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महाराणा प्रताप का जीवन परिचय

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भारत में सदीओ से कई सारे महान राजा ने सफलता पूर्वक शासन किया था। भारत का इतिहास देखे तो कई सारे महाराजा ने अपने राज्य के लिए अपनी जान की आहुति दी है और उनकी बहादुरी के किस्से आज भी भारत के इतिहास के पन्नो पर देख सकते है, उनको देख कर हमें गर्व की अनुभूति होती है की भारत में एसे भी राजा थे जिन्हों ने अपनी कौशल्यता का उपयोग कर के भारत देश का नाम दुनिया में अमर कर दिया है। भारत में चन्द्रगुप्त मौर्य, कृष्णदेवराय और पृथ्वीराज चौहान जैसे महान राजा हो चुके है। एसे ही एक महान हिंदू महाराजा महाराणा प्रताप के बारे में आज हम इस आर्टिकल में बात करेंगे। उम्मीद है की आप हमारी दी गई जानकारी को ध्यान से पढेंगे ताकि आपको हमारे देश के महान महाराजा महाराणा प्रताप के बारे में सम्पूर्ण माहिती मिल सके।

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महाराणा प्रताप का जीवन (Life of Maharana Pratap)

महाराणा प्रताप का नाम इतिहास के पन्नो में वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम और दृढ़ संकल्प के लिए जाना जाता है। उनकी प्रतिभा से पुरे देश को उन पर गर्व है। उनका कौशल, शुर्विरता, बहादुरी के किस्से भारत में ही नहीं आसपास के सभी देश में प्रचलित है। तो चलिए देखते है की महाराणा प्रताप का जीवन परिचय।

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महाराणा प्रताप का जीवन परिचय (Biography of Maharana Pratap)

वीर योद्धा प्रताप से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ:

नाममहाराणा प्रताप
जन्म9 मई 1540
आयु95 वर्ष (मृत्यु तक)
जन्म स्थानराजस्थान राज्य के कुंभलगढ़ दुर्ग
पिता का नाममहाराजा उदया सिंह
माता का नामरानी जयवंता कवर
पत्नी का नाममहारानी अजबदे पंवार सहित कुल 11 पत्नियाँ
पेशामहाराजा
घोड़ाचेतक
बच्चे
मृत्युवर्ष 1597 में 19 जनवरी
मृत्यु स्थानकुंभलगढ़ दुर्ग
भाई-बहन
राज्यकुंभलगढ़ दुर्ग

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महाराणा प्रताप कौन थे? (Who Was Maharana Pratap?)

उदयपुर के मेवाड में सिसोदिया नामक राजवंश के एक वीर शासक जिसे सब महाराणा प्रताप के नाम से जानते है। राणा प्रताप की वीरता, शूरवीरता, बुध्धिमत्ता, बहादुरी के कारण उनका नाम भारत के इतिहास के पन्नो में अमर हो गया है। वह एक बार जो संकल्प ले लेते थे तो उसे पूरा करने के लिए वो अपनी जान भी लगा देते थे। प्रताप अपने वचनों पर कायम रहने के लिए जाने जाते है।

बादशाह अकबर जिसका साम्राज्य बहुत बड़ा था और उनके पास विशाल सैन्य भी था, जिसके बावजूद प्रताप ने कई साल तक उनको भी युद्ध में पराजित भी किया था। उन्होंने मुग़ल साम्राज्य की नीव को हिला कर रख दिया था।

महाराणा प्राप्त का जन्म महाराजा उदय सिंह और माता रानी जयवंता के घर में राजस्थान राज्य में आये हुए कुंभलगढ़ में आनंद के साथ हुआ था। राणा प्रताप अपने शौर्य और वीरता के आधार पर कई सारे राज्यो पर अपना अधिकार जमा लिया था। किन्तु उन्हों ने उनके जीते हुए साम्राज्य पर कभी शासन नहीं किया, और वहा के महाराजा से मित्रता का हाथ आगे बढ़ाते हुए उनको उनका राज्य वापिस सौंप देते थे। महाराणा प्रताप के बारे में यह भी कहा जाता है की अगर वह एक बार किसी चीज के लिए दृढ़ संकल्प कर ले तो वो किसी भी हाल में उसे पूरा करते थे।

