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भारत में स्वदेशी आंदोलन

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भारत के इतिहास की और एक नज़र करे तो भारत में आदि काल में कई सारे महाराजा ने शासन किया है। साथ ही साथ भारत पर ब्रिटिशो ने भी अपने शासन को स्थापित किया था, और हिंदुस्तान को अपना गुलाम बनाया था। भारत को उनकी गुलामी से आज़ाद करने के लिए कई सारे स्वाधीनता आन्दोलन सदियों तक चलते रहे थे। भारत को इस आन्दोलन की वजह से उन लोगो से पहचान हुइ जो अपने देश के लिए अपनी जान तक की भी क़ुरबानी देने के लिए तैयार थे। भारत में स्वतंत्रता संग्राम के लिए कई सारे लोगो ने अपने प्राण की आहुति दी है, जिसमे कुछ लोगो ने हिंसा का उपयोग किया तो कुछ लोगो ने अहिंसा के मार्ग पर चल कर हमाँरे देश को अंग्रेजो की गुलामी में से आजाद करवाया था।

अनेक महान नेता ने अपने नेतृत्व में भारत की जनता को अपने हक़ के लिए लड़ने और आवाज़ उढाने के लिए प्रेरणा दी और उनको एक जुथ करके अंग्रजो के सामने अपनी आजादी के लिए आन्दोलन कई। भारत को आजादी दिलाने में गांधीजी, जवाहरलाल नहेरु, सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोज़, मंगल पांडे, चंद्रशेखर आजाद, बाल गंगाधर टिकल इत्यादी ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। भारत की आजादी में कई सारी महिला ने भी अपना योगदान दिया है जिसमे विजय लक्ष्मी पंडित,सुचेता कृपलानी, सावित्रीबाई फुले, सरोजनी नायडू, लक्ष्मी सहगल, रानी लक्ष्मी बाई, कस्तूरबा गाँधी इत्यादि का समावेश होता है।

दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हम भारत के स्वदेशी आंदोलन के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। इस आर्टिकल को ध्यान से पढ़ना ताकि आपके सभी सवालों के जवाब आपको मिल सके।

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राष्ट्रवाद का उदय

  • 19वीं शताब्दी में भारत के लोगों में राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्रीय चेतना की अवधारणा का उदय हुआ था।
  • लोगों को अपनी राष्ट्रीय पहचान को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारको से परिभाषा को हांसील करने के लिए जागृत कीया गया।

भारतीय राष्ट्रवाद का कारण

ब्रिटिश मंशा को पहचानना:

ब्रिटिश हुकुमत के द्वारा भारत के लोगों की किसी भी मांग को पूरा नहीं किया जाता था। भारत की आर्थिक दुर्दशा ने औपनिवेशिक शासन के शोषक के स्वरूप को साल 1890 मैं उजागर करने का कार्य हाथ में लिया था।

विश्वास में वृद्धि:

सभी में जागृति आ गई थी कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए औपनिवेशिक सरकार के विरुद्ध की इस लड़ाई में आम जनता का शामिल होना जरूरी है।

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जागरूकता में वृद्धि:

ब्रिटिश नीतियो के प्रति जागरूकता शिक्षा के प्रचार से बढ़ रही थी। भारत में बढ़ रही बेरोजगारी और अल्परोजगार के कारण बढ़ रही गरीबी ने राष्ट्रीय वादियों की भावना को अत्यंत बढ़ा दिया था।

अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव:

भारत के क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी दूसरे देश जैसे कि आयरलैंड, जापान, मित्र, तुर्की, फारस और चीन में हुए राष्ट्रीय आंदोलन से प्रेरित हुए थे।

लॉर्ड कर्जन की रूढ़िवादी नीतियां:

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लॉर्ड कर्जन के शासन के समय में अपनाए गए प्रशासनिक उपायो जैसे की भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, कोलकाता निगम अधिनियम और बंगाल विभाजन की वजह से देशभर में विरोध देखने में आया।

इसके बाद से भारत में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई थी।

स्वदेशी आंदोलन

इस आंदोलन का समय आधे दशक जीतना लंबा था। इस आंदोलन के चलते, सभी राजनीतिक संघर्ष सामने आए जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में आने वाले 75 वर्ष में आनेवाले थे। उदारतावाद से  राजनीतिक उग्रवाद, क्रांतिकारी से प्रारंभिक समाजवादी विचारधारा, अदालती लड़ाई और जनसभाओं में भाषण बाजी से शरु करके बहिष्कार तक, प्रतिरोध से हड़ताल जैसी सभी चीज इस आंदोलन में दिखाई दी थी। इस आंदोलन मे राजनीतिक मामलो के साथ साथ शिक्षा, कला, साहित्य, संगीत, विज्ञान, उद्योग और अन्य क्षेत्रों को जोड़ा गया था।

स्वदेशी का अर्थ

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण आंदोलन स्वदेशी आंदोलन था। स्वदेशी का मतलब अपने देश में बना हुआ होता है। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन में बने माल का बहिष्कार करना और भारत में उत्पादित चीज वस्तुओं का अधिक से अधिक उपयोग करके ब्रिटेन की आर्थिक व्यवस्था को हानी पहुंचाना था। साथ ही भारत के लोगों को रोजगार देना था। यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार की सत्ता को खत्म करने के लिए और भारत की आर्थिक व्यवस्था को विकसित करने के लिए किया गया था। स्वदेशी आंदोलन अरविंद घोष, रवींद्रनाथ ठाकुर, वीर सावरकर, लोकमान्य, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय के नेतृत्व में किया गया था। समय रहते स्वदेशी आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बिंदु बना। स्वदेशी आंदोलन को स्वराज की आत्मा माना जाता है।

स्वदेशी आंदोलन का इतिहास

स्वदेशी आंदोलन ब्रिटेन के बंग भंग  के विरोध में किया गया और पूरे भारत में प्रचलित आंदोलन था। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन में बने माल का बहिष्कार करना और भारत में उत्पादित चीज वस्तुओं का अधिक से अधिक उपयोग करके ब्रिटेन की आर्थिक व्यवस्था को हानी पहुंचना था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत में सबसे पहले स्वदेशी नारा साल 1872 मे वंगदर्शन के विज्ञान सभा का प्रस्ताव रखते हुए लगाया था।

