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आचार्य चाणक्य की जीवनी

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आचार्य चाणक्य का जन्म इतिहासकारों के अनुसार जन्म ईसापूर्व 376 में तक्षशिला में हुआ था और उनकी मृत्यु इसापुर्वक 283 में पाटलिपुत्र में हुई थी। कुछ ज्ञाननी के अनुसार आचार्य चाणक्य का जन्म पंजाब के ‘चणक’ क्षेत्र में हुआ था यानि आज का चंडीगढ, जबकि कुछ ज्ञानी मानते हैं, कि उसका जन्म दक्षिण भारत में हुआ था। कई इतिहासकारों का यह मत है, कि वह कांचीपुरम का रहने वाले द्रविण ब्राह्मण यानि की दक्षिण भारतीय रहेवासी थे। वह जीविकोपार्जन की तलाश में उत्तर भारत आये थे। कुछ विद्वानों के कहे अनुसार केरल में भी उनका जन्म स्थान बताया गया है। इस संबंध में उनके द्वारा चरणी नदी का वर्णन इस बात के प्रमाण के स्वरूप में दिया गया है। कई सन्दर्भों में यह विवरण मिलता है, कि केरल के निवासी आचार्य चाणक्य वाराणसी में आया था, जहाँ पे उनकी पुत्री गम हो गयी थी। आचार्य चाणक्य फिर कभी केरल वापस नहीं लौटा और मगध राज्य में आकर बस गऐ थे। इस प्रकार के विचार रखने वाले इतिहासकार उसे केरल के निषाद कुतुल्लूर नामपुत्री वंश का वंशज मानते हैं। कई ज्ञानी ने चाणक्य को मगध का ही मूल निवासी माना है। कुछ बौद्ध साहित्यों ने उसे तक्षशिला का निवासी बताया है। चाणक्य  के जन्मस्थान के संबंध में अत्यधिक मतभेद रहने के कारण निश्चित रूप से यह कहना कि उसका जन्म स्थान कहाँ था, यह बहुत कठिन है, लेकिन कई इतिहासकारों  के आधार पर तक्षशिला राज्य को कौटिल्य का जन्म स्थान मानना ठीक होगा।

आचार्य चाणक्य की माता का नाम चनेश्वरी और उनके पिता का नाम ऋषि कनक था वह एक ब्रह्मंड कुटुंब से थे। चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। वे कौटिल्य या विष्णुगुप्त नाम से भी प्रख्यात हैं। आचार्य श्री चणक के शिष्य होने के कारण वह चाणक्य कहलाए गए । विष्णुगुप्त मौर्य राजनेतिकनिति, अर्थनीति, राजनीति के महाज्ञानी,और अपने महाज्ञान का ‘कुटिल’ ‘सदुपयोग ,समाजकल्या तथा अखंड भारत के संस्थापक जैसे रचनात्मक कामो में करने के कारण वे  कौटिल्य’ ‘कहलाये। वास्तव में आचार्य विष्णुगुप्त मौर्य अपने कर्मो से सत्य ब्राह्मण और उत्पत्ति से क्षत्रिय और सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के बड़ा भाई, तथा अपने माता-पिता के पहली संतान थे।

जन्म उपरान्त इनके माता का प्रसव पीड़ा से , असामयिक निधन हो गया था। राज ज्योतिष ने भविष्यवाणी की थी कि बालक में राजयोग बिलकुल नहीं है। लेकिन बालक में चमत्कारिक ज्यानयोग व विद्वता है। इसकी विलक्षण विद्वत्ता जो सूर्य के प्रकाश के सामान सम्पूर्ण जम्बू द्वीप को आलोकित करेंगी वे तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य थे , उन्होंने मुख्यत: भील और किरात राजकुमारों को प्रशिक्षण दिया । उन्होंने नंदवंश का नष्ट करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया। आचार्य चाणक्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र नामक ग्रन्थ राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि का एक महान ग्रंन्थ है। अर्थशास्त्र मौर्यकालीन भारतीय समाज का दर्पण माना जाता है। कोटिल्य की मृत्यु को लेकर दो कहानियां निर्दश में आती है,परन्तु दोनों में से कौन सी सत्य है, इस की अभी कोई माहिती  नहीं मिल पाई है।

