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भारत की औद्योगिक क्रांति

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नमस्कार दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हम आपसे बात करने वाले है औद्योगिक क्रांति के बारें में, अठारहवीं शताब्दी के बाद वाली और उन्नीसवीं शताब्दी के पहली छमाही में, कुछ पश्चिमी देशों की तकनीकी, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थितियों के रूप में देखा जाएँ तो एक बड़ा बदलाव आया था। इसे हम औद्योगिक क्रांति के नाम से जाना जाता है। यह प्रक्रिया शुरू हुई और फिर पूरी दुनिया में चारो और फैल गई। “औद्योगिक क्रांति” शब्द का उपयोग पहली बार इस निर्देश में अर्नोल्ड टाइनबी ने 1844 में अपनी प्रख्यात हुई पुस्तक “लेक्चर्स ऑन द इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन इन इंग्लैंड” में किया था।

औद्योगिक क्रांति की शुरुआत कपड़ा उद्योग के मशीनीकरण से हुई थी। इसके साथ ही लोहा बनाने की तकनीक आई और परिष्कृत कोयले का ज्यादा से ज्यादा उपयोग शुरू हो गया। कोयले को जलाने से उत्पन्न भाप शक्ति का उपयोग होने लगा था। बिजली से चलने वाली मशीनों (विशेषकर कपड़ा उद्योग में) के आगमन से उत्पादन में जबरदस्त प्रगति हुई। उन्नीसवीं सदी के पहले दो दशकों में पूरी तरह से धातु से बने औजारों का विकास हुआ। परिणामस्वरूप, अन्य उद्योगों में प्रयुक्त होने वाली मशीनों के निर्माण को प्रोत्साहन मिला। उन्नीसवीं सदी में यह पूरे पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में जौरो शोर से फैल गया।

औद्योगिक क्रांति का अर्थ क्या होता हैं? (What is the Meaning of Industrial Revolution?)

मानव सभ्यता की शरुआत से ही उन्नीसवीं सदी के दुनिया के पूर्व तक का सारा काम काज आम तौर पर मैनुअल टूल्स के द्वारा ही किया जाता था। उन्नीसवीं सदी की शरुआत से ही ज्यादा तर काम मशीनों द्वारा ही होने लगे थे। इन सभी सामग्रियों में प्रकृति की अनंत शक्ति-स्रोत छिपे हुए थे। लेकिन मनुष्य की जिज्ञासा और खोज करने वाली बुद्धि ने उन सभी रहस्यों को वह खोलने लगा और मुश्किल से मुश्किल अड़चनों को मनुष्य ने सुल्जाया फिर उसके कमियाबी हासिल करते-करते वह जिसको उसको कल्पना भी ना हो अवि शक्ति का मानव अधिराज बन गया। हाथ से चलने वाले औजारों से लेकर बिजली से चलने वाले संयंत्रों तक मनुष्य की आवाजाही का दूसरा नाम तकनीकी क्रांति है। मानव के इसी तकनिकी क्रांति के कारण उसे औद्योगिक क्रांति का निर्माण हुआ।

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औद्योगिक क्रांति की वैज्ञानिक और तकनीकी पृष्ठभूमि (Scientific and Technological Background of the Industrial Revolution)

बौद्धिक क्रांति विज्ञान के क्षेत्र में, किए गए शोधों के कारण हुई हैं। इन शोधों ने औद्योगिक क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार की। जब प्रौद्योगिकी में वैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग किया गया, तब तकनीकी या औद्योगिक क्रांति की शरुआत हुई। 1750 से 1850 ईसवी के बीच वैज्ञानिक अनुसंधान के हर क्षेत्र में गहन शोध किया गया। गणित, रसायन विज्ञान, भौतिकी, जीव विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कई शोध हुए। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने सिद्ध कर दिया है कि विभिन्न क्षेत्रों में किए गए शोधों का उपयोग एक दूसरे से संबंधित है। जो ज्ञान अब तक खंडित और एक-दूसरे से अलग-थलग था, अब अंतर्संबंध प्रकट होने लगा और इस अंतर्संबंध ने एक नया महत्व प्राप्त कर लिया।

वास्तव में, विज्ञान के अधिकांश महत्वपूर्ण आविष्कार इस अप्रत्याशित अंतर्संबंध को दर्शाते हैं। एक क्षेत्र में प्राप्त अंतर्दृष्टि का उपयोग दूसरे क्षेत्र में किया जा सकता है। इस वैज्ञानिक विचारधारा ने विचारों को प्रभावित किया, धार्मिक विश्वासों को चुनौती दी और नए दार्शनिक प्रश्न खड़े किए। इस वैज्ञानिक और तकनीकी पृष्ठभूमि ने विचारधारा के क्षेत्र में एक क्रांति पैदा कर दी, क्योंकि इसने पूरे मानव जीवन को प्रभावित किया। हालांकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने सबसे पहले इंग्लैंड में क्रांति की, लेकिन वैज्ञानिक विचारधारा का नेतृत्व फ्रांस ने किया।

इसके महान गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी, रसायनज्ञ और जीवविज्ञानी किसी भी अन्य देश की तुलना में वैज्ञानिक ज्ञान की सीमा को कहीं अधिक फैलाते हैं।

घरेलु उत्पादन प्रणाली: औद्योगिक क्रांति का मुख्य योगदान यह है की मशीनों के जरिये बड़े पैमाने पर कम समय द्वारा ज्यादा वास्तुओं का उत्पादन होने लगा था। इस सबसे पहेले इंग्लेंड शहर में लघु उद्योग (कुटीर उद्योग) का व्यवसाई के स्वरूप में सभी उपयोगी वास्तुओ का निर्माण होता था। शिल्पकार के कारीगर देखा जाये तो वह सामान्यतर अपने हाथो से शिल्प का काम करते थे और हल, पंप, छापखाना इत्यादि पर काम करने का उपयोग साधारण मशीन द्वारा होता था। परन्तु व्यापर का विकास होने पर व्यापारी शिल्पकारो को खुद ही कच्चा माल और आकस्मिक व्यय के लिए ज्यादा से ज्यादा रुपए देने लगे थे। इसी प्रकार नवी आर्थिक विकास होने पर कई प्रकार की श्रेणीयां ख़तम होने लगी और इसके जरिये शिल्पकार खुद ही अपना माल व्यापारियों को बेचने लगे।

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समान्य रूप से देखा जाये तो कारीगर खुदके परिवार की मदद से मशीन द्वारा कई तरह की वस्तुओ को बनाने लगे और व्यापारी उसकी बनाई गई वस्तुओ को बाजार लेजाकर बेच ने लगे थे। इसी तरह काम करने में उन दोनों का फ़ायदा होता था और दोनों को रोजगार मिलती थी इसी उत्पादन के निर्माण को “घरेलु उत्पादन प्रणाली” शब्द मिला और सभी इसको समज ने और पहचानने लगे। धीरे धीरे इसकी मांग बढ़ती गई और फिर देखाजाए तो घरेलु प्रणाली द्वारा जो उत्पादन हो रहा था उसे पूरा करना असंभव होता गया। इस नवी योजना के विकास के तहत “कारखाना प्रणाली” की स्थापना हुई थी। और फिर सब जगह कारखाने लग ने लगें और कारखानों में मशीन को दाखिल किया जाने लगा और उसमे कारीगर के रूप में काम करने लगे। कारखानों का निर्माण सभी बड़े बड़े शहरो में विकास करने लगें।

