीर नाम उनका बचपन से ही तेज, साहसी और बलशाली होने के कारण रखा गया था। महावीर स्वामी ने अपनी इच्छाओ और सभी इन्द्रियों पर खुदकी पकड़ बना ली थी जिसकी वजह से उनको जितेन्द्र कहा जाता है।

महावीर स्वामी की शादी (Mahavir Swami’s Marriage)

महावीर स्वामी का जन्म महान साम्राज्य के राजा के घर में होने के बावजूद उनको सांसारिक सुख से लगाव बिलकुल नहीं था। महावीर स्वामी ने अपने माता-पिता के कहेने पर वसंतपुर के महासामंत समरवीर की पुत्री यशोदा से शादी की थी। महावीर को एक पुत्री भी थी जिसका नाम प्रियदर्शनी था।

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महावीर स्वामी जी का सन्यासी जीवन (Sanyasi Life of Mahavir Swami)

महावीर स्वामी को बचपन से ही सांसारिक सुख में कोई रूचि नहीं थी। अपने माता पिता की मृत्यु के पश्यात उन्होंने सन्यासी जीवन जीने की अपनी इच्छा व्यक्त की, किन्तू वे अपने भाई के कहने से कुछ दिनों के लिए रुक गए थे। 30 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी जी ने संसारिक जीवन और सभी मोह-माया को छोड़कर घर का त्याग करने का निर्णय कर लिया और वैरागी जीवन के लिए निकल पड़े। उनके द्वारा रचित महान उपदेश और उनकी दी गई शिक्षाओं के चलते कई बड़े राजा-महाराजा उनकी शिक्षा के अनुयायी बन गए थे। उन्हों ने उपदेशो की शिक्षा के साथ साथ पशु के साथ होने वाले अत्याचार के प्रति और उनकी बलि चडाने की प्रथा पर तथा लोगो को बिच में हो रही जाती के प्रति भेदभाव की निति के प्रति लोगो में जागृति लायी। महावीर ने अपने पुरे जीवन में लोगो को सत्य, प्रेम और अहिंसा के मार्ग पर चलने की शिक्षा को प्रदान की थी।

महावीर स्वामी की प्रसिद्ध एवं प्रेरक कहानी (Famous and inspiring stories of Mahavir Swami)

दोस्तों चलिए महावीर स्वामी के साथ सबंधित कहानी के बारे में जानते है।

महावीर स्वामी और ग्वाले की कहानी (Story of Mahavir Swami and the cowherd)

एक बार की बात है, महावीर स्वामी एक पेड़ के नीचे बैठ कर कठोर तपस्या कर रहे थे। उसी वक्त उस जगह पर एक ग्वाला अपनी गायों को लेकर आया, और महावीर से यह कहकर दूध बेचने निकल गया कि उसके वापस आने तक उनकी गायो का ख्याल रखे। ग्वाला अपना दूध बेचकर वापिस आया तो उसने देखा की उनकी गाये वहा पर नहीं थी। ग्वाला ने महावीर स्वामी से अपनी गाय के बारे में प्रश्न पूछा, किन्तु महावीर स्वामी ध्यान में मग्न होने के कारण उन्हों ने कोई जवाब नहीं दिया।

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महावीर स्वामी से जवाब न मिलने पर उसने पुरे वन में पूरी रात अपनी गायो की तलाश की, परन्तु उसे गाये नहीं मिली। थक कर वह वापिस महावीर स्वामी तप कर रहे थे उस जगह पर आया तब वहा का द्रश्य देख कर वह क्रोधित हो गया। ग्वाला की गाये महावीर स्वामी जी के पास ही खडी थी, जिसे देखकर उसने महावीर पर हुमला करने के लिए तैयारी कर ली।

उस वक्त दैविक शक्ति प्रकट हुई, और वार करने जा रहे ग्वाला को रोका और कहा की तुम उत्तर सुने बिना ही गायो को महावीर स्वामी के पास छोड़कर चले गए और अब अपनी गाये वापिस पाकर भी महावीर जी को दोषी मानते हो। तभी उस दिव्य शक्ति ने महावीर के विषय में उस ग्वाला को सारी बात बताई। जिसके पश्यात ग्वाला ने महावीर के चरणों गिर कर माफी मांगी, और अपनी गलती के लिए पछतावा व्यक्त करने लगा।