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बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने कहा था कि: जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा गुलाम होता, वह विदेशी होने की वजह से हमारा प्रभु बन बैठा है, हम दिन प्रतिदिन साधन हीन होते जा रहे हैं, हम अतिथि शाला में अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले अतिथि की तरह प्रभु के आश्रम में पड़े हैं, भारत भूमि अब भारत के लोगों के लिए विशाल अतिथिशाला बन गई है।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के बाद भोलानाथ चंद्र ने साल 1874 में शंभूचंद्र मुखोपाध्याय द्वारा प्रवर्तीत मुखजीर्ज मैग्जीन मे स्वदेशी नारा लगाया था। उन्होंने कहा था कि: चलिए हम सब एक संकल्प करते हैं कि विदेशी वस्तु ना खरीद कर उनका बहिष्कार करेंगे। हमें हर समय यह याद होना चाहिए की भारत का विकास भारतीयों के हाथ में है।

स्वदेशी आंदोलन की पृष्ठभूमि

स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत साल 1905 में हुई थी। लार्ड क़जर्न ने बंगाल प्रांत को विभाजित करने का फैसला लिया था। जिसका विरोध करने के लिए स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ हुआ था।

बंगाल के प्रांत को अन्याय पूर्ण विभाजित करने के फैसले को रोकने के उपदेश से और सरकार पर दबाव बनाने के लिए नरमपंथीयों ने विभाजन विरुद्ध अभियान की शुरुआत की थी।

इस आंदोलन के चलते सरकार को लिखित याचीकाएँ दी गई, जनसभाओं का आयोजन किया गया और हिताबादी, संजीवनी और बंगाली अखबार में राष्ट्रवादी विचार को प्रकाशित किया गया।

बंगाल की प्रेसिडेंसी का आकार बढता जा रहा था। यह प्रेसीडेंसी भारी भरकम थी, जिसकी वजह से साल 1866 में उड़ीसा में अकाल के वक्त ही बंगाल के प्रांत को विभाजीत करने की जरूरत के बारे में चर्चा हो रही थी। 30 लाख की जनसंख्या वाले असम को साल 1874 मे अलग कर दिया और साथ ही सिलहट, ग्वालपाड़ा और कछार के बंगाली क्षेत्र को उसमे जोड़ दीया गया। साल 1892 मे प्रस्ताव रखने में आया कि चटगांव कमिश्ररी को असम के क्षेत्र में शामिल कीया जाए। असम सिविल सेवा के एक अलग कार्टर के साथ एक लेफ्टिनेंट गवर्नर वाला क्षेत्र बन सके उसके लिए साल 1896 में असम के तत्कालीन चीफ कमिश्नर विलियम वार्ड ने वापिस ढाका और मैमनसिंह जील्ले के हस्तांतरण का प्रस्ताव रखा। परंतु उस वक्त योजना को अस्वीकृत किया गया था। साल 1897 मे सिर्फ लुशाई की पहाड़ियों के विस्तार को हस्तांतरीत किया गया और बाकी योजना को बंद कर दी गई।

बंगाल के विभाजन के निहितार्थ

प्रशासनिक की आवश्यकता:

वर्ष 1900 मे लॉर्ड कर्जन ने भारत मे आकर आसम की यात्रा

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की तो बंगाल के क्षेत्रों के विभाजन की योजना फिर से शुरू की गई। क्योंकि आसम बंगाल रेलवे पर खुद की निर्भरता घटाने के लिए चाय-बागनों के यूरोपियन मालिक को ने, कोलकाता से थोड़ी दूरी पर एकत्र पतन की मॉग की। बंगाल के विभाजन की आवश्यकता सबसे ज्यादा वर्ष 1960 में महसूस की गई। क्योंकि उस वर्ष की जनगणना में मालूम पड़ा कि बंगाल की आबादी 7.85 करोड़ हो चुकी है।

28 मार्च 1903 मैं बंगाल के नए लेफ्टिनेंट गवर्नर एंड्रयू फैजर ने वार्ड के प्रस्ताव को फिर से उठाया, जिसे कर्जन ने भारत में भूमि के पुनः वितरण से संबंधित योजना में 1 जून 1903 को स्वीकृत किया था। भारत के लोगों के सामने उसे उचित रूप से प्रस्तुत करने के लिए संशोधित किया गया और गृह सचिव रिजले के 3 दिसंबर 1903 के पत्र में सबसे पहले प्रकाशित किया गया। रिजले इस स्थानांतरण योजना का समर्थन किया, और बताया कि इससे बंगाल सरकार का अत्यधिक प्रशासनिक बौज कम होगा। जिसकी वजह से बंगाल की परेशानी भी खत्म हो जाएगी। यह प्रशासनिक सुविधाएं कोई अमूर्त अथवा निष्पक्ष वस्तु के लिए नहीं थी परंतु अंग्रेज अधिकारी के और अंग्रेज व्यापारियों की सुविधा के लीए थी।

राष्ट्रीय चेतना पर प्रहार:

फ्रेजर रिजले और कर्जन ने दिसंबर 1930 और 19 जुलाई 1905 की औपचारिक घोषणा  के चलते एक स्थानांतरण योजना को पूर्ण विभाजन मे तबदिल कर दिया। जिसके अंतर्गत पूर्वी बंगाल और असम के क्षेत्र में असम के अतिरिक्त चटगांव, ढाका और राजशाही डिविजन, हिल टीपरा तथा माल्दा को शामिल किया गया था। सार्वजनिक रूप से सरकार ने इस विभाजन को प्रशासनिक जरूरत बताया था, परंतु सरकारी विवरण और निजी पत्रों से मालूम पड़ता है कि कर्जन ने भारतीय राष्ट्रवाद की जुझारू चेतना पर आघात करने के लक्ष्य से ईस बंटवारे की योजना को बनाया था। 7 फरवरी 1904 के नोट में तत्कालीन गृह  सचिव ने रिजले बताया था, कि बंगाली बड़ी ताकत है। अगर इसका विभाजन होता है तो यह कमजोर पड़ जाएगा। बंगाल के विभाजन के पीछे हमारा उद्देश्य हमारे दुश्मनों को विभाजित करके उनकी शक्ति को कमजोर कर देना है।