कृषि क्रांति (Agricultural Revolution)

16 वीं सदी में कृषि क्रांति होने के बाद इंग्लेंड में औद्योगिक क्रांति हुई थी। कृषि क्रांति होने के बाद ही औद्योगिक क्रांति के लिए कारीगर की जरूरियात होने लगी और कारीगरों की आपूर्ति की जाने लगी। 18 वीं सदी की शरुआत में ही इंग्लेंड एक कृषि प्रधान देश के लिए जाना जाता था और इंग्लेंड में उस समय भी पुराने तरिकेसे ही खेती की जाती थी। उस पुराने तरीकेसे फ़सल सिर्फ इतनी ही होती थी की किसी भी तरह देश की जरूरियात पूरी हो जाए।

परन्तु 18 वीं सदी में कई तरह के सुधारको और प्रयत्न द्वारा वैज्ञानिकी तरीको का अविष्कार हुआ। ईसी सदी में सबसे पहले जेथ्रो टूल्ल ने 1701 ई. में ड्रिल मशीन की खोज की जिसकी मदद से निश्चित जगह पर बिज बोने का काम जल्द ही और सफलता पूर्वक होने लगा। जेथ्रो टूल्ल को वैज्ञानिक कृषी का जनक कहा जाता हैं। एक और अमीर खेडूत जिसका नाम विस्काउंट टाउनशेंड था उसने अपनी जमीन को कृषि प्रयोगशाला के रूप में बदल दिया। टाउनशेंड एक नवाचार के संस्थापक थे टाउनशेंड ने बता लगाया की अलग अलग प्रकार की फसलों को बारी बारी से पैदा करने से जमीन की जननशक्ति बनी रहती हैं। टाउनशेंड ने एक नए पोधे जिसका नाम शलजम था उसकी वृद्धी को लोकप्रिय बनादिया, इसलिए टाउनशेंड को शलजम टाउनशेंड का उपनाम मिला। लिस्टरशायर के एक किसान ने रॉबर्ट बैकवेल ने 1770 ई. में एक वैज्ञानिक प्रजनन विधि के निर्माण से गायों और भेड़ की नस्लों में कई तरह के सुधार कियें। लिस्टरशायर ने अपने प्रयोगों द्वारा एक ऐसी नयी भेड़ का उत्पादन किया जिसका ओसत भार 21 पेड़ था।

कुषी से सम्बंधित आंदोलन तथा तरक्की की सम्भावना से खुश होकर सरकार ने भी एक नयें तरीको से कृषको में खेती करने के लिए एक कृषि-विभाग खोला। इंग्लेंड सरकार ने नए तरीके से काम में लाने के लिए कई बिखरे हुए छोटे छोटे खेतो को एक जूठ किया ओर सरकार ने खेतों की चकबंदी की फिर जिससे किसानो को खुदकी समस्त जमीन एक ही जगह पर प्राप्त हो गई।

कृषि क्रांति के परिणाम: मनुष्य द्वारा निर्मित हुए नए नए अविष्कार और सरकार द्वारा उस नए अविष्कार का प्रोत्सहित करने की निति के फलस्वरूप देखा जाए तो इंग्लेंड की कृषि की उपज में बहुत वृद्धी हुई। परन्तु कई ऐसे छोटे छोटे खेडूत के लिए यह क्रांति को अवज्ञाकारी साबित हुई। ऐसे कई बड़े बड़े जमिन दार अपनी खेत की जमीन में खेत और भी बढ़ा ते गये और छोटी जात के जमीन दार अपनी भूमिहिन की वजह से मजदुर की श्रेर्णी में आ गये। इस सभी कार्य से इंग्लेंड के ग्राम्य जीवन में एक बड़ा बदलाव आया और एक महान परिवर्तन हो गया। छोटे छोटे खेडूत बेरोजगार होते गये और वह आजिविका की खोज में गावों को छोड़ कर शहर में जाके बसने लगे और जहां पर यांत्रिक क्रांति के स्वरूप में नये नये कारखाने का निर्माण होने लगा था, जिसमे वह अपने परिश्रम को बेच कर अपनी आजिविका कमा सकते थे। ईसी तरह कृषि क्रांति ने औद्योगिक क्रांति की और मार्ग प्रशस्त किया।

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इस तरह खेती में तकनीक के प्रयोग से बेरोजगार हुए किसानो के रुप में उद्योग के लिए सस्ते मजदुर लोग मिल गए तथा कृषि उत्पादन में तरक्की होने से नगर की जनसख्या के लिए खाध्य तथा उधोगो के लिए सभी तरह का कच्चा माल मिलने लगा और ऐसे बेरोज गार हुए खेदुतो को रोजगार प्राप्त हो गया।

इंग्लेंड में औद्योगिक क्रांति के कारण (Causes of the Industrial Revolution in England)

इंग्लेंड में औद्योगिक क्रांति का जन्म दुनिया में सबसे पहले हुआ। इसका कारण यह था की औद्योगिक क्रांति के लिए जिन उपकरणों की जरूरियात थी, वह सभी उपकरणों इंग्लेंड में बनते थे तो वहा से इसकी उपकरणों जरूरियात पूरी होती थी। कहा जाये तो इंग्लेंड के बाद ही यह क्रांति यूरोप, अमेरिका, और जापान इस सभी देशो में फैल गयी थी। और आपको पता नही होगा की औद्योगिक क्रांति की शरुआत इंग्लेंड से इसलिए हुई, क्योकि इंग्लेंड देश के पास काफी मात्रा में आबादी थी जिसके कारण पुरता कच्चा माल और पूंजी की अधिकता थी। वास्तव में देखा जाये तो इंग्लेंड के पास 16 वीं सदी से ही सामुद्रिक लूटमार, दास-व्यापार, अमेरिका तथा भारत से किया गया व्यापार और अन्य कई प्रकार से इंग्लेंड में काफी मात्रा में धन एकत्रित हो रहा था जो इंग्लेंड ने औद्योगिक  उत्पादन में लगाया था।

पहले से की इंग्लेंड में मध्ययुग से चली आनेवाली गुलामी प्रथा, श्रेर्णी-व्यवस्था देखा जाये तो इंग्लेंड ने यह पहले से ही समाप्त कर दी थी, जिसके कारण मजदुर कारखानों में ज्यादा मात्रा में भर्ती होने लगे और अधिक स्वतंत्र थे, वह माल तैयार करनेवालों मजदूरो पर किसी भी प्रकार की प्रतिबंधिया नहीं थी। ऐसे ही इंग्लेंड सरकार ने आर्थिक विकास के लिए बड़े पैमाने पर अपना उत्पादन करने वालों की आर्थिक रूप से तरह तरह की सहायता की थी। ईसी प्रकार से इंग्लेंड में 18 वीं सदी के मध्य में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण हुआ की जिनके कारण औद्योगिक क्रांति का निर्माण सबसे पहेले इंग्लेंड में हुआ।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता : व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सबसे पहला कारण इंग्लेंड के लोगो का स्वतंत्र समाज था।  इंग्लेंड के सभी यूरोपी देशो को यह अपेक्षा थी की उसके देश के हर एक नागरिक को विचार, अभिव्यक्ति और कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता मिले। वहा की सरकार किसी भी व्यक्तिके आर्थिक जीवन में दखल अंदाजी (Interference) नहीं करती थी। शिल्पकारो को काम करने और किसी भी प्रकार का प्रयोग करने की पूरी तरह से स्वतंत्रता थी। ऐसी स्थिति के कारण ही इंग्लेंड में मशीनों का अविष्कार हुआ जिसके कारण उत्पादन विधियों में सुधार आने लगे और अच्छी तरह से विकास का संभव हो सका। इंग्लेंड में हुए 1688 ई. की क्रांति के पश्चत इंग्लेंड में निरंकुश राजतंत्र समाप्त हो चुका था और प्रथम प्रधानमंत्री वालपोल की आर्थिक मामले में हस्तक्षेप की निति से पुरे इंग्लेंड के लोग को स्वतंत्रतापूर्वक अपने खुद के व्यवसायों तथा कार्यों को स्वयं करने का अवसर मिल्ला।

