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गुरु गोविंद सिंह का जीवन परिचय

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सीखो के कई सारे गुरु थे, उनमे गुरु गोविंद सिंह सीखो के दसवे गुरु थे। गुरु के साथ वह एक दार्शनिक, कवि और महान भी योद्धा थे। नौवे गुरु तेग बहादुर (गुरु गोविंद सिंह के पिता) को मुग़ल सम्राट ओरंगजेब के आदेशानुसार सार्वजानिक रूप से सर कलम कर दिया गया था, क्योकि उन्होंने इस्लाम में परिवर्तित होने से मना कर दिया था। जिसके बाद गोविंद राय के रूप में जन्मे दसवे गुरु बने।

इस अत्याचार के सामने लड़ने के लिए गुरु गोविंद ने एक समुदाय की स्थापना की, खालसा नामक सिख योद्धा समुदाय की स्थापना सिख धर्म के इतिहास में एक मत्वपूर्ण घटना के रूप में चिन्हित किया। उन्होंने पाच लेखो को पाच प्रकार के रूप में वर्गीकृत किया है। गुरु गोविंदसिंह ने पाच ककार (सिद्धात) दिए जेसे की,

  • केश – जिसे सभी गुरु और रूशी-मुनि धारण करते आए थे।
  • कन्धा – केशो को साफ करने के लिए।
  • कच्छा – स्फूर्ति के लिए।
  • कड़ा – नियम और सयंम में रहने की चेतावनी देने के लिए।
  • कृपाण – आत्मरक्षा के लिए।

ये पाँच सिद्धांत को गुरु गोविन्द ने हर समय खालसा सीखो को पहनने के लिए आज्ञा दी। गुरु गोविंद के अन्य योगदानो मे सिख धर्म पर महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखना और सीखो के शश्वत जीवित गुरु ग्रन्थ साहिब (सिख धर्म के धार्मिक ग्रंथ) को धारण करना शामिल है।

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बिंदु (Point)जानकारी (Information)
नाम (Name)गुरु गोविंद सिंह
जन्म दिनांक (Date of Birth)22 दिसंबर 1666
प्रसिद्धी कारण (Known For)सिखो के दसवें गुरु
पिता का नाम (Father Name)गुरु तेग बहादुर
माता का नाम (Mother Name)गुजरी
पत्नी का नाम (Wife Name)जीतो
पुत्रो के नाम (Son’s Name)अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह
मृत्यु (Death)7 अक्टूबर 1708

गुरु गोविंद सिंह का बचपन और प्रारंभिक जीवन (Guru Gobind Singh Childhood and Early Life)

गुरु गोविंद सिंह का जन्म 22 दिसंबर 1666 को बिहार राज्य के पटना शहर में हुवा था। गुरु गोविंद के पिता का नाम गुरु तेग बहादुर और उनकी माता का नाम गुजरी था। गुरु तेग बहादुर और उनकी पत्नी गुजरी दंपति की एकमात्र संतान गुरु गोविंद सिंह थे। गुरु गोविंद राय के पिता सीखो के 9 वे गुरु थे, और गोविंद राय के जन्म के समय उनके पिता गुरु तेग बहादुर असम में एक प्रचार यात्रा पर गए हुए थे।

गुरु गोविन्द राय के पिता स्थानीय राजा के संरक्षण के लिए अपना परिवार को छोड़ दिया। 1670 में तेज बहादुर चक नानकी (आनंदपुर) गए थे, और अपने परिवार से उन्हें मिलाने का आह्वान किया था।

1671 में अपने परिवार के साथ दानापुर से अपनी यात्रा शुरू की, और इस यात्रा के दोरान ही अपनी बुनियादी शिक्षा प्राप्त करना शुरू कर दिया था।उन्होंने फारसी, संस्कृत और मार्शल कौशल का ज्ञान प्राप्त किया। गुरु गोविंद राय और उनकी माता आख़िरकार 1672 में आनादपुर में अपने पिता के साथ जुड़ गए जहा उनकी शिक्षा जारी रही और उनकी शिक्षा बढती गयी।

1675 की शुरुआत में कश्मीरी हिंदुओ का एक समूह आनादपुर आया। यह समूह (हिन्दू समूह) को मुगलों ने तलवार की नोक पर जबरदस्ती से इस्लाम में परिवर्तित किया जा रहा था। इसलिए यह हिंदू समूह ने गुरु तेग बहादुर से मदद मांगी। हिंदू समूह की यह दुर्दशा देख कर गुरु तेग बहादुर ने दिल्ली जाने का फेसला किया। दिल्ली जाने से पहले गुरु तेग बहादुर ने अपने बेटे गुरु गोविंद राय को सीखो का उत्तराधिकारी और दसवे गुरु के रूप में नियुक्त किया।