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महाराणा प्रताप के पास एक बहेतरीन घोड़ा था, जिसकी समझदारी बहुत ज्यादा थी। वह महराणा प्रताप का अच्छा और सच्चा साथी था। राणा प्रताप के पास शूरवीर सैनिको की फोज थी, जो महाराणा प्रताप के लिए अपनी जान की आहुति देने के लिए हंमेशा तैयार रहते थे। दुसरे शब्द में कहे तो राणा प्रताप के पास प्रमुख सैनिक का विशाल दल भी था।

महाराणा प्रताप का जन्म कब और कहा हुआ था? (When and where was Maharana Pratap Born?)

महाराणा प्रताप का जन्म उदय सिंह और रानी जयवंता के घर बड़े ही ख़ुशी के साथ राजस्थान में स्थापित कुंभलगढ़ दुर्ग में 9 मई के दिन 1540 की साल में हुआ था। महाराणा प्रताप का जन्म राजपूतना घर के वंश में हुआ था। महाराणा उदय सिंह के पास महारानी जयवंता के अलावा भी पत्नीया थी, जिसमे में से उनकी प्रिय पत्नी का नाम धीरबाई था।

धिरबाई को भी एक पुत्र था जिसक नाम जगमाल था। उनकी इच्छा थी की उनका पुत्र आगे जाके उत्तराधिकारी बने और साम्राज्य को आगे ले जाए। महाराणा उदय सिंह को इन दोनों के अलावा भी दो पुत्र थे, जिसके नाम शक्तिसिंह और सागरसिंह था। स्वाभाविक रूप से इन दोनों को भी साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनने की प्रबल मनोकामना थी। लेकिन प्रजा और महाराणा उदयसिंह ने राज गद्दी का उत्तराधिकारी राणा प्रताप को मान लिया था।

महाराणा प्रताप की लंबाई और उनका वजन कितना था? (What was the Height and Weight of Maharana Pratap?)

महाराणा प्रताप की लंबाई करीब साडे 7 फुट जीतनी थी। जबकि उनका वजन करीबन 110 किलोग्राम था। यदि हम उनके सुरक्षा कवच के वजन की बात करे तो करीब 72 किलिग्राम जितना भारी कवच वो पहनते थे। राणा प्रताप के एक भाले का वजन लगभग 80 किलोग्राम था।

महाराणा प्रताप जब उनका कवच और तलवार के ढाल के साथ तैयार होते थे, तब उन सबका वजन मिलाकर लगभग 200 किलोग्राम या तो उनसे भी ज्यादा होता था। इस के आधार पर हम कह सकते है की प्रताप जब लड़ाई करने जाते थे तब वो 200 किलोग्राम जितना वजन लेकर लड़ाई करने के लिए मैदान में उतर ते थे। राणा प्रताप की तलवार, उनका कवच और उनकी बहुमूल्य चीजो को आज भी उदयपुर के राजघराने की विरासत के तौर पर संभालकर संग्रहालय में सुरक्षित तौर पर रखा गया है।

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महाराणा प्रताप का प्रारंभिक जीवन कैसा था? (Early Life of Maharana Pratap)

महाराणा प्रताप बहुत ही शूरवीर, प्रतापी, बहादुर और साहसी राजा थे। प्रताप ने अपनी छोटी सी उम्र में ही अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया था। बचपन से ही वह एक साहसी और वीरताभरे कार्य करने लगे थे। उनका बचपन का नाम किका था। प्रताप शूरवीर, साहसी, स्वाभिमानी, स्वतंत्रता के प्रिय रहे है।