बंगाली जनसंख्या का बँटवारा:

बंगाल के विभाजन का मुख्य लक्ष्य बंगाल को दो प्रशासनिक प्रांत में विभाजित करके उसके प्रभाव को कम कर देना नहीं था। परंतु अंग्रेज हुकूमत का उद्देश्य बंगाल की जनसंख्या को कम करके उन्हें अल्पसंख्यक बनाना था। तभी बंगाल में एक करोड़ 70 लाख बंगाली लोग और 3 करोड़ 70 लाख हिंदी भाषी लोग को रखने की योजना बनाई गई थी। इस विभाजन से बंगाली भद्रलोक का करीबन पूर्व वर्गीय शासन खत्म हो जाता। इसका मतलब है कि भूस्वामी साहूकार, पेशेवर और बाबू वर्गों का शासन जो 3 जाति ब्राह्मण, कायस्थ और वैश्य जाति के थे, उनका शासन खत्म हो जाता। इन जातियों का शिक्षा और रोजगार पर एकाधिकार था। उन्होंने दूसरे सभी समुदाय को पूरी तरह से बाहर रखा था। और यही राजनीतिक शक्ति का मुख्य स्रोत था। लार्ड कर्जन ने कहा था कि अंग्रेज सरकार कि यह योजना कोलकाता को सिहासनच्युत् करना और बंगाल की जनसंख्या को विभाजित करने की थी। बंगाल जो पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का संचालन करता था, उसे समाप्त करना था। उसे पूरा यकीन था, कि उनके बंग भंग योजना के राजनीतिक लाभ की सबसे अच्छी गारंटी उस पर कांग्रेस का असर्थन थी।

सांप्रदायिकता को प्रोत्साहन:

बंग भंग योजना के अंदर धार्मिक विभाजन का मकसद भी छुपा हुआ था। अंग्रेजों ने 19वीं सदी के अंत से ही मुस्लिम सांप्रदायिकता को कांग्रेस और राष्ट्रवादी आंदोलन को कमजोर करने के लिए अधीक भडकाया था। भारत की राष्ट्रीयता को खत्म करने के लिए और हिंदू मुसलमानों मे फूट डालने के लिए अंग्रेजों ने मुस्लिम प्रधान बंगाल को विभाजित करके शेष बंगाल के विरुद्ध खड़ा करने की साजिश बनाई थी। बंगाल में पूर्वी बंगाली विस्तार में मुस्लिम लोगों की संख्या और पश्चिमी बंगाल के विस्तार में हिंदू लोगों की संख्या ज्यादा थी। जबकि मध्य बंगाल के विस्तार में हिंदू और मुसलमान लोगों की संख्या में संतुलन था। बंगाल के मुस्लिम लोग ग्रामीण चरित्रवाले और 90% लोग खेतिहर और मामूली चाकर समूह के थे।

कर्जन के द्वारा फरवरी 1904 मे ढाका में भाषण दिया गया था, जिसमें उसने कहा था कि बंगाल के विभाजन का मेरा लक्ष्य प्रशासनिक सुविधाओं को देखना नहीं है, मैं एक मुस्लिम प्रांत को बनाकर मुस्लिम लोगों के अनुयायियों की बोलबाला करना चाहता हूं। मेरी बंगाल के विभाजन की योजना से पूर्वी बंगाल के विस्तार में रहने वाले मुस्लिम लोगों को एकता प्राप्त होगी, जो मुसलमान बादशाह और सूबेदार के शासन के बाद उन्हें कभी नसीब नहीं हुई थी।

सितंबर 1904 में इस बात पर जोर दिया गया था, कि बंगाल के नए क्षेत्र का मुख्यालय ढाका होगा। जहां एक करोड़ 80 लाख मुसलमान लोगो की संख्या और एक करोड़ 20 लाख हिंदू लोगों की संख्या होगी। समय रहते ऐसी प्रांतीय राजधानी बनेगी जिसकी मदद से मुसलमान लोगों को हित प्रदान होगा, और उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। अंग्रेजों की इस लालच मे आकर पूर्वी बंगाल के मुस्लिम लोग विभाजन की योजना के पक्ष में आ गए थे।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ति पर बंगाल विभाजन की योजना सुनियोजित आक्रमण के रूप में थी। कर्जन के उत्तराधिकारी मिंटो, शुरुआती समय में बंगाली विभाजन की योजना से असम्मत थे। परंतु बाद में उन्होंने भी इस योजना का स्वीकार किया था। भारत के क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी अंग्रेजों की इस कुनीती से परिचित थे, इसलिए उन्होंने एक साथ मिलकर इस योजना का विरोध किया और बंगाल के विभाजन के विरुद्ध में स्वदेशी आंदोलन को शुरू किया।

बंगाल की एकजुटता:

कर्जन के द्वारा लाई गई बंगाल विभाजन की योजना ने बंगाल के लोगों को विभाजीत और कमजोर करने के बदले उनको और भी एकजुट कर दिया था। कर्जन को पता नहीं था कि, उभरती हुई बंगाली पहचान ने संकीर्ण हित के समूह, वर्गो और क्षेत्रीय बाधाओं से निकलकर पहले से अधिक भौगोलीक गतिशीलता को क्षेत्रीय समाचार पत्रों के रूप में आधुनिक संचार साधन जैसे शक्तिशाली तत्व को पैदा कर रखा था। वर्ष 1890 में अकालो और महामारीयो ने ब्रिटिश हुकूमत की कुटनीति को चुर-चुर  कर दिया था।

बीसवीं सदी के प्रारंभ में शिक्षित बंगाली लोगों की फसलें साल प्रती साल खराब होने की वजह से महंगाई बढ़ रही थी जिसके कारण मध्यमवर्ग के लोगों का जीवन दुभर हो गया था। ऐसी परिस्थिति में बंगाल विभाजन योजना ने बंगाल के लोगों को तोड ने के बदले एक स्वदेशी गठबंधन का निर्माण किया।