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विष्णुपुराण, भागवत आदि पुराणों तथा कथासरित्सागर आदि संस्कृत ग्रंथों में तो आचार्य चाणक्य का नाम आया ही है, लेकिन बौद्ध ग्रंथो में भी इनकी कथा पढने को मिलती है। बुद्धघोष की बनाई हुई विनयपिटक की टीका तथा महानाम स्थविर रचित महावंश की टीका में चाणक्य का विवरण दिया हुआ है। चाणक्य तक्षशिला  के निवासी थे। कौटिल्य के जीवन की घटनाओं का विशेष संबंध मौर्य चंद्रगुप्त की राज्यप्राप्ति से है। चाणक्य उस समय के एक प्रसिद्ध विद्वान थे, इसमें कोई संदेह नहीं। ऐसा कहते हैं कि चाणक्य राजसी ठाट-बाट से दूर एक छोटी सी झोपडी में रहते थे।

चाणक्य के नाम पर डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी के द्वारा लिखित और निर्देशित 47 भागों वाला एक धारावाहिक भी बना था, इसमें मूल स्वरूप से 8 सितंबर 1991 से 9 अगस्त 1992 तक डीडी नेशनल पर प्रसारित किया गया था।

आचार्य चाणक्य का जीवन परिचय
वास्तविक नामविष्णुगुप्त, कौटिल्य
उपनामचाणक्य और भारतीय मेकियावली
व्यवसायशिक्षक, दार्शनिक, अर्थशास्त्री, कूटनीतिज्ञ और चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री
प्रसिद्ध हैंशास्त्रीय राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र के जनक
 व्यक्तिगत जीवन
जन्मतिथि375 ई.
जन्मस्थानतक्षशिला (अब जिला रावलपिंडी, पाकिस्तान)
गोला क्षेत्र में गांव चणक (वर्तमान में उड़ीसा) (जैन पाठ्यक्रम के अनुसार)
मृत्यु तिथि283 ई.
मृत्यु स्थलपाटलिपुत्र (वर्तमान में पटना), भारत
मृत्यु कारणकुछ विद्वानों के अनुसार, भोजन नहीं करने के कारण
आयु (मृत्यु के समय)80 वर्ष
गृहनगरतक्षशिला
कॉलेज/महाविद्यालय/विश्वविद्यालयतक्षशिला या टैक्सिला विश्वविद्यालय, प्राचीन भारत (वर्तमान में रावलपिंडी, पाकिस्तान)
शैक्षणिक योग्यतासमाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि में अध्ययन
धर्महिन्दू
जातिद्रविण ब्राह्मण
शौक/अभिरुचिपुस्तकें पढ़ना, लेखन करना, भाषण देना
प्रेम संबन्ध एवं अन्य जानकारियां
वैवाहिक स्थितिविवाहित (कुछ स्रोतों के अनुसार)
अविवाहित (कुछ स्रोतों के अनुसार)
परिवार
पत्नीज्ञात नहीं
माता-पितापिता – ऋषि कनक
माता – चनेश्वरी

चन्द्रगुप्त के साथ चाणक्य की मैत्री

पाटलिपुत्र के नंद वंश के राजा धनानंद के दरबार में, चाणक्य गए और उन्होंने अखंड भारत की बात की थी,  और  ऐसा कहा कि वह पोरव राज्य से यमन शासक सेल्युकस को हिसा दे लेकिन, धनानंद इस बात को नकार दिया था, क्योंकि पोरस राज्य के राजा की हत्या धनानंद ने यमन के शासक सेल्युकस से करवाई गई थी। जब यह बात चाणक्य को स्वयं महानंद ने बताई तब आचार्य चाणक्य क्रोधित गए और उन्होंने  यह प्रतिज्ञा ली की जब तक “मैं नंदों का विनाश न कर लूँगा तब तक अपनी शिखा को नहीं बाँधूंंगा”। उसी समय दौरान राजकुमार चंद्रगुप्त को राज्य से निकाले गए थे। चंद्रगुप्त ने चाणक्य से मेल किया और दोनों पुरुषों ने मिलकर म्‍लेच्‍छ राजा पर्वतक की सेना लेकर पाटलिपुत्र पर चढ़ाई की और नंदों को युद्ध में परास्त करके मार डाला।

