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महाराणा उदयसिंह द्वितीय का जीवन परिचय

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उदयसिंह द्वितीय का जन्म 4 अगस्त 1522 में राजस्थान के चितौरगढ़ दुर्गा में हुआ था। उनकी माता का नाम रानी कर्णावती और पिता का नाम राणा सांगा था। राणा उदयसिंह का राज्य अभिषेक 1540 चितौडगढ़ में हुआ था। उन्हों ने 1540 से 1572 तक चितौडगढ़ पर शासन किया था, फिर उनके पुत्र महाराणा प्रताप ने चितौड़गढ़ पर राज किया था। राणा उदासिंह को 22 पत्नियाँ या थी महाराणी जयवंता बाई प्रमुख थी, राणा उदयसिंह का राजवंश सिसोदिया राजपूत था, राणा उदयसिंह के 22 पुत्र थे। राणा उदयसिंह मेवाड़ के 53 में शासक थे, और राणा सांगा के 4 पुत्र थे। महाराणा उदयसिंह की मृत्यु 28 फरवरी 1572 में 49 वर्ष की उम्र में गोगुन्दा राजस्थान में हुई थी।

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शासनावधि : 1540-1572 (32 साल)
राज्याभिषेक : 1540, चित्तौड़गढ़
पूर्ववर्ती : बनवीर
उत्तरवर्ती : महाराणा प्रताप
जन्म : 4 अगस्त 1522
चित्तौड़गढ़ दुर्ग, राजस्थान, भारत
निधन : 28 फ़रवरी 1572 (उम्र 49)
गोगुन्दा ,राजस्थान ,भारत
संगिनी : महारानी जयवंता बाई , स्वरूपदे
राजवंश : सिसोदिया (राजपूत)
पिता : राणा सांगा
माता : रानी कर्णावती
धर्म : हिन्दू

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महाराणा उदयसिंह द्वितीय का जीवन परिचय (Biography of Maharana Udai Singh)

उदयसिंह का जन्म राजस्थान के चितौडगढ़ में हुआ था और उनके पिता राणा सांगा के मृत्यु के बाद रतनसिंह द्वितीय को नया शासक घोषित किया गया था। रतनसिंह ने 1531 तक शासक किया था। राणा विक्रमादित्य सिंह के शासनकाल में बहादुर शाह ने चितौगढ़ के ऊपर हमला कर दिया और इस कारण से उदयसिंह को बुदी भेज दिया गया तक वे सुरक्षित रहे। बनवीर ने राणा विक्रमादित्य की गला घोट कर हत्या करदी थी और उसके बाद बनवीर ने उदयसिंह को मार ने का प्रयास किया लेकिन उदयसिंह की धाय माँ पत्रा धाय राजपरिवार की सदस्य तो नही थी। वे हरिचन्द्र पुत्री थी उन्होंने उदयसिंह को माँ के स्थान पर दूध पिला ने के कारण पत्रा धाय माँ कहलाई थी। उन्होंने उदयसिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे दिया था। और इसी कारण से उदयसिंह जीवित रह पाए पात्र धाय ने यह जानकारी किसी को भी नही दी थी की बनवीर ने जिसको मारा है, वह राजकुमार उदयसिंह नही बल्कि उनका पुत्र है। इसके बाद पत्रा धाय बूंदी में रहने लगी लेकिन उदयसिंह को अपने आने जाने और मिलने की अनुमति नही दी था। उदयसिंह को ख़ुफ़िया तरीके से कुम्भलगढ़ दो वर्ष के लिए रखा गया था। इसके बाद उदयसिंह को कुम्भलगढ़ में 1540 की साल में राजतिलक किया गया और मेवाड़ का राणा बनया गया था।

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महाराणा उदयसिंह के द्वारा बनवीर की हत्या (Banveer was killed by Maharana Udai Singh)

उदयसिंह  के द्वारा साल 1540 में जोधपुर के शासक मालदेव के सहयोग से मावली (उदयपुर) में बनवीर की हत्या कर देते है। बनवीर की हत्या के बाद मेवाड़ का चित्तौड़गढ़ पर उदय सिंह ने कब्जा कर लिया था। राणा उदयसिंह को अपना पैतृक गढ़ सन 1540 में प्राप्त हो जाता है। राणा उदयसिंह महादेव से प्रसन्न होकर मालदेव को अपना प्रिय हाथी बसंतराय भेट स्वरूप देते है।