आर्थिक विचारों में परिवर्तन: इंग्लेंड में वैचारिक क्रांति के बाद औद्योगिक क्रांति हुई थी। अभी तक इंग्लेंड में वानिज्यवाद का गहरा प्रभाव था और यह वो समजाते थे की विदेशी व्यापार का धन प्राप्त करने का एक मात्र स्त्रोत था। ज्यादा से ज्यादा निर्यात (export) करना और कम से कम आयात करना इस वानिज्यवादी का आधार भुत सिधांत था। लेकिन इंग्लेंड में एडम स्थिम और अन्य अर्थशास्त्रियो ने यह सिधांत की स्थापना की के व्यापर नि: शुल्क होना चाहिए और देश के उत्पादक क्षमता में काफी विकास होना चाहिए ऐसे ही इंग्लेंड के लोगो में वैचारिक क्रांति के माध्यम से द्रष्टिकोण में परिवर्तन हो गया।

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कृषि क्रांति: इंग्लेंड में औद्योगिक क्रांति से पहले ही पूर्व कृषि क्रांति हो चुकी थी। देखा जाये तो इसके पहले फलस्वरूप कई सारे कृषि मजदुर बेकार हो गये थे, जो सस्ती मजदूरी पर कारखानों पर काम करने के लिए तैयार थे। कृषि क्षेत्र में जेसे ही उत्पादन में वृद्धी से समृद्धी बड़ा वैसे ही औद्योगिक क्रांति धीरे धीरे संभव होती गयी। इंग्लेंड में ऊनि वस्त्र उद्योग में ज्यादा से ज्यादा वृद्धी होने का कारण सिर्फ भेड़ो के पालन के लिए कि गयी घेराबंधी थी।

पूँजी की उपलब्धता: 18 वीं सदी में इंग्लेंड का व्यापर में अचानक से बढ़ जाना जाने देश में उचित समय में ज्यादा मात्र में स्टोक एकत्र हो चुका था। ईसी अधिक भंडार को उत्पादन होने वाले क्षेत्र में काम में लगाया जा सकता था और कारखाना ओ के निर्माण में भी पूँजी को लगाया जा सकता था। इंग्लेंड को यह स्टोक अपने भव्य व्यापर से प्राप्त हुए थे। सच बात तो यह ही की भारत के स्टोक के कारण ही इंग्लेंड में औद्योगिक क्रांति हुई थी।

औपनिवेशिक विस्तार: इंग्लेंड में औद्योगिक क्रांति का मुख्य एक मात्र कारण था उसका औपनिवेशक विस्तार। इंग्लेंड की इसी बढ़ ती आबादी से उसे कच्चा मॉल मिलता था और उनके बाजारोमें अपना नया बनाया गया माल बेचता था। अमेरिका देश के पूर्वी तट में उसका विशाल उपनिवेश थे जहां से वह कपास, तंबाकू, चावल, शक्कर प्राप्त होती थी। 1757 ई. में प्लासी का युद्ध हुआ उसके बाद इंग्लेंड को भारत देश से करोडो रुपए की संपति इसके साथ साथ सस्ते दाम पर कच्चे माल का एक विशाल जथा भी मिला और तैयार माल के लिए एक विशाल बाजार भी मिल गया था।

जनसंख्या में वृद्धी: 1700 ई. से 1800 ई. में यूरोप में मध्य जनसंख्या में करीबन 45 प्रतिसेकड़ा में वृद्धी हुई थी। 1751 ई. से 1821 ई. के मध्य में इंग्लेंड की जनसँख्या करीबन उससे दुगनी हो गई थी। ईसी बढ़ ती जनसंख्या के कारण इंग्लेंड में वस्तु ओ की मांग बढ़ने लगी, जिसके लिए उसे निर्मित पदार्थो का उत्पादन बढ़ा ने के लिए प्रयोग करने की प्रेरणा मिली।

व्यापार में वृद्धी: ईसी काल में देखा जाये तो इंग्लेंड देश में व्यापार में अविश्वसनीय वृद्धी हो गई थी। इसका बस यही एक कारण था की इंग्लेंड देश के पास भारत, अमेरिका और यूरोप जैसे देश में एक विस्तृत बाजार थे और उसके उस देश में बने हुए माल की मांग हमेशा के लिए बनी रहती थी। इससे इंग्लेंड देश को बहुत फायदा हुआ और इंग्लेंड में निर्मित उत्पादको को नए-नए आविष्कारो द्वारा उसके उत्पादन बढ़ा ने केलिए प्रोत्साहन मिलता था, फिर इंग्लेंड के पास निर्मित माल का उत्पादन ओर भी ज्यादा तेजी से बढ़ ने लगा। फ़्रांस देश की क्रांति के बाद देखा जाये तो इंग्लेंड एक मात्र ऐसा देश था, जो यूरोप की सैनिक तथा नागरिक मांगो को पूरा करता था।

दास प्रथा की समाप्ति: इंग्लेंड एक मात्र पहला ऐसा देश था जिसने यूरोप की दास प्रथा और श्रेणी प्रथा का अंत किया था। यूरोप में दास प्रथा और श्रेणी प्रथा थी उसका एक ही मतलब था की आर्थिक विकास में बाधा डालना। दास प्रथा और श्रेणी प्रथा के स्थान पर ठेकों के आधार पर घरेलूं उत्पादन प्रणाली तथा खुद का स्वतंत्र व्यापार प्रणाली स्थापित की गई थी। इस नविन प्रणालीयों में व्यापारी तथा कारीगर दोनों को ज्यादा उत्पादन करने का प्रोत्साहन मिला। अब लोग अपने खुद के लिए एक जगह से दूसरी जगह पर जाकर अपनी पसंदी दा का कार्य की शुरुआत कर सकते हैं।

संयुक्त व्यापारिक कंपनियों की स्थापना: दास प्रथा और श्रेणी प्रथा दोनों के समाप्त हो जाने से एक अच्छी बात यही थी की कारीगर और व्यापारी दोनों ही स्वतंत्र हो गये थे। व्यापारियों के पास खुद का स्टोक था और उसको बाजारों की क्या मांग होती है उसका ज्ञान भी था। अंत में इंग्लेंड में और ज्वाइंट स्टोक कंपनियों की व्यवस्था की शुरुआत हुई, क्यूंकि व्यक्तिगत व्यापर में आर्थिक विकास की संभावनाएं (possibilities) बहुत ही कम मात्र में थी, इसलिए संयुक्त व्यापर करने वाली कंपनियों द्वारा व्यापार करने में प्रसारण हुआ ओर ईसी कारण से औद्योगिक क्रांति हुई। बैंक ऑफ इंग्लेंड तथा ब्रिटिश सरकार से ऐसी कंपनियों को आर्थिक रूप से सहायता भी मिलती थी।