जब महाराणा प्रताप सिंहासन को धारण करने वाले थे तभी एक बहुत ही बड़ी संकट की स्थिति आन पड़ी, किन्तु विपत्ति से पीछे न हट कर उन्होंने परेशानी का सामना बड़े ही धैर्य, साहस और शुरविरता से साथ किया। उन्हों ने अपनी बहादुरी से परेशानी को हरा दिया। राणा प्रताप को ढाल और तलवार चलाने का प्रशिक्षण उनके पिता उदयसिंह के द्वारा मिला था।राजा उदयसिंह उनको एक कुशल योध्धा बनाना चाहते थे।

राणा प्रताप जब भी अपने बचपन में अपने मित्रो के साथ घुमने जाते थे तब वह अपने सैन्य के लिए एक सैनिक दल को तैयार कर रहे थे। इसी दौरान यह उन बच्चो को ढाल और तलवार चलाने की प्रशिक्षा उनको देते थे। प्रताप अपने इस दल के साथ खेल के द्वारा तलवार और ढाल को चलाने की कला में बहुत ही पारंगत हो गये थे। राणा प्रताप अपनी कला में इतने कुशल हो गए थे उनको हराना बिलकुल ना मुनकिन था।

हम सब जानते है की प्रताप अपने वचन के लिए कितने कर्तव्यनिष्ठ है, राणा प्रताप ने अपने पिता की अंतिम इच्छा को पूर्ण करने के लिए अपने सौतेले भाई जगमाल को साम्राज्य का राजा बनाने की घोषणा कर दी थी। किन्तु मेवाड़ के विश्वासी राजपुरोहित ने जगमाला के बारे में कुछ इस प्रकार बताया है की जो जगमाला को मेवाड़ के साम्राज्य का राजा बना दिया जाता है तो यह मेवाड़ की जनता के लिए विनाशकारी साबित हो सकता था। इसी लिए जगमाल को सिंहासन को छोड़ने के लिए बोला गया था।

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जगमाल को सिंहासन को छोड़ ने की बात से बहुत ही गुस्सा आया था। गुस्से में आकर जगमाला ने अकबर से हाथ मिला लिया और उसकी सेना को मेवाड़ की सारी माहिती को बता दिया था। जिसके बदले में अकबर ने जगमाला को जहाजपुर की जागीर को भेट में दे दीया।

महाराणा प्रताप की वीरता से सबंधित बहुत से आदर्श मत किये गए है। यह आदर्श मत दुसरे किसी भी राजा के बारे में नहीं किये गए। प्रताप ने जिन जिन परेशानी का सामना किया है, उतनी परेशानि दुसरे किसी भी राजा को नहीं हुयी। आने वाले सभी संघर्षो का सामना उन्हों ने साहस के साथ किया और कभी हार नहीं मानी। यदि राजपूतो को भारत के इतिहास में सम्मान मिल सका है तो उनका पूरा श्रेय राणा प्रताप को जाता है।

वीर योद्धा महाराणा प्रताप की युद्ध नीति कैसी थी? (War Policy of Maharana Pratap)

महाराणा प्रताप ने बहुत से युध्ध किये है, और सफलता पूर्वक उन सभी युध्ध को जीता है। चलिए देखते है की प्रताप अपने युध्ध के लिए कौन कौन सी निति का उपयोग करते थे।

  • महाराणा प्रताप की युध्ध निति में सबसे ऊपर किसी के भी सामने हार नहीं मानना चाहे सामने कोई भी हो।
  • राणा प्रताप हंमेशा कहते थे की किसी भी युध्ध को जितने के लिए सबसे पहले आपको अपने खुद पर आत्मविश्वास रखना चाहिए।
  • आपको किसी भी लड़ाई में भाग लेने से पहले उस लड़ाई से सबंधित कुछ महत्वपूर्ण वचन कर लेने चाहिए।
  • अगर आपको युध्ध में जितना है तो आपके पास कुशल और साहसी एवं निपुण सैनिक दल की और सेनापति की आवश्यकता रहेंगी।

मातृभूमि के रक्षक थे वीर योद्धा महाराणा प्रताप (The Protector of the Motherland, Maharana Pratap)