बंगाल के विभाजन के विरुद्ध में किया गया आंदोलन

बंगाल के विभाजन का विरोध दिसंबर 1903 से शुरू किया गया था। आवेदन, पत्र, विज्ञापन, भाषाण, जनसभाओं और प्रेस इत्यादि के माध्यम से लोगों तक बंगाल के विभाजन के विरुद्ध में किए जाने वाले आंदोलन के बारे में जानकारी दी गई। बंगाल के सभी क्षेत्रों में खास करके ढाका, मैमनसिंह और चटगाँव में विभाजन के विरोध के लिए बैठक के करने में आई। सुरेंद्रनाथ बनर्जी, कृष्णाकुमार मित्र और पृथ्वीशचंद्र राय जैसे राष्ट्रवादी ने बंगाली, हितवादी तथा संजीवनी जैसे अखबारों और पत्रिकाओं के द्वारा विभाजन के विरोध में जनमत तैयार किया था। कोलकाता के टाउनहॉल में मार्च 1904 और फरवरी 1905 मे विभाजन विरोध में कई सारी सभा करने में आई थी। उस वक्त कर्जन ने गृहसचिव  को लिखा था कि, अगर विभाजन के विरोध को अभी नहीं खत्म किया, तो हम बंगाल को कभी विभाजीत करने में नहीं सफल होंगे। विरोध को ना रोक पाने का परिणाम यह होगा, कि पहले से ही मजबूत शक्ति को और भी मजबूत शक्ति बनने का मौका देना। यह एक ऐसी ताकत होगी जो भविष्य में अंग्रेज सरकार के लिए खतरा साबित होगी।

स्वदेशी आंदोलन की घोषणा

भारत के लोगों के द्वारा करने में आ रहे विभाजन विरोध के आंदोलन को नजरअंदाज करके 19 जुलाई 1905 के दीन ब्रिटिश हुकूमत ने  बंगाल के विभाजन की घोषणा कर दी। इस घटना के बाद से विभाजन विरोधी आंदोलन और ज्यादा व्यापक हो गया। साथ ही मजबूत और संगठित हो गया। बंगाल विभाजन विरोध आंदोलन की शुरुआत विभाजन को रोकने के लिए की गई थी, परंतु अब यह आंदोलन ज्यादा व्यापक आधार वाला आंदोलन बन गया था। जिसे स्वदेशी आंदोलन के नाम से जाना जाता था।

विभाजन की घोषणा के बाद से ही दिनाजपुर, पबना, फरीदपुर, ढाका, वीरभूमि और बारीसाल में विभाजन विरोध सभा का आयोजन किया गया। कृष्णाकुमार मित्र की साप्ताहिक पत्रिका संजीवनी में 13 जुलाई 1905 में सबसे पहले अंग्रेजी वस्तु के बहिष्कार के बारे में सलाह दी गई थी। कोलकाता के विद्यार्थियों ने भी विरोध बैठके बुलाई थी। 7 अगस्त के दिन कोलकाता के टाउन हॉल में विराट जनसभा में बहिष्कार का प्रस्ताव रखा गया, और साथ ही स्वदेशी आंदोलन की विधिवत रूप से घोषणा की गई। स्वदेशी आंदोलन में बंगाल के सभी वर्गों धर्म और जातियों के लोगों ने मिलकर साथ दीया था। कई सारे नरमपंथी नेता ने भारत भर में घूम कर भारत के लोगों से मैनचेस्टर के कपड़े और लिवरपूल के नमक के बहिष्कार करने के लीए अपील की।

स्वदेशी आंदोलन की प्रगति

ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जब 1 सितंबर को बंगाल विभाजन के बारे में घोषणा करने में आई की, 16 अक्टूबर 1905 में बंगाल विभाजीत होगा, तो तभी से स्वदेशी आंदोलन मे तेजी आई।

कालीघाट के मंदिर में 28 सितंबर 1905 के पितृ विसर्जन के दिन एक विशाल पूजा करने में आई थी। इस पूजा में देवी देवताओं की पूजा से पहले मातृभूमि की पूजा करने में आई थी। भारत के लोगों ने नंगे पैर जुलूसो में हिस्सा लेकर विदेशी माल के बहिष्कार के लिए शपथ ली थी। इस घटना के परिणाम रूप कोलकाता के कस्टम कलेक्टर ने बताया था, कि अगस्त 1905 की तुलना में सितंबर 1906 में सुती थानों की आयात मे 22%, सुत की लच्छी मेें और सुत मे 44%, नमक मेंं 11%, सिगरेट में 55 प्रतिशत और जूते चप्पलों में 48% कमी आ गई थी। जिस दिन बंगाल विभाजन की घोषणा हुई थी, उस दिन को बंगाल के लोगोंं ने शोक दिन के रूप में मनायाा था।

बंगाल के लोगों ने घरों के चूल्हे भी नहीं जलाए थे, और कोलकाता के लोगो ने उपवास रखकर हड़ताल की थी। लोगों ने नंगे पैर चलकर गंगा स्नान किया था। कोलकाता के रास्तों पर लोगों ने वंदे मातरम के नारे लगाने शुरू कर दिए थे। इस समय रवींद्रनाथ ठाकुर ने आमार सोनार बंगला गित की रचना की थी।

बंगालियों और बंगाल के लोगों की एकता के प्रतिक के लिए रंग बिरंगी राखियों का आदान प्रदान करने में आया था। इसमें 50000 से भी ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था। आनंद मोहन बोस और सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने 50 से 75 हजार लोगों को एकत्रित करके जनसभा की थी। बंगाल की एकता के लिए आनंद मोहन बोस ने फेडरेशन हाल की नींव रखी थी।

1905 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में अध्यक्ष के पद पर रहकर गोखले ने स्वदेशी आंदोलन का समर्थन करते हुए विदेशी चीज वस्तुओं का बहिष्कार करने के बारे में बताया था। तिलक, बिपिनचंद्र पाल, लाला लाजपतराय और अरविंद घोष जैसे गरमपंथी नेता स्वदेशी आंदोलन और बहिष्कार के साथ-साथ इस आंदोलन को जनांदोलन का रूप देना चाहते थे। इन नेताओं का उद्देश्य विभाजन की नीरस्ती के बदले स्वराज हो गया था।

1906 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन मैं दादाभाई नौरोजी ने अध्यक्षष के पद भाषण देते हुए बताया था, कि कांग्रेस का उपदेश ब्रिटेन अथवा उनकेेे उपनिवेश के जैसे ही भारत में अपनी सरकार का गंठन करना है। परंतु कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी समूह मे स्वदेशी आंदोलन की गति और संघर्ष के तौर-तरीकों को लेकर मतभेद हो गया था। मतभेद की वजह से वर्ष 1907 में सूरत का बदनाम विभाजन हो गया।