नंदों के नष्ट के संबंध में कई प्रकार की कथाएँ प्रसिद्ध हैं। कहीं लिखा है, कि चाणक्य ने महानन्द के यहाँ निर्माल्य भेजा जिसे छूते ही महानंद और उसके बेटे मरे गए थे, और कहीं विषकन्या भेजने की कथा लिखी गई है। मुद्राराक्षस नाटक के देखेने से जाना जाता है, कि नंदों को ख़त्म करने पर भी महानंद के मंत्री राक्षस के कौशल और नीति के कारण चंद्रगुप्त को मगध का राज्य प्राप्त करने में बहुत ही मुश्केलिया पड़ीं थी। अंत में कौटिल्य ने अपने नीतिबल से राक्षस को प्रसन्न किया और चंद्रगुप्त का मंत्री बनाया लिया। बौद्ध ग्रंथो में भी इसी प्रकार की कथा है, मात्र ‘महानंद’ के स्थान पर ‘धनानन्द’ शब्द है।

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आचार्य चाणक्य की शिक्षा  

आचार्य चाणक्य ने अपनी शिक्षा नालंदा विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। नालंदा विश्वविद्यालय इतना पुराना है कि जिस समय संपूर्ण विश्व में ज्यादातर विश्वविद्यालय नहीं थे, उस समय दौरान नालंदा विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध था। कौटिल्य ने अपने बचपन के समय में ही बहुत ही विलक्षण और कौशल्य के प्रचुर व्यक्ति थे, और इतना ही नहीं कौटिल्य  इसके साथ बहुत ही होनहार विधार्थी और पढ़ाई लिखाई में सघन रुचि रखने वाले शिष्य थे।

इसी के विरिद्ध कुछ इतिहासकारों के द्वारा यह मालूम चलता है, कि महान विद्वान आचार्य चाणक्य  ने तक्षशिला विद्यालय में भी शिक्षा ग्रहण की थी। कौटिल्य एक ब्राह्मण परिवार में पैदा होने के कारण भी उन्होंने अर्थशास्त्र, राजनीति, वैद्य, युद्ध रणनीति, ज्योतिष आदि जैसी शिक्षकों को प्राप्त किया और वहीं शिक्षा में विशेषज्ञ भी बन गए।

आचार्य चाणक्य द्वारा लिखित ग्रंथ से सबंधित जानकारी 

कौटिल्य के लिखित ग्रंथ के संबंध में भी कई ज्ञानीओ के बीच विभिनत पाई गई है। चाणक्य की कई सारे ग्रंथ में, इस संबंध में कोई निश्चित सूचना उपलब्ध नहीं है। कौटिल्य की सबसे महत्त्पूर्ण ग्रंथ अर्थशास्त्र की चर्चा हर जगह पे देखने को मिलती है, लेकिन अन्य रचनाओं के संबंध में कुछ विशेष वर्णन नहीं मिलता है।

आचार्य चाणक्य के शिष्य कामंदक ने अपने ‘नीतिसार’ नामक ग्रंथ में लिखा है, कि विष्णुगुप्त चाणक्य ने अपने बुद्धिबल से अर्थशास्त्र रूपी महोदधि को मथकर नीतिशास्त्र रूपी अमृत निकाला था। कौटल्य का ‘अर्थशास्त्र’ संस्कृत में राजनीति विषय पर एक अनोखा ग्रंथ माना जाता है। कौटल्य की नीति के श्लोक तो सभी जगह पे  प्रचलित हैं। इसके बाद से लोगों ने चाणक्य की नीति ग्रंथों से घटा बढ़ाकर वृद्धचाणक्य, लघुचाणक्य, बोधिचाणक्य आदि कई सारे नीतिग्रंथ संकलित कर लिए। कौटल्य सभी विषयों के पंडित थे। ‘विष्णुगुप्त सिद्धांत’ नाम का इनका एक ज्योतिष का ग्रंथ भी मिलता है। कहते हैं, आयुर्वेद पर भी कौटल्य ने लिखा ‘वैद्यजीवन’ नाम का एक ग्रंथ है। न्याय भाष्यकार वात्स्यायन और कौटल्य को कोई कोई एक ही मानते हैं, पर यह भ्रम है जिसका मूल हेमचंद का यह श्लोक है:

वात्स्यायन मल्लनागः, कौटिल्यश्चणकात्मजः।
द्रामिलः पक्षिलस्वामी विष्णु गुप्तोऽंगुलश्च सः॥

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यों धातुकौटिल्या और राजनीति नामक रचनाओं के साथ आचार्य चाणक्य का नाम जोड़ा गया है। कुछ ज्ञानी का यह कहना है कि ‘अर्थशास्त्र’ के अलावा यदि कौटिल्य की अन्य रचनाओं का वर्णन मिलता है, तो वह चाणक्य की सूक्तियों और कथनों का संग्रह हो सकता है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र

मुख्य लेख: अर्थशास्त्र ग्रन्थ

चाणक्य ने समाज को कर्म के आधार पर चार वर्गो में बंटा है-

  1. ब्राह्मण
  2. श्रत्रिय
  3. वैश्य
  4. शुद्र

आचार्य चाणक्य की राज्य कल्पना 

राज्य की उत्पत्ति के सन्दर्भ में चाणक्य ने स्पष्ट रुपस से कुछ नही खा है लेकिन कुछ आकस्मिक घटनाओ से की गई टिप्पणियों से यह स्पष्ट होता है, की कौटल्य राज्य के देवी सिद्धांत के स्थान पर सामाजिक समझोते का पक्षधर था। हॉब्स, लॉक तथा रूसो की तरह राष्ट की उत्पत्ति से पूर्व की साधारण दशा को वह  विशृंखलता की संज्ञा देता है। राष्ट का निर्माण तब हुआ जब ‘मत्स्य न्याय’ कायदे से तंग आकर लोगों ने मनु को अपना राजा चुना तथा अपनी कृषि उपज का छठा भाग तथा स्वर्ण का दसवा भाग मनु को देना स्वीकार किया। इसके बदले में राजा मनु ने उनकी सुरक्षा तथा कल्याण का जिमा सम्भाला। कौटिल्य राजतंत्र का हिमायती है।

चाणक्य ने पश्चिमी राजनीतिक विचार को द्वारा प्रतिपादित राष्ट के चार आवश्यक तत्त्वों – जमीन, जनसंख्या, सरकार व सम्प्रभुता का वर्णन न देकर राज्य के सात तत्त्वों का व्याख्यान किया है। इस सबंध में कौटिल्य  राज्य की परिभाषा नहीं दी, लेकिन पहले से चले आ रहे साप्तांग सिद्धांत का समर्थन करते है। चाणक्य ने राज्य की तुलना मानव-शरीर से की है, और उसके सावयव रूप को स्वीकार किया है। राष्ट  के सारे तत्त्व मानव शरीर के अंगो के समान आपस में सबंधित, अन्तनिर्भर तथा मिल-जुलकर कार्य करते हैं।

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स्वाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्राणि प्रकृतयः ॥अर्थशास्त्र

चाणक्य के सप्तांग सिंद्धांत 

(1) स्वामी (राजा) शीर्ष के तुल्य है। एक राजा सज्जन, बुद्धिमान, साहसी, धैर्यवान, संयमी, प्रज्ञावान और युद्ध-कला में कुशल  होना चाहिए।

(2) अमात्य (मंत्री)  एक राज्य की आँखे होते हैं। इस शब्द का प्रयोग चाणक्य  ने मंत्रीगण, सचिव, प्रशासनिक व न्यायिक पद के अधिकारी के लिए भी किया है। वे अपने ही देश के जन्मजात नागरिक, उच्च कुल से सबंधित, चरित्रवान, योग्य, अलग अलग कलाओं में कुशल तथा राजा का भक्त होने चाहिए।

(3) जनपद (जनसंख्या) राज्य की जंघाएँ या पैर हैं, जिन पर राज्य का अस्तित्व टिका है। चाणक्य  ने उपजाऊ, प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण, पशुधन, नदियों, तालाबों तथा वन्यप्रदेश प्रधान भूमि को उचित बताया है।जनसंख्या में कृषकों, उद्यमियों तथा आर्थिक उत्पादन में योगदान देने वाली प्रजा शामिल है। प्रजा को स्वामिभक्त, परिश्रमी तथा एक राजा की आज्ञा का पालन करने वाली होना चाहिए।