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महाराणा उदयसिंह द्वितीय का वैवाहिक जीवन (Married life of Maharana Udai Singh)

उदयसिंह के सबसे बड़े पुत्र का नाम महाराणा प्रताप था और पहली पत्नी का नाम जयवंता बाई था। जयवंता बाई राणा उदयसिंह को राजनीती के विषय में सलहा देती थी। जयवंता बाई के पुत्र का नाम प्रताप था। उन्होंने प्रताप के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उदयसिंह की दूसरी पत्नी का नाम सज्जा बाई सोलंकी था। सज्जा बाई ने शक्तिसिंह और विक्रमसिंह को जन्म दिया था और उनकी तिसरी पत्नी धिरबाई थी जिन्हों ने जगमाल सिंह, चांदकंवर और मांकवर को जन्म दिया था। यह तिनी पत्नी या उदयसिंह की मुख्य रानीया थी चौथी पत्नी विराबाई झाला थी जिन्हों ने जेठ सिंह को जन्म दिया था। कुछ किवदन्तियो के अनुसार राणा उदयसिंह की 22 पत्निया और 53 पुत्र एवं 22 पुत्रिया थी।

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शेरशाह सूरी द्वारा चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण (Invasion of Chittorgarh Fort by Sher Shah Suri)

शेरशाह सूरी ने वर्ष 1534 ईस्वी को चित्तौड़गढ़ पर हमला कर देता है,लेकिन महाराणा उदयसिंह द्वितीय ने शेरशाह सूरी को चित्तौड़गढ़ बिना किसी युद्ध के सौप देते है, और उसके बाद बाद शेरशाह सूरी ने सम्सख्वास्खाँ को चित्तौड़गढ़ दुर्ग का प्रशासक बना देते है। तथा चित्तौड़गढ़ पर शासन करने लग जाते है। महाराणा उदयसिंह द्वितीय मेवाड़ का प्रथम शासक था, जिन्होंने अफगानी शासन की अधीनता स्वीकार की थी। इसके अलावा महाराणा उदयसिंह, छापामार और गोरिल्ला युद्ध की कला में बहुत अच्छे थे। इस कला में महाराणा उदयसिंह मेवाड़ के पहले शासक थे। इसी युद्ध कला के कारण महाराणा उदयसिंह ने शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद फिर से चित्तौड़गढ़  पर शासक किया।

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महाराणा उदयसिंह द्वारा जयमल राठौड़ को शरण (Asylum to Jaimal Rathod by Maharana Udai Singh)

साल 1562 में अकबर ने मेड़ता, नागौर के शासक जयमल राठौड़ पर हमला कर दिया था। तब महाराणा उदय सिंह ने जयमल राठौड़ को अपने चितौडगढ़ में शरण दी थी। इसी कारण से सन 1567 में जलाल उद्दीन अकबर ने मांडलगढ़ भीलवाड़ा के मार्ग चित्तौड़गढ़ पर हमला कर दिया था। इस वजह से उदयसिंह गोगुंदा की पहाड़ियों में भाग जाते है। तथा अकबर ने महाराणा उदयसिंह का पीछा करने के लिए हैसन कुली खां को भेज देते हैं। महाराणा उदयसिंह द्वितीय चित्तौड़गढ़ का शासन जयमल राठौड़ और फतेह सिंह को सौंप देता है।

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राणा उदयसिंह द्वितीय का अकबर से युद्ध (Rana Udai Singh’s war with Akbar)

साल 1567 में जब चित्तौड़गढ़ में अकबर ने इस किले का दूसरी बार हमला किया तो यहां राणा उदयसिंह की सूझबूझ काम में आय थी। अकबर की पहली चढ़ाई को उदयसिंह  ने निष्फल कर दिया था। पर जब दूसरी बार चढ़ाई की गयी तो लगभग छह मॉस के इस घेरे में किले के पास के कुओं तक में पिने का पानी समाप्त होने लगा। किले के पास के लोगों की और सेना की स्थिति बहुत खराब होने लगी थी। तब किले के रक्षकदल सेना के उच्च पदाधिकारियों और राज्य दरबारियों ने मिलकर राणा उदयसिंह से निवेदन किया कि राणा संग्राम सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में आप ही हमारे भीतर हैं, इस लिए आपकी जीवन की रक्षा इस समय बहुत आवश्यक है। आप को इस किले से सुरक्षित निकालकर हम सभी दुश्मनि सेना पर युद्ध करने के लिए निकल पड़ेंगे। तब महाराणा उदयसिंह द्वितीय ने सभी राजकोष को सावधानी से निकाला और उन्हें साथ लेकर पीछे से अपने कुछ विश्वास अंग रक्षको के साथ किले को छोड़कर निकल गये। फिर अगले दिन अकबर की सेना के साथ उनकी सैना का बहुत ही भयंकर युद्ध हुआ था, और वीर राजपूतों ने अपना आखरी बलिदान दिया। अनेकों वीरों की छाती पर पैर रखता हुआ अकबर चितौड के किले में घुसा तो उसे जल्दी ही पता चल गया कि वह युद्ध तो जीत गया है, परन्तु कूटनीति में हार गया है।