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गुरु तेग बहादुर को दिल्ली में मुगल अधिकारियो द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। गुरु तेग बहादुर को मुगलों ने इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। परिवर्तित न होने के लिए गुरु तेग बहादुर को कई यातनाओ का सामना किया, और बाद में गुरु तेग बहादुर को पारंपरिक रूप से सिर कलम कर दिया गया।

खालसा पंत की स्थापना (Establishment of Khalsa Pant)

गुरु गोविंद सिंह के नेतृत्व में सिख समुदाय के कई सरे इतिहास आए। गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में बैसाखी के दिन विधिवत रूप से खालसा (सिख धर्म का अनुयायियों का एक सामूहिक रूप ) का निर्माण किया था।गुरु गोविंद सिंहने इसे चारदिक्ला की भावना दी, जिसका अर्थ था की, सभी असंभव बाधाओ के चेहरे में अटूट साहस, आशावाद और आध्यात्मिकता। खालसा अर्थात स्वतंत्र या संप्रभु, अनुयायियों को यह सिखाने के लिए किया गया था कि, कोई भी अंधविश्वास या अनुष्ठान सर्वशक्तिमान से ऊपर नहीं है।

सिख समुदाय की एक बैठक हुई थी, जिसमे गुरु गोविंद सिंह ने सभी के सामने एक सवाल पूछा – कोन अपने सिर का बलिदान करना चाहता है? उस समय एक स्वयंसेवक इस बात पर सहमत हुवा। गुरु गोविंद सिंह उस स्वयंसेवक को तम्बू में लगये और कुछ समय बाद खून से रंगी तलवार को लेकर वापस लौटे।

गुरु गोविन्द सिंह ने बहार आकार फिर से वही सवाल पुछा, कोन अपने सिर का बलीदान करना चाहता है? फिर और एक अन्य व्यक्ति सहमत हो गया, वो फिर से तम्बू में उस स्वयंसेवक को लेकर चले गए और फिर वापस बहार आये तब भी उनकी तलवार खुनसे रंगी हुई थी।

इसी तरह,पाच बार करने के बाद वो पाचवे स्वयं सेवक को लेकर तंबू में गए उसके बाद सभी जीवित सेवको के साथ कुछ समय के बाद लौटे और उनका नाम पंज प्यारे रख दिया गया।

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उसके बाद गुरु गोविंद जी ने लोहे का कटोरा लिया और उसे पानी और चीनी के साथ मिलाया और उसे दोधारी तलवार के साथ मिलाया और इसे अमृत नाम दिया। पहले 5 खालसा के निर्माण के बाद, उनका नाम छतवान खालसा रखा गया, जिसके बाद गुरु गोविंद राय से उनका नाम गुरु गोविंद सिंह हो गया।

खालसा शब्द का अर्थ है पवित्रता। गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी। केवल मन, वचन और कर्म से समाज सेवा के लिए प्रतिबद्धित व्यक्ति स्वयं को खालासपंथी कह सकता है।

गुरु गोविंद सिंह की वाणी (Speech of Guru Gobind Singh)

गुरु गोविंद सिंह के द्वारा खालसा भाषण – “वाहेगुरु जी दा खालसा वाहेगुरु जी दी फतेह”

गुरु गोविंद ने खालसा योद्धाओ के चार निषेधया अनिवार्य प्रतिबंध भी लगाया था, जो निचे दर्शाया गया है,

बालक के प्राकृतिक विकास को परेशान करने के लिए मना किया है। किसी भी जानवर का मांस खाने के लिए मना किया है। एक जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के साथ आहवास करने के लिये भी मना किया है, और शराब, तम्बाकू या किस भी प्रकार की दवाओ का उपयोग करने के लिए भी मना किया गया है।

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एक खालसा जो कभी भी इस आचार सहिता मेसे कोई एक भी आचार सहित को तोड़ता है, वह खालसा पंथ से अलग हो जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने 1708 में नादेड में रहते हुए खालसा को 52 हुकम या 52 विशिष्ट अतिरिक्त दिशानिर्देश दिए।

गुरु गोबिंद सिंह द्वारा लड़ी गई कुछ मुख्य लड़ाइयाँ (Some Of The Main Battles Fought By Guru Gobind Singh)

ऐसा कहा जाता है की गुरु गोविंद सिंह ने कुल चोदह युद्ध लडे, लेकिन कभी भी किसी भी पूजा स्थल वाले लोगो को हिरासत में नहीं लिया या कभी भी किसी को नुकसान नहीं पहुचाया।