1600 ई. में ईसी प्रकार से ईस्ट इंडिया कंपनी की रचना की गई थी, और इस ईस्ट इंडिया कंपनी का पूर्व के देशो पर व्यापार करने का एक मात्र अधिकार था। ईसी तरह उत्तरी अमेरिका से व्यापर करने का एक मात्र अधिकार साउथ-सी कंपनी का था। ईसी संगठित व्यापार के कारण मांग में अति ज्यादा वृद्धी हुई जिसके कारण औद्योगिक क्रांति हुई।

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इंग्लेंड की सामुद्रिक शक्ति: इंग्लेंड देश के पास विशाल शक्तिशाली जहाज थे। इंग्लेंड के ईसी शक्तिशाली जहाज ने विदेशी व्यापार को एक सुरक्षा प्रदान की जिसके कारण युद्ध काल में भी अंग्रेजो का व्यापार चलता रहा था। ईसी शक्तिशाली जहाजो की मदद से इंग्लेंड अपना सारा तैयार किया गया हुआ माल वो विदेशो को भेजता था तथा विदेशो इंग्लेंड खुद के लिए कच्चा माल भी मंगवाता था। देखा जाये तो यूरोप खंड के किसी भी देश के पास ऐसा विशाल शक्तिशाली जहाज का बेडा नहीं था। ईसी कारण वश इंग्लेंड ने समुद्री व्यापारी पर अपना खुदका एक मात्र अधिकार स्थापित कर लिया था।

इंग्लेंड की बौतिक स्थिति: इंग्लेंड में सबसे पहले हुए औद्योगिक क्रांति का एक मात्र महत्वपूर्ण कारण यह था की इंग्लेंड देश के उत्तर पूर्व विस्तार में उसके पास लोहे की खाने थी और इसके साथ साथ कोयले की खान भी इंग्लेंड के पास मौजूद थी। इंग्लेंड के पास यह दोनों चीजे होने से उसके देशो को औधोगिक विकास में बड़ी ही सहायता मिली थी। इंग्लेंड देश के पास कोयले की खान होने से लोहा गला ने में उसको बड़ी आसानी होती थी और “शेरफिल्ड में पहला इस्पात (steel) का कारखाना” इंग्लेंड के पास स्थापित हुआ। ईसी तरह इंग्लेंड देश के पास लोहे के उत्पादन से बड़े जथो में मशीनों और हथियारों का निर्माण हुआ।

इसके उपरांत, इंग्लेंड देश चारों और से समुद्र से घिरा होने के कारण इंग्लेंड देश सिर्फ बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रहा बल्कि जैसे तैसे करके समुद्रितटों पर अनेक बंदरगाहों का विकास हुआ था। इंग्लेंड के पास खुल्ला समुद्र मार्ग होने के कारण वह आसानी से अपना व्यापार दुसरे देशो में जहाजो से कर सकते थे।

औद्योगिक क्रांति के क्षेत्र (Field of Industrial Revolution)

औद्योगिक क्रांति को मुख्य रूप से देखा जाये तो कपास, खनन (mining) और परिवहन के क्षेत्र में ही विकास तक मर्यादित था। पहले ही यंत्रो द्वारा प्रयोग किये जाने वाले कार्यो में ही कृषि क्रांति हो चुकी थी। इस सब से खुश होकर औधोगिक उत्पादन को बढ़ा ने के लिए अनेक व्यक्तियोने नए नए यंत्रो का निर्माण किया था, जिससे इंग्लेंड को “विश्व की उधोगशाला” कहा जाने लगा। अन्य उद्योगों में भी धीरे धीरे मशीनों और यंत्रो का उपयोग होने लगा।

जैसे जैसे औद्योगिक क्रांति मे तरक्की होने लगी, ऐसे ही मशीनरी और यंत्रो को अधिक जटिल और मशीन को महंगी कर दी गई। जैसे जैसे मशीनों के दाम बढ़ ते गए ऐसे ही किसी भी एक व्यक्ति को कारखाने का निर्माण करना संभव नहीं था। इसलिए सब मिलकर एक सहकारी प्रयास के लिए एक व्यापरसंघ और एक कमिटी कंपनीयों का निर्माण किया बादमे जिसमे हजारो लोगों ने इसमें भाग लिया और इसका अच्छा लाभ उठाने की आशा में अपना पैसा इन्वेस्टमेंट किया। कई संयुक्त कंपनीओ ने किसी भी व्यक्तिगत व्यवसाय को सब तरह की व्यवस्था देने के बाद निर्देशकों को जगह भी दी।

यांत्रिक आविष्कार (Mechanical Inventions)

वस्त्र उद्योग: वस्त्र उद्योग से औद्योगिक क्रांति का निर्माण हुआ था। 1757 ई. में प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजो ने बंगाल में जो लूटमार शरु की, उसका प्रभाव उसको तुरंत लंडन में दिखाई देना लगा था क्योकि औद्योगिक क्रांति का आरंभ भी 1770 ई. के साथ ही शरू हुआ था। इंग्लेंड को भारतीय माल के साथ साथ विशाल बाजार भी मिल गए थे। इसके लिए सबसे पहले इंग्लेंड को वस्त्र उद्योग में धारणा और विवरण हुई।

कपास: भारत, चीन, मध्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और मध्य-पूर्व के कुछ हिस्सों में कपास के निर्माण का एक लंबा इतिहास है, जो 1000 ईस्वी के कुछ समय बाद एक मुख्य उद्योग बन गया। उष्णकटिबंधीय (tropical) और उपोष्णकटिबंधीय (sub-tropical) क्षेत्रों में जहां इसे उगाया जाता था, यह ज्यादातर छोटे किसानों द्वारा अपनी खाद्य फसलों के साथ उगाया जाता था और बड़े पैमाने पर घरेलू खपत के लिए घरों में काटा और बुना जाता था। 15 वीं शताब्दी में, चीन ने परिवारों को सूती कपड़े में अपने करों के एक हिस्से का भुगतान करने की आवश्यकता शुरू की। 17 वीं शताब्दी तक लगभग सभी चीनी सूती कपड़े पहनते थे। सूती कपड़े का इस्तेमाल लगभग हर जगह विनिमय के माध्यम के रूप में किया जा सकता था। भारत में दूर-दराज के बाजारों के लिए बड़ी मात्रा में सूती वस्त्रों का निर्माण किया जाता था, जो अक्सर पेशेवर बुनकरों (weavers) द्वारा उत्पादित किए जाते थे।