महाराणा प्रताप के महाराजा बनते ही मेवाड का राज्य बड़ा ही शक्तिशाली राज्य बन गया था। जलालुद्दीन अकबर ने मेवाड़ राज्य को 1572 साल तक उत्तर पूर्व और पश्चिम के मुगल प्रदेशों से सम्पूर्ण रूप से गिरा चुका था। अकबर प्रताप को आर्थिक रूप से कमजोर करना चाहता था। अकबर की चाल यह थी की वह आर्थिक, सैनिक और राजनीतिक पर दबाव डालकर बिना युध्ध के मेवाड़ के साम्राज्य को प्राप्त करना चाहता था।

हमने आगे देखा की प्रताप का सौतेला भाइ जगमाला जलालुद्दीन अकबर की जागीर को स्वीकार करके उसका गुलाम बन चूका था, उस समय सिर्फ राणा प्रताप के पास मेवाड़ के बहुत ही कम पर्वती क्षेत्र ही बचे थे। इस पर्वतीय विस्तार की लम्बाई और चौड़ाई समान रूप से 30 किलोमीटर की थी। अकबर के पास बहुत ही धन संपति थी जिसके आगे मेवाड़ राज्य के पास कुछ नहीं था। इन सभी परेशानी के बावजूद प्रताप ने अपने साहस, वीरता, और बहादुरी से अकबर को युध्ध के मैदान में पराजित किया और अपनी मातृभूमि की रक्षा की।

वीर योद्धा महाराणा प्रताप का हल्दीघाटी युद्ध (Battle of Haldighati of Maharana Pratap)

मानसिंह के नेतृत्व में अकबर ने साल 1576 में अपने सैन्य दल की एक टुकड़ी भेजी, परन्तु प्रताप ने हल्दीघाटी की रक्षा के लिए सम्पूर्ण मोर्चाबंदी कर दी। हल्दीघाटी के रंग के जैसी ही संकीर्ण पर्वती विस्तार में राणा प्रताप का सैन्य और मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर की सेना शस्त्र के साथ आ पहुंची।

मुगल राजवंश के सेनापति का नाम मानसिंह था, जिसके पास सेना में लगभग 80,000 सिपाही थे, जब की प्रताप के सैन्य में केवल 20,000 जितने सीपाही ही थे। मुगल वंश और महाराणा प्रताप के बिच में एक भीषण युद्ध हुआ। जो करीब 3 घंटों तक चला था। इसी युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप के प्रिय घोडे चेतक की मृत्यु हो गई थी।

हल्दीघाटी की लड़ाई में सैन्य में भारी नुकशान हुआ, और राणा प्रताप की सैन्य के लगभग 500 सैनिक की मृत्यु हो गए थी। महाराणा प्रताप की सेना के सैनिक के साथ ही ग्वालियर के राजाराम शाह और उनके 3 पुत्र जिनके नाम जयमल राठौड़, राम सिंह, वीरभाला सिंह थे, उन चारों लोग की भी इस युद्ध में वीरता पूर्वक लड़ाई करते हुए वीरगति को प्राप्त कर लिया था।

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इस लड़ाई में राणा प्रताप को न तो केदी बना पाए और न तो प्रताप को मार ने की चाल पूर्ण हो सकी। उसके बावजूद सेनापति मानसिंह के सैन्य को जित हांसिल हुई। मानसिंह के सैन्य ने जित हांसिल करने के बावजूद भी राणा प्रताप हार कर भी जित को प्राप्त किया।

साल 1577 ईस्वी में जलालुद्दीन अकबर ने अपनी सेना में से एक बड़ी सेना की टुकड़ी भेज, महाराणा प्रताप को कैदी बनाने के लिए प्रयास किए। प्रताप के साथ अपने ही लोगों ने गद्दारी की थी। इसके बावजूद साल 1578 से लेकर 1585 तक सैनिक दल महाराणा प्रताप को अपना राजा बनाने के लिए उन्हें ढूंढते रहे। राणा प्रताप उनके परिवार के साथ मेवाड़ में ही पहाड़ी विस्तार में रहते थे।