1. भंगानी की लड़ाई भानगानी की लड़ाई (1688)
2. बदायूं का युद्ध (1691)
3. गुलर की लड़ाई (1696)
4. आनंदपुर की पहली लड़ाई (1700)
5. आनंदपुर साहिब की अनंतपुर साहिब की लड़ाई (1701)
6. निर्मोहगढ़ की लड़ाई (1702)
7. बसोली की लड़ाई (1702)
8. आनंदपुर की लड़ाई (1704)
9. सरसा की लड़ाई (1704)
10. चमकोर की लड़ाई (1704)
11. मुक्तसर की लड़ाई (1705)

गुरु गोविंद सिंह का व्यक्तिगत जीवन (Guru Gobind Singh personal Life)

उनके वैवाहिक जीवन के बारे में कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उनकी एक पत्नी थी, जिनका ना माता जीतो था। माता जीतो ने अपना नाम बदल कर सुंदरी रख दिया था एसा इतिहासकार मानते है। अन्य इतिहास करो के अनुसार उनकी तिन बार शादी हुई थी। माता जीतो, माता सुंदरी और सहिबदेवी ये तिन उनकी पत्नियो के नाम है। उनके चार बेटे भी थे : अजित सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह।

जब ओरंगजेब की मृत्यु हुई, उसके बाद बहादुर शाह भारत का अगला राजा बन गया। गुरु गोविंद सिंह ने भी बहादुर शाह को सिहासन दिलाने में मदद की थी। जिसके चलते उनका रिश्ता दोस्ताना होगया था। बहादुर शाह और गुरु गोविंद सिंह की दोस्ती से ना खुश सरहद के नवाब वाजिद खान के दो पठान थे जिन्होंने दोखे से गुरु गोविंद सिंह की हत्या कर दी थी। गुरु गोविंद सिंह जी ने 7 अक्टूबर 1708 के दिन महाराष्ट्र के नादेड साहिब में अंतिम साँस ली। अभी जो गुरुद्वारा तख़्त श्री हजूर साहिब वहा पर खड़ा है, जहा गुरु गोविंद सिंह का नादेड में अंतिम संस्कार किया गया था। गुरु गोविंद सिंह की मृत्यु जब हुई तब उनकी उम्र 42 साल थी। गुरु गोविंद के दो हत्यारों में से एक हत्यारे को उसके ही लाये गए खंजर से मार दिया था। दुसरे हत्यारे को उसके सिख समुदाय के द्वारा मारा गया था। सीखो और मुगलों के लिए यह एक लम्बी और कडवी घटना थी।

गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु 

ऐसा इतिहासकारों का कहना है, की गुरु गोबिंद सिंह को दिल में गहरी चोट लगने की वजह से 7 अक्टूबर 1708 में हजूर साहिब नांदेड में उनका निधन हुआ था। नांदेड में उन्हों ने अपने शरीर का त्याग किया था।

गुरु गोबिंद सिंह से जुड़े प्रश्न और उत्तर 

गुरु गोबिंद सिंह का जन्म कब हुआ था?

गुरु गोबिंद सिंह का जन्म 22 दिसंबर 1666 की साल में हुआ था।

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गुरु गोबिंद सिंह के माता पिता का नाम क्या था?

गुरु गोबिंद सिंह के पिता का नाम गुरु तेग बहादुर और माता का नाम गुजरी था।

गुरु गोबिंद सिंह की कितनी पत्निया थी?

गुरु गोबिंद सिंह की तिन पत्निया थी पहली पत्नी जीतो दूसरी पत्नी माता सुन्दरी और तीसरी पत्नी का नाम माता साहिब था।

खालसा की स्थापना किसने की थी?और कौनसी साल में?

खालसा की स्थापना गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 की साल में की थी।

गुरु गोबिंद सिंह के पुत्र कितने थे?

गुरु गोबिंद सिंह के 4 पुत्र थे,अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह।

गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु कब और कैसे हुई थी?

गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु 22 अक्टूम्बर 1708 में दिल में गहरी चौट लगने की वजह से हुई थी।

गुरु गोबिंद सिंह पंजाब कब आये थे?

गुरु गोबिंद सिंह 1670 में पंजाब आये थे।

गुरु गोबिंद सिंह का असली नाम क्या था?

गुरु गोबिंद सिंह का असली नाम गोविंद राय था।

Last Final Word :

दोस्तों हमारे आज के इस आर्टिकल में हमने आपको गुरु गोविंद सिंह का जीवन परिचय दिया जैसे की गुरु गोविंद सिंह का बचपन और प्रारंभिक जीवन, खालसा पंत की स्थापना, गुरु गोविंद सिंह की वाणी, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा लड़ी गई कुछ मुख्य लड़ाइयाँ, गुरु गोविंद सिंह का व्यक्तिगत जीवन और गुरु गोविंद सिंह के जीवन से जुडी सभी जानकारी से आप वाकिफ हो चुके होंगे।

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