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हर्षवर्धन काल

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दोस्तों आज के इस आर्टिकल में भारत के इतिहास के हर्षवर्धन शासन काल के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। हर्षवर्धन साम्राज्य की राजधानी कन्नौज मे स्थित थी। हर्षवर्धन ने 606 ईसा पूर्व से लेकर 647 ईसा पुर्व तक शासन किया था। उसका शासन विस्तार पंजाब से लेकर उत्तरी उड़ीसा और हिमालय से लेकर नर्मदा नदी के तट तक फैला हुआ था।

हर्षवर्धन ने अपने दूसरे अभियान में शशांक की मृत्यु के बाद मगध और शशांक साम्राज्य पर अपना शासन स्थापित किया। अपनी बड़ी सैन्य शक्ति से उसने अपने साम्राज्य को पंजाब से लेकर उत्तरी उड़ीसा तथा हिमालय से लेकर नर्मदा के तट तक फैलाया था। उसने नर्मदा से आगे भी अपना शासन स्थापित करने के लिए प्रयत्न किया था, परंतु हर्षवर्धन को इसमें सफलता नहीं मीली। हर्षवर्धन को बदामी के चालुक्य राजा पुलकेसिन द्वितीय के सामने हार माननी पड़ी थी।

हर्ष चरित्र जो बाणभट्ट के द्वारा लिखा गया है। उसमें हर्ष का शासनकाल एक सफल दस्तावेज के तौर पर मौजूद है। हर्षवर्धन सातवीं शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली भारतीय सम्राट था। हर्षवर्धन का साम्राज्य शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए प्रख्यात था। उनके शासन में कई सारे कलाकार और विद्वान आकर्षित होकर उनके साम्राज्य में आते थे।

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हर्षवर्धन काल का इतिहास

हर्षवर्धन पुष्यभूति राजवंश के सम्राट थे। नरवर्धन द्वारा पांचवी या छठी शताब्दी इसमें में इसकी स्थापना की गई थी। यह सिर्फ थानेश्वर के राजा यानी कि हर्षवर्धन के पिता राजा प्रभाकर वर्धन के आधीन में था। पुष्पभुती समृद्ध और प्रख्यात राजवंश था। जिसके कारणों से उसे महाराजाधिराज की उपाधि प्राप्त हुई थी। हर्षवर्धन 606 ईसवी पूर्व इस साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना। हर्षवर्धन ने जब सिंहासन को संभाला तब उसकी उम्र केवल 16 साल की थी। हर्षवर्धन के भाई राज्यवर्धन जब गौड और मालवा को राजाओं का दमन करने निकला था, तब शशांक ने उसकी हत्या कर दी थी। हर्ष को स्कालोट्टापथनाथ के नाम से भी पहचाना जाता है। शासन को संभालने के बाद उसने अपनी बहन राज्य श्री को बचाया और असफल प्रयत्न के साथ शशांक की ओर आगे बढा़ था।

पुष्यभूति वंश को वर्धन वंश के नाम से भी जाना जाता है। वर्धन वंश गुप्त साम्राज्य के खत्म हो जाने के बाद प्रमुखता में आया था। पुष्यभूति राजवंश के प्रथम राजा प्रभाकर वर्धन गुप्त वंश को खत्म करने के बाद भारत में फैले हुए छोटे-छोटे गणराज्य राजाशाही राज्यों को मजबूत करने में सहायक बने। प्रभाकर वर्धन की मृत्यु 605 ईसा पूर्व मैं हुई थी। इसके बाद से उनके बेटे राज्यवर्धन को सिहासन का उत्तराधिकारी बनाया गया। हर्ष की बहन राज श्री ने मौखरी राजा ग्रहवर्मन से विवाह किया था।