स्वदेशी आंदोलन बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा

बंगाल विभाजन के मैं विरुद्ध प्रारंभ किए गए भारत के लोगों के  बहिष्कार, स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रीय शिक्षा को राष्ट्रीय हथियार बना लिया था। भारत में जब यह आंदोलन चल रहा था, तब चीन में भी अमेरिका के माल के बहिष्कार के लिए आंदोलन चल रहा था। जिस से प्रेरणा लेकर भारत केेे लोगों में बहिष्कार की भावना और बढ़़ गई। भारत के लोगों ने जगह जगह पर विदेशी कपड़ों की होली की, और स्वदेशी माल की बीक्री के लीए स्वदेशी दुकाने खोली। इस घटना केेे बाद से विदेशी माल की खपत तेजी से कम हो गई। स्वदेशी वस्तुु की बिक्री ज्यादा होनेे लगी।

स्वदेशी आंदोलन को सफल आंदोलन बनाने में सबसे बड़ा योगदान छात्रों और नवयुवा नो का रहा था। कोलकाता में वर्ष 1905 में 11 सितंबर के दिन कोलेज स्क्वायर मे करीबन 10000 छात्रों ने एकत्र होकर सभा की थी। साथ ही 16 नवंबर 1905 को भी एक ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ था, जिसमें राष्ट्रीय शिक्षा के विस्तार को बढ़ाने के लिए योजना का प्रस्ताव रखा गया था। इस प्रस्ताव का सभी ने स्वीकार किया था। सरकारी शिक्षा संस्थाओं के बहिष्कार के साथसाथ राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना के लिए आंदोलन शुरू हुए। राष्ट्रीय शिक्षा का आंदोलन अगस्त 1906 मे बंगाल नेशनल कॉलेज एंड स्कूल की स्थापना के बाद से आगे बढ़ा। सुबोध मलिक ने 9 नवंबर को नेशनल कॉलेज इन स्कूल को ₹100000 की राशि दान देकर आंदोलन को प्रोत्साहित किया।

तिलक ने भारत के मुंबई और पुणे में आंदोलन का प्रचार किया था। तिलक के साथ परांजपे ने और तिलक की पुत्री श्रीमती केलकर तथा श्रीमती जोशी ने मुंबई में इस आंदोलन के लिए प्रचार किया था। बंगाल के क्षेत्र में विपिन पाल, अरविंद घोष और ब्रह्मा बांधव उपाध्याय ने इस आंदोलन का प्रचार किया था। सुब्रमण्यम अय्यर, चिदंबरम पील्लीइ, आनंद चारलु और टी.एम नायर ने मद्रास में आंदोलन का प्रचार किया था। स्वदेशी आंदोलन का सबसे ज्यादा जोर उत्तरी भारत के रावलपिंडी, काँगडा, मुल्तान और हरिद्वार के विस्तार में था। पंजाब के क्षेत्रों में जयपाल राम, गंगाराम, अजीत सिंह, लाला लाजपतराय तथा आर्य समाज के चंद्रिका दत्त और स्वामी श्रद्धानंद ने आंदोलन को संचालित किया था। जब की सैयद हैदर रजा ने दिल्ली में आंदोलन का संचालन किया था।

स्वदेशी आंदोलन के जनसमर्थन के साधन

जनसभा और प्रदर्शन:

विभाजन विरोधी आंदोलन के समय में जनसभाए और प्रदर्शन भारत के लोगों को एकत्र करने के लिए सशक्त माध्यम थे। भारत के बड़े शहरों से लेकर कस्बो, शहरों, तालुको और गांव में भी जनसभा का आयोजन करके भारत के लोगों में राजनीतिक चेतना का प्रचार किया गया था। स्वदेशी आंदोलन के प्रचार के लिए पारंपरिक त्योहारों, धार्मिक मेलों, लोक परंपराएं, लोक संगीत और लोक नाट्य जैसे माध्यम का इस्तेमाल किया गया था।

धार्मिक पुनरुत्थानवाद:

अरविंद घोष ने धार्मिक पुनरुत्थानवाद की मदद लेकर जनता तक आंदोलन को पहुंचाया था। उग्रवादी नेताओं ने मई 1906 में प्रतिभा पूजा के साथ गणपति महोत्सव और शिवाजी जयंती के माध्यम से आंदोलन का प्रचार किया था। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने सबसे पहले स्वदेशी प्रतिज्ञा की पध्धती को मंदिर में इस्तेमाल किया था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन:

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन एक सशक्त माध्यम था। वर्ष 1907 में पुलिस ने 19 समितियों की होने की रिपोर्ट दी थी। इस समिति में स्वदेशी बांधव, प्रती, ढाका अनुशीलन और साधना समिति का समावेश होता है।

कोलकाता की एंटी सर्कुलर सोसायटी अपनी धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रसिध्ध थी। जो मुसलमान नेता हुसैन, अब्दुल हुसैन, दीदारबख्श और अब्दुल गफूर के द्वारा संचालित थी। सबसे प्रख्यात समिति अश्विनी कुमार दत्त की स्वदेशी बांधव समिति थी। इस समिति में 159 जितनी शाखाएं थी, जो पूरे जिले के दूरदराज के क्षेत्रों में प्रसरीत थी। अगस्त 1906 तक बारिसाल समिति ने 89 पंच अदालतों की मदद से 523 मामलों को सुलझाया था। बारिसाल समिति के बिल्कुल विपरीत अनुशीलन समिति थी। इस समिति की स्थापना पुनीलदास ने की थी। साल 1908 से लेकर 1909 के समय मे चक्र में खुली समितियां समाप्त हो गई, या तो गुप्त क्रांतिकारी समिति में तब्दील हो गई।

हड़तालो का आयोजन:

विदेशी मालिकोवाली कंपनियों में मजदूरों की हड़ताल आंदोलन के लिए सशक्त हथियार था। मुंबई के कारीगरों से संपर्क करना ज्यादा आसान था, जबकि कोलकाता के कारीगरों से संपर्क करना मुश्किल था। क्योंकि कोलकाता के कारीगर बंगाली थे, जबकि मुंबई के वर्ष 1911 के कारीगरों में से 49.16 प्रतिशत तिलक जिले के रत्नागिरी से थे।