कुछ व्यापारियों की बुनाई की छोटी-छोटी कार्यशालाएँ भी थीं। भारत में सूती कपड़ों की एक विस्तृत विविधता का उत्पादन होता था, जिनमें से कुछ असाधारण रूप से उत्तम गुणवत्ता के प्राप्त होते थे। अमेरिका में औपनिवेशिक (उपनिवेशी) बागानों में उगाए जाने से पहले कपास यूरोप के लिए एक कठिन कच्चा माल था। प्रारंभिक स्पेनिश खोजकर्ताओं ने पाया कि मूल अमेरिकी उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले कपास की अज्ञात प्रजातियां उगा रहे थे। समुद्री द्वीप कपास (गॉसिपियम बारबाडेंस) और ऊपरी हरी-बीज वाली कपास गॉसिपियम हिर्सुटम। सागर द्वीप कपास उष्णकटिबंधीय और जॉर्जिया और दक्षिण कैरोलिना के बाधा द्वीपों में बढ़ी, लेकिन खराब अंतर्देशीय थी।

1650 ई. के दशक में बारबाडोस से समुद्री द्वीप कपास का निर्यात किया जाने लगा। ऊपरी हरी-बीज वाली कपास दक्षिण अमेरिका के अंतर्देशीय क्षेत्रों में अच्छी तरह से विकसित हुई, लेकिन बीज निष्कर्षण की कठिनाई के कारण किफायती नहीं थी, कपास जिन द्वारा हल की गई समस्या।

1806 ई. में मैक्सिको से नैचेज़, मिसिसिपि में लाए गए कपास के बीज का एक प्रकार आज विश्व कपास उत्पादन के 90% से अधिक के लिए मूल आनुवंशिक सामग्री बन गया है, इससे बीजकोषों का उत्पादन हुआ जो लेने में तीन से चार गुना तेज हुआ।

व्यापार और कपडा: उत्तर-उपनिवेशवाद 16 वीं शताब्दी के आसपास शुरू हुआ, जो खोज युग की अवधि थी। पुर्तगालियों द्वारा दक्षिणी अफ्रीका के आसपास भारत के लिए एक व्यापार मार्ग की खोज के बाद, डचों ने यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ ओस्टिनडिश कॉम्पैनी या डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की, जो दुनिया का पहला अंतर्राष्ट्रीय निगम और स्टॉक जारी करने वाला पहला बहुराष्ट्रीय उद्यम (जोखिमी काम) था। बाद में अंग्रेजों ने विभिन्न राष्ट्रीयताओं की छोटी कंपनियों के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की, जिसने हिंद महासागर क्षेत्र और उत्तरी अटलांटिक यूरोप के बीच व्यापार में अनुरक्त होने के लिए व्यापारिक पदों और नियोजित एजेंटों की स्थापना की।

उन : मशीनीकृत कटाई के शुरुआती यूरोपीय प्रयास ऊन के साथ थे। हालांकि, ऊन की कटाई कपास की तुलना में मशीनीकरण के लिए अधिक मुश्किल साबित हुई। औद्योगिक क्रांति के दौरान, ऊन कटाई में उत्पादकता में सुधारा करना महत्वपूर्ण था लेकिन कपास की तुलना में देखा जाये तो बहुत कम था।

इस व्यापार का एक बड़ा हिस्सा सूती वस्त्रों में था, जो भारत में खरीदे जाते थे और इंडोनेशियाई द्वीपसमूह सहित दक्षिणपूर्व एशिया में बेचे जाते थे, जहां मसाले दक्षिणपूर्व एशिया और यूरोप में बिक्री के लिए खरीदे जाते थे। 1760 ई. के दशक के मध्य तक, ईस्ट इंडिया कंपनी के निर्यात में तीन-चौथाई से अधिक का योगदान वस्त्रों का था। यूरोप के उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में भारतीय वस्त्रों की ज्यादा मांग थी, जहां पहले केवल ऊन और लिनन ही उपलब्ध थे। हालाँकि, पश्चिमी यूरोप में खपत होने वाले सूती सामानों की मात्रा 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक मामूली थी।

भाप शक्ति का आविष्कार: अगर भाप शक्ति का अविष्कार नहीं होता तो औद्योगिक क्रांति के सभी बदलाव (परिवर्तन) अधूरे रह जाते। ईसी लिए भाप शक्ति का अविष्कार करना जरुरी था क्योकि पहले मशीनों और यंत्रो को चलाने के लिए पानी,पवन और बिजली की जरूरत पड़ती थी, क्योकि नए मशीनों को चलाने केलिए उसको शक्ति के नये स्त्रोत की आवश्यकता थी और इस विस्तार में भाप से चलने वाले इंजिन का अविष्कार करना एक क्रांतिकारी कदम था। हालांकि न्युकोमेन (1663-1729 ई.) ने 1712 ई. में खानों मेसे पानी निकलने केलिए एक बाष्प से चलने वाली मशीन का अविष्कार किया था, लेकिन यह इंजिन बहुत ही वजनदार, महंगा और खर्चे वाला था इसलिए यह इंजिन को वस्त्र उद्योग या किसी भी उद्योग में उपयोग करने लायक नहीं था।

1769 ई. में जेम्स वाट ने न्युकोमो द्वारा बनाये गए इंजिन की मुश्केलियो को दूर किया और एक भाप इंजिन का आविष्कार किया। जेम्स वाट ने बौल्टन जोकि एक उद्योग पति था उसके साथ मिलकर एक भाप मशीन बनाने का कारखाना भी खोला था। बादमे विककिंसन ने 1776 ई. में लोहे के कारखानों की में जो लोहे को पिग्लाने की मशीन थी उसको तेज करने केलिए इंजिन का प्रयोग किया। इसके बाद इस इंजिन का उपयोग आते की चक्की चलाने के लिए किया गया और कारखाने में उपयोग में आने वाली मशीन नो को चलाने केलिए किया गया।

जेम्स वोट के यही मशीन 1814 ई. में कई सारे सुधार आये और इस सुधर की वजह से छापखाने में चल रहीं मशीनों के लिए काम आने लगा, जिसमे छपाई का काम बहुत ही धीरे से हो रहा था परंतु इस नए मशीन की वजह से यह छपाई का काम बड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगा था।

लोहा तथा कोयला उद्योग: यहीं मशीनों को बनाने के लिए लोहें की जरुरत होती है इसिलए लोहे की मांग और भी ज्यादा बढ़ गई। लेकिन लोहे को पिग्लाने के लिए और साफ़ करने के लिए लोहे तकनीक बहुत ही पुरानी हो चुकी थी साथ साथ महंगी और कठिन भी थी। अंत में इंजिन की और खोज की गयी। 1750 में करीबन पत्थर का कोयला दिखने में आया और इस पत्थर को हासिल करने के लिए खनन कार्य का विकास किया गया। अब्राहिम डर्बी और जॉन रोबक ने पत्थर के कोयले से बने कोक (बुझा हुआ पत्थर का कोयला) से लोह को गाल ने की पद्धति का अविष्कार किया। जान स्टीमन ने 1760 ई. में लोह को पिग्लाने की मुश्केली को और भी आसन करदिया क्योकि जान स्टीमन ने कोक की अग्नि को तेज करने और इस तेजी को एक स्थिर बनाये रखने के लिए काफी प्रयास किये और अंत में एक पंप का निर्माण किया जो जल शक्ति से चलता था।

हेनरी कर्ट (1740-1800 ई.) ने 1784 ई. में लोहे को पिघला कर उस लोहे को तरह तरह की आकृतियों में बनाने का तरीका खोजा। 1815 ई. में हम्फ्री डेवी ने “सेफ्टी लैम्प” का निर्माण किया, जिसका उपयोग खानों मेसे कोयले को निकलने में सुविधा प्राप्त हुई।