महावीर स्वामी एवं चंडकौशिक सर्प से जुड़ी अन्य प्रसिद्ध कथा (Other famous stories related to Mahavir Swami and Chand Kaushik snake)

एक दिन महावीर श्वेताम्बरी नगरी के विस्तार के घने वन में सत्य और परम ज्ञान की अनुभूति के लिए कठोर तपस्या करने के लिए जा रहे थे। उसी समय गांव के कुछ लोग ने उन्हें हमेशा क्रोध में रहने वाले एक सर्प के बारे में बताया। जिसका नाम चंदकौशिक था। गाव के लोगो ने जंगल में जाने के लिए महावीर स्वामी को रोकने की कोशिश कि, परंतु निडर और साहसी महावीर स्वामी बिना रुके जंगल में चले गए। महावीर स्वामी जंगल के बंजर विस्तार पे आकर तपस्या करने के लिए बैठ गए। उसी वक्त चंदकौशिक सर्प वहा आया और अपनी फैन फैलाकर महावीर जी की और बढ़ने लगा।

ऐसा होने पर भी महावीर अपने तप से विचलित नहीं हुए और देखते ही देखते चंडकौशिक सर्प ने महावीर के अंगूठे पर काट लिया। सर्प के काट ने पर भी महावीर अपनी तपस्या में मग्न रहे। महावीर पर सर्प के जहर का कोई असर नहीं हुआ। थोड़े समय के बाद उन्हों ने सर्प को स्नेह से कहा की एक बार तुम क्या कर रहे हो उसके बारे में विचार करो। जिसके बाद सर्प को अपना पिछला जन्म याद आया। और उसको अपने किये पर पछतावा हुआ, जिसके साथ ही उसका ह्रदय परिवर्तन हो गया।

महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध की समानता

महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध दोनों का जन्म एक राज परिवार में हुआ था। उनके पास सभी तरह की ऐश और आराम करने की एवं सुख समृद्धि से जुड़ी सभी तरह की चीजें उपलब्ध थी अगर वह चाहते तो अपने साम्राज्य के सिहासन पर बैठकर शांतिपूर्ण शासन कर सकते थे, परंतु महावीर और गौतम बुद्ध दोनों ही इन सभी मोह माया की चिज से विरक्त होकर सत्य की खोज मैं तपस्वी बनने का मन बना लिया था। इसी वजह से दोनों ने समान रूप से अपने साम्राज्य को त्याग कर घने जंगल में तपस्या करने के लिए जाने का निर्णय ले लिया।

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गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी तपस्या के साथ-साथ लोगों को उद्देश्य देने का कार्य भी करते थे। दोनों समान रूप से लोगों को अहिंसा के मार्ग पर चलने का ज्ञान देते थे क्योंकि उनका मानना था की अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। महावीर का जीवन दर्शन स्यादवाद, अनेकान्तवाद, त्रिरत्न और पंचमहाव्रत के आधारित तो दूसरी तरफ गौतम बुद्ध जीवन दर्शन आश्तांगिक मार्ग , प्रतीत्यसमुत्पाद, बुद्ध कथाएं, अनात्मक,आव्याकृत प्रश्नों पर बुद्ध का चुप रहाना आता था।

इस प्रकार दोनों धर्म यानी की बुद्ध और जैन धर्मों में यह समान चीज है कि दोनों सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, ब्रह्राचर्य, अहिंसा, सम्यक चरित्र, अनिश्वरवाद, तप और ध्यान इतयादी में विद्यमान है। दूसरे शब्द में कहे तो दोनों ही धर्म अपने आचरण करने वाले लोगों को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का और अपने जीवन को व्यतीत करने का संदेश देता है। गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी दोनों मे साल वृक्ष, तप, अहिंसा, क्षत्रिय और बिहार की जैसे गुणों की ही साम्यता रही है।