तिलक ने वर्ष 1908 में केसरी अखबार में लेख प्रकाशित किया था। जिसकी वजह से तिलक पर कानूनी तौर पर मुकदमा चलाया गया। मुकदमे के अंत में तिलक को 6 साल की सजा दी गई। वर्ष 1908 के पश्चात श्रमिक आंदोलन में राष्ट्रीय वादियों की रुची कम होकर समाप्त हो गई।

स्वदेशी आंदोलन की प्रमुख प्रवृत्ति

स्वदेशी आंदोलन के चलते हैं चार मुख्य प्रवृत्ति की गई। इनमें स्थापित नरमदलीय प्रवृत्ति, रचनात्मक स्वदेशी प्रवृत्ति, राजनीतिक उग्रवाद और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का समावेश होता है।

नरमपंथी ने वर्ष 1903 में विभाजन की योजना की घोषणा के पश्चात से ही विभाजीन की आलोचना करना शुरू कर दिया था। आंदोलन को प्रार्थना पत्र, विज्ञापन और जनसभाओं के माध्यम से प्रचारीत कीया गया। परंतु जब उनको सफलता हासिल नहीं हुई तो वर्ष 1905 में विभाजन की योजना की घोषणा के बाद संकीर्ण आंदोलन को व्यापक तौर पर स्वदेशी आंदोलन में तब्दीली कीया गया।

इस योजना से नरमदलिय प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया के रूप में नई प्रवृत्ति की शुरुआत हुई, जिसमे निरर्थक और अपमानजनक भीख मंगी नीतियों को खत्म करके स्वावलंबन लाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। विदेशी माल के विकल्प के लिए स्वदेशी माल के उत्पादन के कार्य शुरू कीए गए। बंगाल के गरम पंथी रचनात्मक कार्यक्रम की प्रवृत्ति, जैसे कि दैनिक उपभोग की वस्तु का निर्माण करना, राष्ट्रीय शिक्षा, पंचायती अदालतों और दुकानोंं के माध्यम से स्वदेशी चीज वस्तुओं का व्यापार करनके कार्य से ज्यादा जुड़े हुए थे।

स्वदेशी चीज वस्तुओं की बिक्री वर्ष 1890 से करमे आई। वर्ष 1893 मे बंगाल केमिकल्स का प्रारंभ स्वदेशी रूप से किया गया था। चीनी मिट्टी की वस्तु को बनाने के लिए साल 1901 मे कारखाना स्थापित किया गया। सतीश चंद्र मुखर्जी ने वर्ष 1895 में भागवत चतुष्पदी, डॉन पत्रिका और वर्ष 1902 मे डान सोसायटी, ब्रह्माबांधव उपाध्याय के सारस्वत आयतन तथा रवींद्रनाथ ठाकुर के शांतिनिकेतन आश्रम के साथ आंदोलन की शुरुआत हुई।

वर्ष 1905 तक गरम पंथी रचनात्मक प्रवृत्ति में दो मुख्य धाराए थी। पहली अराजनीतिक रचनात्मक स्वदेशी जो आत्म विकास के लिए प्रयास कर रही थी, और दूसरी राजनीतिक गरमपंथी जो सविनय अवज्ञा पर कार्य कर रही थी। राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत के पहले अराजनीतिक रचनात्मक पर जोर दिया गया था। रविंद्रनाथ ठाकुर ने वर्ष 1904 में अपने भाषण में स्वदेशी समाज का नारा दिया था। वह जुलाई 1905 के बाद बंगाल के लोगों के लिए मूल मंत्र बन गया था। भारत ने अब कपड़ों के कारखाने, हथकरघों, माचिस और साबुन के कारखाने तथा चर्म उद्योग के कारखानो को स्वदेशी रूप से स्थापित कर दिए थे।

वर्ष 1906 के बाद से आंदोलन मे नया मोड़ आया। राजनीतिक उग्रवाद बंगाल के उत्साही शिक्षित युवकों को प्रेरित करने लगा।  अरविंद घोष, विपिन चंद्र पाल और  ब्रह्मा बांधव उपाध्याय को लगने लगा था, कि स्वतंत्रता के बिना राष्ट्रीय जीवन का पुनर्निर्माण संभव नहीं है।  इन नेताओं ने भारत के लोगों के सामने अनेक विचार, योजना और तरीके रखें जिसकी मदद से व्यापक जनांदोलन के माध्यम से राजनीतिक स्वाधीनता का उद्देश्य सिद्ध हो सके।

इस चरण में विभाजीन विरोधी आंदोलन के कार्यक्रम में मुख्य चार बातों का समावेश किया गया था। जिसमें विदेशी वस्तु और संस्था का बहिष्कार करना, विदेशी चीज वस्तु के स्वदेशी विकल्प का विकास करना, अन्यायपूर्णा कानून का भंग करना और ब्रिटिश दमन के लिए जरूरत पड़ने पर हिंसक आंदोलन करने के कार्य जुड़े थे।

स्वदेशी आंदोलन की विशेषता

आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन:

स्वदेशी आंदोलन के मुख्य विशेषता के रूप में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का नारा मिला। राष्ट्रवादी नेताओं का कहना था कि सरकार के विरुद्ध संघर्ष से चलाने के लिए भारत की जनता को स्वावलंबन की भावना के लिए प्रेरित करना अत्यंत जरूरी है। स्वावलंबन और आत्म निर्भर राष्ट्रीय स्वाभिमान, आदर और आत्मविश्वास से संबंधित है।

रचनात्मक कार्य:

आर्थिक और सामाजिक कार्य के लिए गांव के लोगों को रचनात्मक कार्य के माध्यम से प्रगति के लिए आगे लाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस रचनात्मक कार्य में सामाजिक सुधार, जाति प्रभुत्व, बाल विवाह, दहेज और शराबखोरी जैसी सामाजिक बुराई को समाप्त करने के लिए कार्य किए जाते थे।

राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्था की स्थापना:

राष्ट्रवादीयोने राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्था की स्थापना साहित्य, तकनीकी और शारीरिक शिक्षा देने के लिए की थी। रविंद्र नाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन के माध्यम से कोलकाता में बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना करवाई थी। अरविंद घोष ने अपनी बडौदा रियासत की ₹750 मासिक आवक की नौकरी का त्याग करके ₹75 मासिक आवक पर कॉलेज के प्रिंसिपल बने थे।

राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गंठन 15 अगस्त 1906 को हुआ था। राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का उद्देश्य राष्ट्रीय नियंत्रण के माध्यम से भारत की जनता को साहित्य, विज्ञान और तकनीकी शिक्षा देना था। भारत के लोगों को तकनीकी शिक्षा देने के लिए बंगाल इंस्टिट्यूट की स्थापना करने में आई थी। वर्ष 1904 में जोगेंद्र चंद्र घोष ने एक संस्था की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य चंदा इकट्ठा करके विद्यार्थी को तकनीकी शिक्षण प्राप्त कराने के हेतु जापान भेजना था। थोड़े ही समय में भारत भर में अनेक राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना हो गई थी। वर्ष 1909 आते आते मुंबई क्षेत्र में माध्यमिक नेशनल स्कूल, पूना में समर्थ विद्यालय और महाराष्ट्र विद्यालय, बशर में नेशनल स्कूल, मूसलीपट्टम में मारल नेशनल कॉलेज और राजमुंदरी मे माध्यमिक स्कूल तथा संयुक्त क्षेत्रों में अयोध्या नाथ नेशनल हाई स्कूल की शुरुआत हो चुकी थी।

पारंपरिक दस्तकारीयों को प्रोत्साहन:

स्वदेशी आंदोलन के रुझान ने हथाकरघा, रेशम की बुनाई और अन्य पारंपरिक दस्तकारीयों मे नवजीवन लाने के लिए प्रचार कीया। इसी दौरान  स्वदेशी कापड के कारखाने, साबुन और माचिस के कारखाने, चर्म उद्योग, हैंडलूम्स, बैंक और बीमा की कंपनियां स्थापित करने में आई थी। भारतीय वस्त्र उद्योग को सहायता करने के लिए सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने सार्वजनिक सभा के दौरान से ₹70000 इकट्ठे किए थे। दी बंगल लक्ष्मी कॉटन मिल्स की स्थापना अगस्त 1906 में करमे मे आई थी। वर्ष 1906 मे कोलकाता में चीनी मिट्टी के कारखाने, क्रोम टेनींग, दियासलाई उद्योग और सिगरेट बनाने के कारखाने की स्थापना की गई। आचार्य बी.सी राय ने प्रख्यात बंगाल केमिकल के स्वदेशी स्टोर की शुरुआत की थी।

सांस्कृतिक उपलब्धियाँ:

स्वदेशी आंदोलन में देशभक्ति के गीतों के भंडार और अन्य महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उपलब्धियो का समावेश होता है। इस समय में राष्ट्रवादी कविता और पत्रकारिता का विकास हुआ था। साहित्य काल के समय में रवींद्रनाथ ठाकुर, रजनीकांत सेन, द्विजेंद्रालाल राय, मुकुंद दास, सैयद अबू, मोहम्मद इत्यादि ने गीत की रचना की थी। साथ ही लोक कथाएं भी लिखी गई, जिसमें दक्षिणा रंजन मित्र मजूमदार की लिखित ठाकुरमार झूली वर्तमान समय में भी बंगाल के बच्चों को सुनाई जाती है।

कला और विज्ञान:

कला के क्षेत्र में अरविंद्रनाथ टैगोर नेभारतीय कला पर पाश्चात्य संसकृती के आधीप्तय खत्म किया, और मुगलो तथा राजपूतों की प्रख्यात स्वदेशी पारंपरीक कलाओं और अजंता की चित्रकला से प्रेरणा लेकर स्वदेशी चित्रकारी की कला को स्थापित किया। नंदलाल बोस को वर्ष 1906  में स्थापित इंडियन सोसायटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट्स की पहली छात्रवृत्ति मीली थी। स्वदेशी आंदोलन को जगदीशचंद्र बोस, प्रफुल्लचंद्र राय और अन्य वैज्ञानिकों के विज्ञान के क्षेत्रों में हासिल की गई सफलता के कारण बल प्रदान हुआ।

स्वदेशी आंदोलन में अलग-अलग वर्गों की भूमिका

स्वदेशी आंदोलन सामाजिक दायरे में फैला हुआ था। इस आंदोलन में समाज का बहुत बड़ा हिस्सा सक्रिय राष्ट्रवादी राजनीति से जुड़ा था। छात्रों के द्वारा करने में आ रहे आंदोलन को रोकने के लिए विद्यार्थियों को डराया गया और धमकी दी गई कि राष्ट्रवादी शिक्षा संस्थानों को अनुदान, छात्रवृत्ति और विश्वविद्यालय की संबद्धता से वंचित कर दिया जाएगा। सरकार की धमकी का बंगाल के युवाओ और विद्यार्थियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने विदेशी कपड़े बेचने वाली दुकान के सामने हड़ताल शुरू कर दी, और स्वदेशी चीज वस्तु का इस्तेमाल करने के लिए प्रचार करने लगे।

राष्ट्रीय शिक्षा के नाम पर सिर्फ बंगाल नेशनल कॉलेज बंगाल तकनीकी संस्था की स्थापना की गई थी। पश्चिम बंगाल और बिहार में एक दर्जन तो पूर्वी बंगाल में उससे भी ज्यादा राष्ट्रीय विद्यालय स्थापित कि गइ।

आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी:

स्वदेशी आंदोलन में महिलाओं ने भी सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था। महिलाए पहली बार घर से बाहर निकल कर आंदोलन में चूड़ी थी।

आंदोलन में मजदूरों की भागीदारी:

स्वदेशी आंदोलन में मजदूर वर्ग की आर्थिक परेशानियों को राजनीतिक स्तर पर लाया गया था। इस आंदोलन में ईस्टर्न रेलवे और क्लाइव जुट मील के मजदूरों ने हड़ताल कर दी थी। इस प्रकार मजदूरों ने भी स्वदेशी आंदोलन में अपना योगदान दिया था।

किसानों में राष्ट्रीयता की चेतना का संचार:

स्वदेशी आंदोलन किसानों को छोड़ने में असफल रहा था। सिर्फ बारिसाल के किसान जुडें थे। उसके बावजूद स्वदेशी आंदोलन में थोड़े बहुत किसानों को आंदोलन से जोडकर राजनीतिक चेतना जगाई।

मुसलमानों का सहयोग:

आंदोलन में अब्दुर्रसूल, आंदोलनकारी लियाकत हुसैन और व्यापारी गजनवी प्रमुख मुसलमान थे। स्वदेशी आंदोलन में मुसलमानों ने भी अपना योगदान दिया था।

स्वदेशी आंदोलन समाप्ति की वजह क्या थी?