लौह्प्रक्रिया नवाचार: औद्योगिक क्रांति के दौरान लोहे के उद्योगों में एक बड़ा बदलाव कोयले के साथ लकड़ी और अन्य जैव-ईंधन के प्रतिस्थापन था। गर्मी की एक निश्चित मात्रा के लिए, खनन कोयले को लकड़ी काटने और इसे चारकोल में बदलने की तुलना में बहुत कम श्रम की आवश्यकता होती है, और लकड़ी की तुलना में कोयला बहुत अधिक प्रचुर मात्रा में था, जिसकी आपूर्ति लोहे के उत्पादन से की जाती थी। 18वीं शताब्दी के अंत में भारी वृद्धि से पहले यह दुर्लभ होता जा रहा था।

1750 तक कोक ने आम तौर पर तांबे और सीसा के गलाने में चारकोल की जगह ले ली थी, और कांच के उत्पादन में व्यापक उपयोग में था। लोहे के गलाने और शोधन में, कोयले और कोक ने कोयले की सल्फर सामग्री के कारण चारकोल से बने घटिया लोहे का उत्पादन किया। कम सल्फर वाले कोयले ज्ञात थे, लेकिन उनमें अभी भी हानिकारक मात्राएँ थीं। कोयले को कोक में बदलने से सल्फर की मात्रा थोड़ी ही कम हो जाती है। कोयले की एक अल्पसंख्यक कोकिंग कर रहे हैं।

1828 में जेम्स ब्यूमोंट नीलसन द्वारा पेटेंट कराया गया हॉट ब्लास्ट, पिग आयरन बनाने में ऊर्जा बचाने के लिए 19वीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण विकास था। पहले से गरम दहन हवा का उपयोग करके, पिग आयरन की एक इकाई बनाने के लिए आवश्यक ईंधन की मात्रा पहले कोक का उपयोग करके एक तिहाई या कोयले का उपयोग करके दो-तिहाई कम कर दी गई थी। हालांकि, जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी (Technology) में सुधार आते गए ऐसे ही दक्षता (कुशलता) में वृद्धि जारी रही। गर्म विस्फोट ने भट्टियों के परिचालन तापमान को भी बढ़ा दिया, जिससे उनकी दक्षता (कुशलता) में वृद्धि हुई। कम कोयले या कोक का उपयोग करने का अर्थ है, पिग आयरन में कम अशुद्धियाँ मिलाना। इसका मतलब था कि कम गुणवत्ता वाले कोयले या एन्थ्रेसाइट का उपयोग उन क्षेत्रों में किया जा सकता है जहां कोकिंग कोल उपलब्ध नहीं था या बहुत महंगा था। हालांकि, 19 वीं सदी के अंत में हीं, परिवहन लागत (क़ीमत) में उल्लेखनीय गिरावट आई।

औद्योगिक क्रांति से कुछ समय पहले, स्टील के उत्पादन में सुधार किया गया था, जो एक महंगी वस्तु थी और इसका उपयोग केवल वहीं किया जाता था जहां लोहा नहीं होता वहां कि अत्याधुनिक उपकरण और स्प्रिंग्स होता था। बेंजामिन हंट्समैन ने 1740 के दशक में अपनी क्रूसिबल स्टील तकनीक विकसित की। इसके लिए कच्चा माल ब्लिस्टर स्टील था, जिसे सीमेंटेशन प्रक्रिया द्वारा बनाया गया था।

सस्ते लोहे और स्टील की आपूर्ति ने कई उद्योगों की सहायता की, जैसे कि कील, टिका, तार और अन्य हार्डवेयर आइटम बनाने वाले। मशीन टूल्स के विकास ने बेहतर काम करने वाले लोहे की अनुमति दी, जिससे तेजी से बढ़ते मशीनरी और इंजन उद्योगों में इसका तेजी से उपयोग हुआ था।

यांत्रिक इंजीनियरिंग: मशीनों का वजूद उत्पादन को बनाये रखने के लिए कई तरह के अच्छे औजारो और यंत्रो की जरूरियात थी। इसको ध्यान में रखते हुए यांत्रिक इंजीनियरिंग में कई तरह के सुधार किये गये और यह एक पृथक उद्योग (isolated industry) के रूप में शामिल हो गया। ऐसे ही हेनरी माउडस्ले ने 1800 ई. में एक लेथ मशीन ‘स्लाइड-रेस्ट‘ का निर्माण किया तो ईसी तरह जॉन विल्किन्सन ने लोहे में होल करने का यंत्र का आविष्कार किया। ऐसे ही नये नये मशीनों और यंत्रो में सुधार होते गये वैसे ही 1816 ई. से 1830 ई. के वर्षो में खराद मशीन और प्लेटिंग मशीन में भी कई तरह के सुधार होते गये। जोशिया बेजवुड ने यंत्रो के उपायों से घर-गृहस्थी के लिए अच्छे चीनी के बर्तनों का आविष्कार किया।

गैस और लाइटिंग: बाद की औद्योगिक क्रांति का एक अन्य प्रमुख उद्योग गैस प्रकाश व्यवस्था थी। हालांकि अन्य लोगों ने इसी तरह का नवाचार कहीं और किया, इसका बड़े पैमाने पर परिचय बर्मिंघम स्टीम (Birmingham Steam) इंजन के अग्रणी, बोल्टन एंड वाट के एक कर्मचारी विलियम मर्डोक का काम था। इस प्रक्रिया में भट्टियों में कोयले का बड़े पैमाने पर गैसीकरण, गैस का शुद्धिकरण (सल्फर, अमोनिया और भारी हाइड्रोकार्बन को हटाना), और इसका भंडारण और वितरण शामिल था। 1812 और 1820 के बीच लंदन में पहली गैस लाइटिंग यूटिलिटीज स्थापित की गईं। वे जल्द ही यूके में कोयले के प्रमुख उपभोक्ताओं में से एक बन गए। गैस की रोशनी ने सामाजिक और औद्योगिक संगठन को प्रभावित किया क्योंकि इसने कारखानों और दुकानों को मोमबत्तियों या तेल की तुलना में अधिक समय तक खुला रहने दिया। इसकी शुरूआत ने शहरों और कस्बों (towns) में नाइटलाइफ़ को फलने-फूलने की अनुमति दी क्योंकि अंदरूनी और सड़कों को पहले की तुलना में बड़े पैमाने पर रोशन किया जा सकता था।

यातायात, परिवहन और संचार: कच्चे माल को लाने के लिए और तैयार माल को दुसरे स्थान पर पहोचाने के लिए माल को लेजा ने और लाने के साधन का महत्तम विकास हुआ। आद्योगिक क्रांति हुई उएसे पहले इंग्लेंड के रास्तो की हालत बहुत ही ख़राब थी। 18 वीं सदी के शरुआत में ही स्कोटलैंड के एक इंजीनियर मेकेड़म ने पत्थर के छोटे छोटे टुकड़े कर करके उसमे मिट्टी मिलाकर उसका प्रयोग किया बादमे मजबूत ओर उत्तम सड़क बनाने में वह सफल हुए और इस तरह नयी और मजबूत सड़क बनाने का तरीका खोजा। इसके बाद टेलफ़ोर्ड ने एक नया आविष्कार किया उसमे तारकोल का प्रयोग करके कई सुधार करके थोड़े ही समय में इंग्लेंड में उसने हजारों मिल लंबी सड़के तैयार करवाई, इन सड़को के तैयार हो जाने के बाद इंग्लेड देश की आर्थिक संपत्ति को जाने बुलंदीया छु गई हो ऐसी तरक्की हुई।