महावीर स्वामी जी की शिक्षाएं (Teachings of Mahavir Swamiji)

जैन धर्म के 24वें तीर्थकर महावीर स्वामी जी ने अपनी तपस्या के दौरान ही अपनी शिक्षाओं और उपदेशों के आधार से लोगो को जीवन जीने की रीत बताई, साथ ही साथ सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने का ज्ञान भी प्रदान किया है। महावीर स्वामी के द्वारा बताई गई शिक्षाएं और उपद्वेश ही जैन धर्म के प्रमुख पंचशील सिद्धांत रूप में आज भी मौजूद है। उनके दिए गए सिद्धांतों में सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय, अहिंसा और ब्रह्रमचर्य का समावेश होता है। पशु के प्रति होने वाले अत्याचार, पशु को बलि चढ़ाने की कुपरम्परा और हिन्दू समाज मे व्याप्त हो रहे लोगो के भीतर चल रहा जातिवाद का विरोध महावीर जी ने किया था। जिसके साथ साथ इन सिद्धान्तों और शिक्षाओं को आचरण में आकर कोई भी इंसान एक सच्चा जैन अनुयायी बन सकता है उसका संदेश प्रदान किया।

महावीर स्वामी जी द्वारा बताए गए पंचशील सिद्धान्त इस प्रकार हैं (Mahavir Swami Panchshil Siddhant)

प्रथम उपदेश : सत्य

जैन धर्म के मुख्य तीर्थकर ऐसे महावीर स्वामी जी ने अपने पंचशील के सिद्धांतों में सबसे प्रथम स्थान ‘सत्य’ को दिया है। महावीर के आधार पर सत्य दुनिया का सबसे ज्यादा शक्तिमान और महान धर्म है। उन्होंने अपने सिद्धांत में लोको को हमेशा सत्य के मार्ग पर चलने का और सत्य का आचरण करते हुए सच का साथ देने के बारे में संदेश दिया है।

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दूसरा उपदेश : अहिंसा

महावीर स्वामी ने अपने पंचशील के सिद्धांतों में दूसरे स्थान पर जियो और जीने दो सिद्धान्त के आधार पर अहिंसा को दूसरा सबसे ज्यादा महान धर्म माना है। महान तीर्थकर महावीर स्वामी जी ने अहिंसा के बारे में बताते हुए कहा है कि लोगों को अहिंसा का आचरण करना चाहिए और एक दुसरे के साथ मिलजुल कर बिना किसी मनभेद से रहना चाहिए।

तीसरा उपदेश : अस्तेय

महावीर स्वामी ने अस्तेय को मनुष्य का तीसरा सबसे ज्यादा बड़ा धर्म माना है। महावीर ने मनुष्य को दयाभाव-करुणाभाव और मानवता की शीख के साथ साथ मनुष्य को अस्तेय का आचरण करने की शिक्षा भी दी है। अस्तेय का अर्थ है कि किसी भी चीज की चोरी न करना। मनुष्य को अपनी ही वस्तुओं में आनंदित और संतुष्ट रहना चाहिए।

चतुर्थ उपदेश: ब्रहाचर्य

महावीर स्वामी के द्धारा बताए गए मुख्य उपदेश में ब्रहाचर्य भी आता है, जिसका पालन करना इतना आसान नहीं है, केवल एक सच्चा और दृढ़निश्चयी अनुयायी ही इसका पालन कर सकता है। ब्रह्राचर्य का आचरण करने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

पंचम उपदेश: अपरिग्रह

महावीर स्वामी के द्धारा बताए गए अपरिग्रह का अर्थ किसी भी अतिरिक्त चीजों का संचय न करना होता है। इसीलिए महावीर स्वामी ने अपने पंचशील सिद्धांतों में अपरिग्रह को भी मुख्य धर्म में से एक बताया है। महावीर के यह उपदेश मनुष्य को यह शिक्षा प्रदान करवाता है कि संसारिक मोह-माया ही इंसान को दुखों के मार्ग पर ले जाता है।