अकबर के सैनिकों के द्वारा बार बार कठोर परिश्रम करके महाराणा प्रताप को खोजने के प्रयास कर रहे थे। राणा प्रताप और उनका परिवार कई सालो तक कंदमूल खाकर अपना जीवन चलते रहे। आप को यह जानकर हेरानी होंगी की महाराणा प्रताप के पुत्रों को घास की रोटियां भी खानी पड़ी थी।

महाराणा प्रताप का अंतिम पल कैसा था? (last moments of Maharana Pratap)

महाराणा प्रताप ने साल 1586 तक खुद की एक सेना बना ली थी, और बाद में उन्होंने उदयपुर, मांडलगढ़ और कुंभलगढ़ पर अपना कब्जो जमा लिया। प्रताप के लिए सबसे दुख की घटना यह हुई की वह चित्तौड़ पर अपना अधिकार नहीं जमा पाए। जिसके बाद चित्तौड़ के साम्राज्य को हांसिल करने के लिए राणा प्रताप ने युद्ध कि घोषणा कर दी।

साल 1597 में 19 जनवरी के दिन 57 साल की उम्र में चावंड की राजधानी में धनुष की डोर खींचते वक्त महाराणा प्रताप के आंत में एक गहरी चोट लगी गई, इस चोट की वजह से उनकी वीरगति हुई। जब प्रताप की मृत्यु की जानकारी अकबर को मिली तो उनके आखों में भी पानी आ गया था।

वीर योद्धा महाराणा प्रताप से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके सही उत्तर:

1. महाराणा प्रताप का जन्म कब और कहां हुआ था? (When and where was Maharana Pratap born?)

महाराणा प्रताप का जन्म उदय सिंह और रानी जयवंता के घर बड़े ही ख़ुशी के साथ राजस्थान में स्थापित कुंभलगढ़ दुर्ग में 9 मई के दिन 1540 की साल में हुआ था।

2. महाराणा प्रताप की कितनी पत्नी थी? (How many wife did Maharana Pratap have?)

महाराणा प्रताप को 11 पत्निया थी।

3. महाराणा प्रताप के पुत्र का नाम क्या था? (What was the name of the son of Maharana Pratap?)

महाराणा प्रताप का पुत्र अमर सिंह था।

4. महाराणा प्रताप के कितने पुत्र थे? (How many sons did Maharana Pratap have?)

महाराणा प्रताप के 22 संताने थी, जिसमे 17 पुत्र और 5 पुत्रियाँ थी। राणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह उत्तराधिकारी बनाये गये था।

5. महाराणा प्रताप की पत्नी अजबदे की मृत्यु कब हुई?

साल 1576 में चोट लगने के कारण महारानी अजबदे की मृत्यु हो गइ थी।

6. महाराणा प्रताप की पहली पत्नी कौन थी?(Who was the first wife of Maharana Pratap?)

महाराणा प्रताप की पहली पत्नी अजबदे पंवार थी।

7. महाराणा प्रताप की राजधानी कौन सी थी? (Which was the capital of Maharana Pratap?)

महाराणा प्रताप के द्वारा शासित मेवाड़ की आखरी राजधानी चावंड थी। यह सराड़ा तहसील आया हुआ है, जो उदयपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर है।

7. महाराणा प्रताप की मृत्यु कब हुई थी? (When did Maharana Pratap die?)

साल 1597 में 19 जनवरी के दिन 57 साल की उमर में चावंड की राजधानी में धनुष की डोर खींचते वक्त राणा प्रताप के आंत में गहरी चोट लग गई थी, जिसकी वजह से उनको वीरगति प्राप्त हुए।

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Last Final Word:

दोस्तों इस आर्टिकल में महाराणा प्रताप के जीवन के बारे में सभी जानकारी बताई गई है। उम्मीद करते है की आपको मेवाड़ के राजा प्रताप से सबंधित सभी जानकारी मिली होगी। यदि आपको अभी भी इस आर्टिकल से सबंधित कोई सवाल हो रहा हो तो आप हमें Comment के माध्यम से बता सकते है। साथ ही अगर आपको यह लेख पसंद आया हो तो इसे आपने दोस्तों को शेयर करे।

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