माल्य के राजा देवगुप्त ने हर्षवर्धन की बहन के पति को पराजित करके राज्यश्री को कैद कर लिया था। देवगुप्त ने ग्रहवर्मन के राज्य पर अपना शासन स्थापित किया। इन सब के दौरान हर्षवर्धन की बहन पर जेल में अत्याचार करने में आ रहे थे। राजश्री पर हो रहे बुरे व्यवहार को सहन करने में असमर्थ राज्यवर्धन सैनिकों के साथ देवगुप्त के राज्य में पहोच जाता है। परंतु वह असफल रहता है। उसी समय शशांक ने राज्यवर्धन के राज्य में प्रवेश किया। राज्यवर्धन शशांक के अपने राज्य में आने के पीछे का कारण जानने में असफल रहा। वह शशांक की मंशा को पहचान नहीं पाया। शशांक ने दोस्ती का नाम देखकर राज्यवर्धन के राज्य में प्रवेश किया था। राज्य में प्रवेश करने के बाद उसने साम्राज्य की सेना के बारे में सभी प्रकार की माहिती एकत्र कर ली। राज्यवर्धन शशांक के इरादों को नहीं पहचान पाया है और आखिर में शशांक ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद शशांक ने राजधानी कन्नौज पर अपना शासन स्थापित किया। इस बात का पता जब हर्षवर्धन को चला तो उसने शशांक के विरुद्ध में युद्ध का ऐलान कर दिया और युद्ध में उसे पराजित कर दिया। उसके बाद से हर्ष ने राजधानी कन्नौज पर 16 साल की उम्र में वर्धन वंश का नेतृत्व करते हुए शासन को संभाला था।

हर्षवर्धन साम्राज्य का विस्तार

महान सम्राट हर्षवर्धन ने 590 ईस्वी से लेकर 647 ईस्वी यानी कि 41 सालों तक शासन किया था। अपने शासनकाल के दौरान उसने जालंधर, पंजाब, कश्मीर, नेपाल और बल्लभीपुर तक अपना विस्तार कीया था। हर्ष ने आर्यावर्त पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया था। उसके शासनकाल के दौरान भारत आर्थिक रूप से विकसित था। कहा जाता है कि हर्षवर्धन ने अरब पर भी आक्रमण कर दिया था। परंतु रेगिस्तान के एक क्षेत्रों के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया। इस घटना का उल्लेख भविष्य पुराण में मिलता है।

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हर्षवर्धन के अभियान

ऐसा कहा जाता है कि उनकी सेना में एक लाख से ज्यादा सैनिक थे। साथ ही साथ सेना में 60000 से ज्यादा हाथियों को शामिल किया गया था। इसके बावजूद भी हर्ष को बादामी के चालुक्य वंश के शासक पुलकेशिन द्वितीय से हार का सामना करना पड़ा था। इस घटना का उल्लेख 634 इसवी के एहोल प्रशस्ति मे मिलता है।

हर्ष के द्वारा रचित साहित्य

हर्षवर्धन ने अपने शासनकाल में रत्नावली, प्रियदर्शिका और नागरानंद नाम के नाटिका की रचना करवाई थी। हर्ष के मित्रों बाणभट्ट ने कादंबरी की रचना की थी। बाणभट्ट ने हर्षवर्धन के जीवन को हर्षचरित के नाम से लिखा था।

चीन से बेहतर संबंध

हर्षवर्धन ने 641 ईसवी में एक ब्राह्मण को दूत बनाकर चीन में भेजा था। 643 ईस्वी मे चीन के राजा ने ल्यांग-होआई-किंग नमक अपने दूत को हर्षवर्धन के दरबार में भेजा था। जिसके बाद करीबन 646 इस्वी मे वापीस एक चीनी दूत मंडल हर्ष के दरबार में आया। इतिहास के अनुसार प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग हर्षवर्धन के राज दरबार में 8 सालों तक दोस्त के रूप में रहे थे।