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महावीर जयंती (Mahavir Jayanti)

भगवान महावीर स्वामी जी जैन धर्म के मुख्य तीर्थकर है उनकी जयंती हिन्दू धर्म के कैलेंडर के आधार पर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदसी के दिन पूरे भारत में मनायी जाती है।

महावीर स्वामी का जन्म साल 599 ईसा पूर्व में चैत्र मास की 13वें दिन, बिहार के वैशली में स्थित कुण्डलपुर गांव के विस्तार में राजपरिवार में हुआ था। जिसकी वजह से महावीर के जन्मदिन को जैन धर्म के आचरण करने वाले लोगों के द्धारा महावीर जयंती तथा जैन महापर्व के रुप से उत्साह के साथ मनाया जाता है। महावीर जयंती अंग्रेजी कैलेंडर के आधार पर देखे तो मार्च माह के अंतिम और अप्रैल माह की शुरुआत में आती है।

महावीर जयंती के अवसर पर जैन मंदिरों को अत्यंत आर्कषक तौर पर शुसोभित किया जाता है, साथ ही साथ इसी समय पर जैन धर्म के लोगों के द्धारा भव्य शोभायात्राएं भी निकाली जाती है जो उसकी परंपरा है। महावीर जयंती के अवसर पर जैन धर्म का आचरण करने वाले लोग महावीर स्वामी द्धारा बताये गए उपदेश का आचरण करने का वचन भी लेते हैं। साथ ही उनके द्धारा दीए गये उपदेशों और सिद्धांतों को याद करते है। महावीर जयंती के दिन भारत सरकार की ओर से अधिकारिक छुट्टी भी दी जाती है। जिसके साथ साथ देश के सभी स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, कोर्ट ओर बैंक समेत सरकारी संस्थान में छुट्टी होती है

महावीर स्वामी के मुख्य कार्य (Mahavir Sami Main Work)

महावीर स्वामी का सभी लोग आदर करते थे। सभी स्थिति में उन्होंने अहिंसा के मार्ग का ही साथ दिया है और उनके इसी उपदेश की असर महात्मा गांधी और रविंद्रनाथ टागोर जैसे महान नेता पर भी हुई है। महावीर स्वामी के काल को अशांत काल कहा जाता था। उस वक्त ब्राह्मणों का वर्चस्व बहुत फ़ैला हुआ था। वे खुद को दूसरी जातियों की सामने सर्वश्रेष्ठ और महान मानते थे। ब्राह्मणों के संस्कार और रितिरिवाज का क्षत्रिय धर्म के लोग विरोध करते थे। जिसमे पशु की हत्या करके उसे बलि पर चड़ा देते थे। महावीर जी एक ऐसे मनुष्य थे जिन्होंने अहिंसा के मार्ग का प्रचार किया और निर्दोष पशु की बलि चड़ाने की परंपरा के प्रति अपना विरोध जाहिर किया।

महावीर स्वामी ने पूरे हिन्दुस्तान में प्रवास किया है और अपने उपदेश की शिख़ सभी को प्रदान की है, जो 8 विश्वास के तत्वों पर, 3 अध्यात्मिक तत्त्वों पर और 5 नैतिक तत्त्वों पर आधारित है। जिसमे “अहिंसा” जिसका अर्थ हिंसा न करना, “सत्य” जिसका मतलब सच बोलना, “अस्तेय” चोरी ना करना, “ब्रह्मचर्य” जिसका अर्थ शुद्ध आचरण और “अपरिग्रह “ का मतलब संपत्ति को जमा ना करना होता है।

महावीर स्वामी का निर्वाण प्राप्त करना (Mahavir Nirvan)