सड़कों द्वारा एक स्थान से दुसरे स्थान माल की हेरा फेरी करने में बहुत ज्यादा कठिनाईयां होती थी। इस समस्या का हल लाने के लिए सबसे पहले ड्यूक ऑफ ब्रिज्वाटर ने केनाल्स को जमीन पर दौड़ाने का काम शुरू किया, और जैम्स ब्रिड्ले नामके इंजिनियर को जमिन पर दौड़ने वाली कैनाले बनाने के लिए प्रोत्साहन किया गया। इंग्लेंड में 1830 ई. तक परिवहन (transportation) के लिए 40 हजार मिल लम्बी नहरों का निर्माण करलिया और जिनमे मर्सी और कोल्डर की नहेरें बहुत ही प्रसिद्ध हुई थी। ऐसे की विकास होता गया और एक जगह से दूसरी जगह माल लेजाने में खर्च और समय की बचत होने लगी।

संचार साधन: परिवहन के साथ साथ ही देशो में संपर्क करने के साधनों में भी काफी विकास हुआ। इंग्लेंड में 1840 ई. के तहत पेनी पोस्टेज के द्वारा डाक व्यवस्था की शरुआत हुई, जिसके कारण देश में कही भी पत्र भेजे जा सकते थे। 1844 ई. में दों अमेरिकाके सैमुअल मोर्स और अल्फ्रेड वेळ के सहकार से चालर्स व्हीट स्टोन ने उन्नीसवीं शताब्दी के मद्य में हीं इलेक्ट्रोक टेलीग्राफ की खोज की। यूरोप और अमेरिका में 1876 ई. में अटलांटीक महासागर में टेलीग्राफ की केबलें बिछाई गई। ग्राहम बेल ने 1876 ई. मी टेलीफोन का निर्माण किया।

अन्य अविष्कार: औधोगिक क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन के कारण वैज्ञानिक संशोधन में प्रोत्साहन मिला और विज्ञान के हर एक क्षेत्र में नये नये प्रयोग और खोज होने लगी। 1831 ई. में माइकल फैराडे ने इलेक्ट्रो-मैग्रेटिक इंडक्शन का अविष्कार किया था। इंजिनियर जॉन एरिक्सन ने 1836 ई. के तहत मोनिटर, स्क्रू-प्रोपेलर का अविष्कार किया था। चालर्स गुडईयर ने 1844 ई. में कई प्रयत्नों के बाद रबर वल्केनाइजेशन का निर्माण किया। देखा जाये तो अन्य कई वैज्ञानिको ने और इंजीनियरों ने मिलके ऐसी कई छोटी मोटी खोज की और औद्योगिक क्रांति के नए नए क्षेत्र का विकास किया। खोजों में सफलतापूर्वक तांबा, सीसा, पारा, अल्युमिननियम, मैंगनीज, प्रेट्रोलियम ऐसे कई पदार्थ का खनिकर्म किया और उपयोग होने लगा। बिजली के निर्माण से शक्ति का एक नया ही स्त्रोत मनुष्य जीवन को मिल गया।

औद्योगिक क्रांति की प्रगति और प्रसारण (The nature and transmission of the Industrial Revolution)

इस प्रकार इंग्लेंड में औद्योगिक क्रांति की शरुआत हुई। औद्योगिक क्रांति के सफलता पूर्वक कार्य से कपडे, कायले और लोहे के व्यवसाई में कई गुना प्रगति और महान परिवर्तन होने लगा। मनुष्य खुदके हाथों से काम कर रहे थे परंतु इस क्रांति के कारण मनुष्य के पास टेक्निकल मशीन नो ने हाथो से होने वाले काम की जगह लेली। भाप एक महत्वपूर्व चालक शक्ति के रूप में रूपांतर हो गई। भाप से चलने वाली मशीन, रेलों तथा जहाजो ने मानव जीवन में बोला जाये तो ऐसा महत्वपूर्ण परिवर्तन किया की मानव जीवन की जीवनी ही बदल गई। 1830 ई. तक औद्योगिक क्रांति का यहाँ ही अच्छी तरह से प्रारंभ हो गया और आने वालें अगले चालीस सालों में इस क्रांति ने अन्य कई सारे व्यवसाईयों का निर्माण किया और यह प्रगति इतनी बढ़ी के मानव को इस प्रगति से कई गुना फाइदा होने लगा और व्यवसाई और तरक्की करने लगा।

औद्योगिक क्रांति की अच्छे से शरुआत इंग्लेंड में हुई थी, लिकिन जल्द ही इनका फैलाव यूरोप के अन्य कई देशो में भी हो गया। मुख्य रूप से देखा जाये तो इनका ज्यादातर फैलाव फ़्रांस, बेल्जियम और जर्मनी में हुआ था जहां खनिज साधन भरपूर मात्र में उपलब्द थें।

फ़्रांस: 1789 ई. में हुई औद्योगिक क्रांति के कारण फ़्रांस में जो राजनितिक, आर्थिक, और सामजिक में कई तरह के परिवर्तन हुए। उपरांत फ़्रांस में औद्योगिक क्रांति के लिए उचित वातावरण भी निर्मित हो गया था। 1785 ई. में फ़्रांस में वस्त्र व्यवसाई का प्रथम बड़ा कारखाने का निर्माण किया गया था। इस कारखाने में कपडे का और भी ज्यादा मार्जिन बढ़ा ने के लिए इंग्लेंड से मशीनो की खरीदी की गई थी। नेपोलियन ने इस कपडे के उद्योग को और भी ज्यादा आगे बढ़ा ने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया था। नेपोलियन प्रजाति ने राष्ट्रिय मुद्रा स्थापित की, आर्थिक क्रियाएँ पर सरकार का नियंत्रण स्थापित किया गया और राष्ट्रीय बैंक की व्यवस्था की गयी।

हालांकि फ़्रांस देश में कई सारी समस्याएँ भी थी और फ़्रांस में भंडारों (स्टोर) का पूरा विकास नहीं हुआ था, देखा जाये तो फ़्रांस में प्रभावशाली मध्यम वर्ग भी नहीं था, और शिल्प-ग्रेड अभी भी उसमे कार्य कर रहीं थी, श्रमिक वर्ग के लोगों में औधोगिकरण के लिए कोई भी उत्सा या उन्नति नहीं थी। इसके देख ते हीं फ़्रांस देश में कोयले की खान की ज्यादा कमी थी। फिर भी देखा जाये तो फ़्रांस ने औद्योगिक क्रांति में पूर्ति सफलता प्राप्त की। इंग्लेंड और फ़्रांस के मध्य व्यापार फिर से स्थापित होने लगें। फ़्रांस देश ने अपनी तरक्की बढ़ा ने के लिए इंग्लेंड देश के पास से बड़ीं मात्रा में मशीने मँगाए गई। फ़्रांस ने अल्सास विस्तार में कई बड़े बड़े कारखाने वस्त्र बनाने के लिए लगाए।