हर्षवर्धन की पत्नी का नाम दुर्गावती था। उनके दो पुत्र थे। पहले का नाम वाग्यवर्धन और दूसरे का नाम कल्याणवर्धन था। उनके दोनों पुत्र की हत्या अरुणाश्वा नाम के मंत्री ने कर दी थी। जिसके कारण हर्ष का कोई उत्तराधिकारी नहीं बचा था। और हर्षवर्धन के मृत्यु के बाद उनका साम्राज्य धीरे धीरे समाप्त होता गया।

हर्षवर्धन के साम्राज्य का प्रशासन

हर्षवर्धन के साम्राज्य में राजस्व को चार हिस्सों में बाटा गया था। पहला हिस्सा राजा पर खर्च करने में आता था। दूसरा हिस्सा विद्वानों पर, तीसरा भाग सरकारी कर्मचारियों पर और चौथा भाग धार्मिक गतिविधियों के लिए खर्च करने में आता था।

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हर्षवर्धन के साम्राज्य की सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था

प्रसिद्ध चीनी यात्री ने बताया था कि हर्षवर्धन के शासनकाल में भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था अस्तित्व में थी। जिसके अलावा कई मिश्रित और उप जातियों का भी अस्तित्व रहा था। साथ ही साथ अछुत और जातीच्युत के अस्तित्व की जाति की है। उनके शासनकाल में महिलाओं को पुरुषों के आधीन नहीं माना जाता था। धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व था जिसके कारण बौद्ध धर्म का अंत हो गया। वैष्णव शैव और जैन धर्म भी अस्तित्व में रहे थे। हर्षवर्धन उदार और धर्मनिरपेक्ष राज्य था। राजस्व का प्रमुख स्त्रोत भूमि की उपज का छठा भाग होता था।

मुख्य तथ्य

  • हर्षवर्धन एक महान संरक्षक था। जिसके बावजूद उसने स्वयं संस्कृत के नाटकों नागदंत, रत्नावली और प्रियदर्शिका की रचना की थी।
  • हर्षवर्धन ने कई सारे विश्राम गृह और अस्पतालों स्थापन करवाया था।
  • ह्वेनसांग ने कन्नौज में आयोजीत भव्य सभा के बारे मे बताया था की इस सभा में 20 राजा 4000 बौद्ध भिक्षु और 3000 जैन तथा ब्राह्मणों ने हिस्सा लिया था।
  • हर्षवर्धन हर 5 साल के बाद इलाहाबाद में महामोक्ष हरि परिषद नाम के एक धार्मिक उत्सव का आयोजन करवाया था। जिसमे वह दान करता था।
  • हर्ष अपनी आय को शाही परिवार, सेना तथा प्रशासन, धार्मिक निधि और गरीब बेसहारा के लिए खर्च करता था।
  • हर्षवर्धन के पास एक कुशल प्रशासन था। ह्वेनसांग के अनुसार उनके समय में परिवार पंजीकृत नहीं किए जातेे थे।
  • पुलकेशिन द्वितीय के द्वारा हर्षवर्धन की हार की घटना कर्नाटक के शिलालेख में उल्लेखित की गई है। हर्ष पहला उत्तर भारतीय राजा था जो दक्षिण भारतीय राजा के साथ युद्ध में हार गया था।
  • वर्धन वंश की स्थापना नरवर धन के द्वारा पांचवी सदी के अंत में और छठी सदी के शुरुआत में की गई थी।
  • हर्ष 16 साल की उम्र में अपने भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद शासन को संभाला था। उसने अपनी बहन राज श्री को छुड़वा कर शशांक को युद्ध में पराजित किया था।
  • 647 ईसवी में हर्ष का निधन हो गया।
Last Final Word

दोस्तो यह थी हर्षवर्धन वंश के बारे में जानकारी। हम उम्मीद करते हैं कि हमारी जानकारी चाहिए आपको आपके प्रश्नों के जवाब मिल गए होंगे। अगर अभी भी आपके मन में कोई सवाल हो गया हो तो हमें कमेंट के माध्यम से अवश्य बताइए।

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