सभी मनुष्य को सत्य और अहिंसा की राह पर चलने का सिद्धांत देने वाले महान तपस्वी महावीर स्वामी साल 527 ईसा पूर्व में हिन्दी कैलेंडर के मुताबिक कार्तिक महीने की अमावस्या के दिन बिहार में स्थित पावापुरी में अपने प्राणों को त्याग दिया। इस जगह को जैन धर्म के मुख्य ओर पवित्र स्थान के रुप उसकी पूजा की जाती है। उनके निर्वाण दिन पर जैन धर्म के अनुयायी दीपक जलाते हैं। भगवान महावीर के मृत्यु के लगभग 200 साल पश्यात जैन धर्म दो भागो में विभाजित किया गया। एक दिगम्बर और दूसरा श्वेताम्बर था। दोनों संप्रदाय में से दिगंबर संप्रदाय के जैन संत अपने वस्त्रों का त्याग कर देते हैं। श्वेतांबर संप्रदाय के जैन संत सफेद वस्त्र धारण करते हैं।

महावीर स्वामी जी के अनमोल कथन (Mahavir Quotes)

महावीर स्वामी ने अपने सिद्धांतों और उपदेशों के आधार पर मनुष्य अपने जीवन में केसे सफलता हासिल कर सकता है उसके बारे में ज्ञान प्रदान किया है। महावीर स्वामी जी के सबसे ज्यादा प्रेरणादायक और अनमोल वाक्य कुछ इस प्रकार है: मनुष्य को जियो और जीने दो के संदेश को ध्यान में रख कर किसी को भी दुखी नहीं करना चाहिए, जैसे हमें हमारा जीवन कीमती लगता है वैसे ही उनके लिए भी उनका जीवन कीमती होता है।

  • “स्वयं पर जीत हासिल करना लाखों दुश्मनों पर जीत हासिल करने से ज्यादा बेहतर है।”
  • “सभी लोको के प्रति दयाभाव रखो, नफरत और घृणा करने से सर्वनाश होता है।”
  • “आत्मा अजर-अमर है जो कि अकेली ही आती है और अकेले ही जाती है, उसका न कोई साथ देता है और न ही कोई मित्र बनता है।”
  • “क्रोध हमेशा ही ज्यादा क्रोध को जन्म देता है, जबकि क्षमा तथा प्रेम हमेशा ज्यादा क्षमा और प्रेम को जन्म देते हैं।”

महावीर स्वामी जी के स्तवन (जैन स्तवन भजन) – Mahavir Swami Stavan

श्री शुभविजय सुगुरु नमी, नमी पद्धावती माय,

भव सत्तावीश वर्णवुं, सुणतां समकित थाय,

समकित पामे जीवने, भव गणिती अे गणाय

जो वली संसारे भमे, तो पण मुगते जाय,

वीर जिनेश्वर साहिबो भमियो काल अनंत.

पण समकित पाम्या पछी, अंते थया अरिहंत …।।

स्तवन 2 – Mahavir Stavan

नयर माहणकुंडमां वसे रे, महाऋद्धि, ऋषभत्त नाम,

देवानंद द्धिज श्राविका रे, पेट लीधो प्रभु विसराम रे,पेट लीधो प्रभु विसराम…

बयासी दिवसने अंतरे रे, सुर हरिणमेषी आय,

सिद्धारथ राजा घरे रे, त्रिशला कुखे छटकाय रे….

नव मासांतरे जनमीया रे, देव देवीये ओच्छव कीध,

परणी यशोदा जोबने रे, नामे महावीर प्रसिद्ध रे…

जैन धर्म के प्रमुख पर्व (Jain Festival)

  • महावीर जयंती( Mahavir Jayanti)
  • पर्युषन पर्व प्रारंभ दिवस (Paryushan)
  • वर्षीतय प्रारंभ दिवस
  • अक्षय तृतीया ( Akshaya Tritiya)
  • भगवान पार्श्वनाथ जन्मदिवस (Bhagawan Parshwanath Jayanti)
  • संवत्सरी महापर्व (Sanvatsari Mahaparva)
Last Final Word:

दोस्तों यह थी महावीर स्वामी के बारे में सम्पूर्ण जानकारी। उम्मीद है इस जानकारी से आपके सभी सवालों के जवाब मिल गए होंगे अगर अभी भी आपके मन में कोई सवाल रह गया हो तो हमें कमेंट के माध्यम से जरुर बताये।

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