सरकार की दमन नीति:

वर्ष 1908 के मध्य तक इसी आंदोलन समाप्त हो गया। सरकार को आंदोलन के खतरे के बारे मैं पहचान हो गई थी। इसकी वजह से उन्होंने ईसे निर्ममतापूर्वक रोकने का कार्य शुरू किया। ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक सभाएं, प्रदर्शन, प्रेस और प्रतिबंध लगा दिया। आंदोलन में शामिल विद्यार्थियों को स्कूल और कॉलेजों से निकाला जाने लगा। साथ ही विद्यार्थियों को सरकारी नौकरी से दूर कर दिया गया।

कांग्रेस पार्टी के आपसी मतभेद:

स्वदेशी आंदोलन के खत्म होने का दूसरा मुख्य कारण कांग्रेस पार्टी का आपसी मतभेद था। वर्ष 1907 में कांग्रेस विभाजित हो गया जिसकी वजह से स्वदेशी आंदोलन को क्षति हुई। स्वदेशी आंदोलन बंगाल के बाहर के क्षेत्रों में भी फैल चुका था, परंतु बंगाल को छोड़कर भारत के दूसरे हिस्सों में आधुनिक राजनीतिक विचारधारा और संघर्ष को अपनाने के लिए लोगों में जागृति नहीं थी। सरकार ने इसका फायदा उठाकर वर्ष 1907 और 1908 में अश्विनी कुमार दत्त और कृष्णा कुमार मित्रों सहित 9 बंगाली नेताओं को निर्वासित कर दिया। पंजाब के लाला लाजपत राय अजीत सिंह, मद्रास के चिदंबरम पिल्ले और आंध्र के हरि सर्वोत्तम राई को निर्वाचित किया गया। नेताओं की गिरफ्तारी से स्वदेशी तथा बहिष्कार आंदोलन की नींव हिल गई थी। साथ ही विपिनचंद्र पाल और अरविंद घोष के राजनीतिक सन्यास से स्वदेशी आंदोलन नेतृत्व विहीन हो गया था।

प्रभावी संगठन का अभाव:

स्वदेशी आंदोलन में प्रभावी संगठन की कमी होने की वजह से अहिंसक आंदोलन, जेल भरो आंदोलन, सामाजिक सुधार, गांव में रचनात्मक कार्य इत्यादि जैसे कई सारे गांधीवादी तरीको को अपनाया गया। किंतु संगठन के अभाव के कारण इन तरीकों को अनुशासित केंद्रीय दिशा नहीं मिली।

स्वदेशी आंदोलन का पुनरुत्थानवादी चरित्र:

स्वदेशी आंदोलन खत्म होने के चौथे मुख्य कारण में धार्मिक चरित्र वाले पारंपरिक रीति-रिवाजों और संस्था का सहारा लेना नुकसान कारक रहा। गरम पंथी नेताओं द्वारा प्रतिभा पूजा के साथ साथ शिवाजी उत्सव, वंदे मातरम, संध्या और युगांतर जैसी पत्रिका के प्रचार के कारण बंगाल के मुसलमान और नीचे जाति के किसान स्वदेशी आंदोलन मैं नहीं जुड़े थे।  और इसकी वजह से यह लोग सांप्रदायिक राजनीति के शिकार हो गए थे। कृष्णा कुमार ने एंटी सर्कुलर सोसायटी मैं मुसलमान कार्यकर्ता और शुभचिंतकों की भावना का सम्मान करते हुए शिवाजी उत्सव का बहिष्कार किया था।

अंग्रेज सरकार की सांप्रदायिक नीति:

बंगाल क्षेत्र की सामाजिक आर्थिक व्यवस्था भी संप्रदायिकता के विकास के लिए मदद रूप साबित हुई। बंगाल में ज्यादातर भूस्वामी हिंदू थे, और मुसलमान खेतिहर मजदूर थे। स्वदेशी आंदोलन के दौरान पूर्वी बंगाल में मैमनसिंह जिले के ईश्वर गंज में मई वर्ष 1906 को, मार्च 1907 में कोमिला में और जमालपुर में, दीवानगंज और बक्शीगंज में अप्रैल-मई 1907 में सांप्रदायिक को लेकर दंगे करने में आए। दंगे करने वाले लोगों के लक्ष्म मे हिंदू जमींदार और महाजन जिसमें से कुछ ने हाल में ही ईश्वरवृत्ति को अपनाया था वे थे। अनेक जगहों पर गरीबों के द्वारा अमीरों के माल की लूट करने में आई थी।

वर्ष 1908 के मध्य में स्वदेशी आंदोलन समाप्त हो गया था। वर्ष 1907 में बदनाम विभाजन के बाद कांग्रेस कमजोर और अप्रभावी हो चुकी थी। साथ ही उग्रपंथी राजनीति किसी नए राजनीतिक संगठन का रूप नहीं ले पा रही थी। जिसकी वजह से साल 1908 में राजनीतिक उग्रवाद का अंत हो गया। इसके साथ ही क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की शुरुआत हुई। इसके परिणाम रूप स्वदेशी आंदोलन में जुड़े नौजवान को राष्ट्रीयता और सामूहिक राजनीतिक संघर्ष का पाठ हो गया, और उन्होंने अपने ढंग से क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।

इस स्वदेशी आंदोलन के अंत के साथ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के युग का अंत हुआ। स्वदेशी आंदोलन को पूर्ण रूप से असफल नहीं कहा जा सकता। स्वदेशी आंदोलन के चलते समाज में राष्ट्रीय जाके चेतना का संचार हुआ। विद्यार्थी, किसान और मजदूर को राष्ट्रीय चेतना की नई दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मिली।

Last Final Word

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