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महाराणा उदयसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद (After the death of Maharana Udai Singh)

साल 28 फरवरी 1572 में राजस्थान के गोगुन्दा में हुई थी। महाराणा उदयसिंह ने अपनी मृत्यु से पहले राजकुमार जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित किया था। महाराणा प्रताप महाराणा उदयसिंह द्वितीय की अंतिम क्रिया करने के बाद राज्य दरबारियों ने राणा जगमल को राजगद्दी से उतारकर महाराणा प्रताप को राजगद्दी पर बैठा दिया। इस प्रकार एक मौन क्रांति हुई और मेवाड़ का शासक उदयसिंह की इच्छा से नही बल्कि दरबारियों की इच्छा से महाराणा प्रताप बने। इस घटना को इसी रूप में अधिकांश इतिहासकारों ने उल्लेखित किया है। इसी घटना से एक बात स्पष्ट हो जाती है,कि प्रताप और उनके पिता उदयसिंह के बीच के संबंध इतने अच्छे नही थे। कई लेखक ने महाराणा संग्राम सिंह और महाराणा प्रताप के बीच खड़े राणा उदयसिंह की उपेक्षा करनी आरंभ कर दी। जिससे राणा उदयसिंह के साथ कई प्रकार के आरोप मढ़ दिये गये। जिससे इतिहास में उन्हें एक विलासी और कायर शासक के रूप में निरूपति किया गया है।

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(1326–1884)
राणा हम्मीर सिंह(1326–1364)
राणा क्षेत्र सिंह(1364–1382)
राणा लखा(1382–1421)
राणा मोकल(1421–1433)
राणा कुम्भ(1433–1468)
उदयसिंह प्रथम(1468–1473)
राणा रायमल(1473–1508)
राणा सांगा(1508–1527)
रतन सिंह द्वितीय(1528–1531)
राणा विक्रमादित्य सिंह(1531–1536)
बनवीर सिंह(1536–1540)
उदयसिंह द्वितीय(1540–1572)
महाराणा प्रताप(1572–1597)
अमर सिंह प्रथम(1597–1620)
करण सिंह द्वितीय(1620–1628)
जगत सिंह प्रथम(1628–1652)
राज सिंह प्रथम(1652–1680)
जय सिंह(1680–1698)
अमर सिंह द्वितीय(1698–1710)
संग्राम सिंह द्वितीय(1710–1734)
जगत सिंह द्वितीय(1734–1751)
प्रताप सिंह द्वितीय(1751–1754)
राज सिंह द्वितीय(1754–1762)
अरी सिंह द्वितीय(1762–1772)
हम्मीर सिंह द्वितीय(1772–1778)
भीम सिंह(1778–1828)
जवान सिंह(1828–1838)
सरदार सिंह(1838–1842)
स्वरूप सिंह(1842–1861)
शम्भू सिंह(1861–1874)
उदयपुर के सज्जन सिंह(1874–1884)
फतेह सिंह(1884–1930)
भूपाल सिंह(1930–1947)
भगवंत सिंह(1947-1970)
महेन्द्र सिंह(1970-

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Last Final Word

दोस्तों हमारे आज के इस आर्टिकल में हमने महाराणा उदयसिंह द्वितीय के जीवन परिचय के बारे में बतया जैसे की उदयसिंह का जीवन परिचय, महाराणा उदयसिंह का राज्य अभिषेक, उदयसिंह द्वारा बनवीर की हत्या, उदयसिंह का वैवाहिक जीवन, उदयसिंह और अकबर का युद्ध, उदयसिंह की मृत्यु और महाराणा उदयसिंह के इतिहास से जुडी सभी जानकारी से वाकिफ हो चुके होंगे

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