(4) दुर्ग (किला) राज्य की बाहें हैं, जिनका कार्य राज्य की रक्षा करना है। राज्य के राजा को एक ऐसे किलों का निर्माण करवाना चाहिए, जो आक्रमक युद्ध हेतु तथा रक्षात्मक दृष्टिकोण से फायदे कारक हों। चाणक्य ने चार प्रकार के किले -औदिक (जल) किला, पर्वत किला, जंगली किला और धन्वन किले का विवरण किया है।

(5) कोष (राजकोष) राज्य के मुख के समान है। कोष को राज्य का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना गया है, क्योंकि राज्य के संचालन तथा युद्ध के समय धन की  बहुत ही आवश्यकता होती है। कोष इतना विपुल होना चाहिए, कि किसी भी आपत्ति का सामना करने में सहाय करी हो। कोष में धन-वृद्धि हेतु चाणक्य ने कई सारे  उपाय बताए हैं। संकटकाल में राजस्व प्राप्ति हेतु वह राजा को सही तरीके ग्रहण करने की भी सलाह देता है।

(6) दण्ड (बल, डण्डा या सेना) राज्य का मस्तिष्क यानि दिमाग हैं। प्रजा तथा दुश्मन पर नियंत्रण करने के लिए बल अथवा सेना बहुत ही आवश्यक तत्त्व है।चाणक्य ने सेना के 6 प्रकार बताए हैं। जैसे-वंशानुगत सेना, धन  पर नियुक्त या किराए के सैनिक, सैन्य निगमों के सैनिक, साथी राज्य के सैनिक, दुशमन राज्य के सैनिक तथा आदिवासी सैनिक। संकटकाल में वैश्य तथा शूद्रों को भी सेना में भर्ती किया जा सकता है। सैनिकों को धैर्यवान, दक्ष, युद्ध-निपुर्ण तथा राज्य भक्त होना चाहिए। एक राजा को भी अपने सैनिकों की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना बहुत ही जरुरी है। चाणक्य ने दण्डनीति के चार लक्ष्य बताए हैं अप्राप्य वस्तु को प्राप्त करना, प्राप्त वस्तु की रक्षा करना, संरक्षित वस्तु को बढ़ावा देना और क्षतिग्रस्त वस्तु को उचित कंटेनरों में वितरित करना

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(7) सुहृद (मित्र) राज्य के कान हैं। राजा के साथी शान्ति और युद्धकाल दोनों में ही उसकी सहायता करते हैं। इस के सबंध मे आचार्य चाणक्य ने सहज (आदर्श) तथा बनाए गए मित्र में भेद करता है। सहज मित्र कृत्रिम मित्र से ज्यादा श्रेष्ठ होता है। जिस राजा के मित्र लोभी, कामी तथा कायर होते हैं, उस राजा का विनाश अवश्यम्भावी हो जाता है।

चाणक्य की मृत्यु 

आचार्य चाणक्य की मृत्यु के बारे में कोई ठोस माहिती किसी के पास भी नहीं है फिर भी अनेक इतिहासकारों के द्वारा अनेक अनुमान प्रस्तुत किए गए हैं। ऐसा माना जाता है, कि चाणक्य जी की मृत्यु लगभग 300 ईशा पूर्व में हुई थी। और इसी के विपरीत कुछ इतिहासकार का ऐसा मानना है, कि उन्होंने अन्य जल आन का त्याग करके अपने शरीर का त्याग कर दिया था। तो यहीं पर कुछ ज्ञानी द्वारा ऐसा भी कहा जाता है कि  आचार्य चाणक्य की मृत्यु किसी के षडयंत्र से उनकी हत्या कर दी थी।

Last Final Word 

दोस्तों हमारे आज के इस आर्टिकल में हमने आपको महान ज्ञानी आचार्य चाणक्य का जीवन परिचय दिया जैसे की आचार्य  चाणक्य का परिचय, चन्द्रगुप्त के साथ चाणक्य की मैत्री, आचार्य चाणक्य की शिक्षा, आचार्य चाणक्य द्वारा लिखित ग्रंथ से सबंधित जानकारी, आचार्य चाणक्य की राज्य कल्पना, चाणक्य के सप्तांग सिंद्धांत, चाणक्य की मृत्यु और आचार्य चाणक्य के जीवन से जुडी सभी जानकारी से आप वाकिफ हो चुके होंगे।

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