फ़्रांस ने खुद 1830-1841 ई. की तहत में खुदके स्वदेशी मशीन का निर्माण कर दिया। फ़्रांस में 1831 में देखा जाये तो ढाई लाख से अधिक कर्मचारी वस्त्र उद्योग में काम कर रहें थे। फ़्रांस में सोलह लाख से ज्यादा कपास की आयत हो रहीं थी। देख ते हीं देख ते रेशम वस्त्र उद्योग और लौह उद्योग उत्पादन में फ़्रांस तेजी से प्रगति करने लगा था। फ़्रांस ने इतनी तरक्की की के 1848 ई. में औधोगिक उत्पादन के मामले में यूरोप इंग्लेंड के बाद फ़्रांस का ही स्थान आ गया था।

बेल्जियम: औधोगिक विकास की सुविधा बेल्जियम में कई ज्यादा मात्रा में थी क्योकि वहां पर महत्वपूर्ण कोयला की खोज की गयी थी। बेल्जियम में विकास के लिए कारखाना स्थापित करने के लिए इंग्लेंड से कई मशीन मंगाई गई थी। इंग्लेंड से मंगाई गई मशीन में वस्त्र उद्योग, लोहा उत्पादन, रेलमार्ग के निर्माण में बेल्जियम तेजी से तरक्की करने लगा। बेल्जियम देश 1850 ई. में एक उद्योग प्रधान देश के नाम से प्रचलित हो गया। बेल्जियम ने होलेन्ड, जर्मनी और रूस ऐसे देशो में मशीनों का व्यवसाई करने लगा।

जर्मनी: 1870 ई. में जर्मनी का एकीकरण हुआ था, लेकिन 1 जनवरी, 1834 ई. को जोलवरिन या सीमा शुल्क संघ की सथापना की गई और जर्मनी के आर्थिक एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम लिया जिसमे महत्व की बात यह थी के उसमे 8 राज्य शामिल थे। ईसी 8 राज्यों के एकीकरण द्वारा जर्मन देश में व्यापार-वाणिज्य में प्रगति हुई। 1839 ई. में इंग्लेंड देश की सहायता से जर्मनी में ड्रेसडेन से लिपजिंग तक रेलमार्ग का निर्माण किया गया। 1848 ई. तक जर्मनी ने बर्लिन, हेम्बर्ग, प्राग, क्रेकाओ और वियेना को रेल मार्गो से जोड़ दिया गया था। जर्मनी में रुर क्षेत्रो में कोयला और लोहे की खाने मिलने से जर्मनी प्रजा की औधोगिक प्रगति जड़प से विकास करने लगी। जर्मनी में 1850 ई. के बाद जानो एक वरदान के रूप में प्राप्त हुआ जोलवरिन औधोगिक विकास के लिए जब जर्मन में कच्चे कपास की खपत (ग्रहण किया हुआ) 1851 ई. में 28,000 टन से बढ़कर 1865 ई. में करीबन 50,000 टन तक हो गई थी।

जर्मन में 1871 ई. में एकीकरण के बाद तो जाने औधोगिक क्षेत्रो में अविश्वसनीय प्रगति हुई और जल्द ही ऐसे तरक्की के मुकाम को हासिल करने वाले देश इंग्लेंड को जर्मनी ने पीछे छोड़ दिया। यूरोप के अन्य देश जैसे डेनमार्क, स्वीडेन, होलैंड, इटली और ऑस्ट्रेलिया में 19 वीं सदी के बाद में औधोगिकिकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। रूस में औद्योगिक क्रांति की शरुआत सबके बाद हुई। रूस में औद्योगिक क्रांति सबके बाद शुरू होने का कारण वहा की सामंतवादी (Feudalist) संगठन था। जर्मनी में 1861 ई. में औद्योगिक क्रांति आरंभ रूस में कृषि अर्द्ध-दास की मुक्ति के बाद हुआ। वस्त्र उद्योग के व्यापार के लिए कई विस्तार में बहु मात्रा में कारखाने की स्थापना की गई।

1880 ई. में रूस में रेल निर्माण का कार्य आरंभ किया गया। रूस के इस विशाल निर्माण कारखाना की स्थापना के लिये फ़्रांस और इंग्लेंड के पास से बड़ी मात्रा में ऋण (उधार) लिया। रूस ने 1917 ई. की क्रांति के बाद उद्योग, संचार और परिवहन के लिये काफी तादाद में प्रगति कर ली थी।

औद्योगिक क्रांति के प्रभाव (Effects of Industrial Revolution)

आप लोग जानते है, की औद्योगिक क्रांति कोई अचानक होने वाली घटना नहीं थी। पंरतु वह विकास को बिना रोकें वालीं प्रक्रिया थी। औद्योगिक क्रांति की शरुआत इंग्लेंड से होकर घिरें घिरें सम्पूर्ण यूरोप में फैल गई थी। देखा जाये तो औद्योगिक क्रांति के जरिये हुए मशीनों के आविष्कारो ने मनुष्य जीवन के स्वरूप तरीके से परिवर्तित कर दिया था जिससे मानव को असीम शक्ति के साथ साथ अद्भुत पूर्व तरकि भी प्राप्त हुई। एक सच बात बता दे की औद्योगिक क्रांति से मानव जीवन जितना प्रभावित हुआ, उतना शायद हीं किसी अन्य परिवर्तन हुआ होगा। रेमजे म्योर के द्वारा “आर्थिक समाज में ऐसे समृद्ध परिवर्तन हुए जो इंग्लेंड से शरु होकर नजिक के भविष्य में सारे पश्विमी विश्व के आर्थिक और राजनितिक ढांचे में उम्मीद से ज्यादा परिवर्तन करने वाले थे जिससे ऐसे ऐसे नये कठिन समस्याओ का जन्म हुआ जिसमे विश्व में मनुष्य कें जीवन में एक नजर डालते है तो 19 वीं सदी से लेकर आज तक कठिन हुआ हैं”।

आर्थिक प्रभाव (Economic Impact)

उत्पादन में असाधारण वृद्धी: औद्योगिक क्रांति से मनुष्य जीवन में बहुत सारे बदलाव आये जैसे कारखानों में बनाई जाने वाली वस्तुओं का निर्माण (Production) अति जड्पी और सभी वस्तु योग्यता पूर्व से ज्यादा मात्रा में बन ने लगी। इन सभी औधोगिक वस्तुओ का किया गया निर्माण और उसको आंतरीक, विदेशी बाजारों में लेजाने के लिए व्यापारिक गतिविधियों में कई गुना तेजी का आरंभ हुआ जिससे औद्योगिक क्रांति एवं व्यापारिक निगमों का कई गुना फैलाव हुआ और इंग्लेंड की अर्थव्यवस्था को उद्योग प्रधान व्यवस्था के रूप में प्रधान हो गई।

औधोगिक नगरों का विकास: जब औद्योगिक क्रांति का आगमन हुआ तब कई सारे बड़ें शहरों में विकास हुआ और बड़ें बड़े कारखानों का निर्माण हुआ और वह कारखाने उसक शहर का एक उद्योग वर्ग का केंद्र बना। वहीँ में गावों के रहने वाले बेरोजगार लोग अपनी प्रगति करने के लिए शहेरो में आने लगे और वहीँ कारखाने के आस पास अपनी बस्ती जमा ने लगे और वहीँ ठहर गए। इस शहर का विकास मुख्य तौर पर उस जगह पर हुआ जहां पर लोहें और कोयले की खान थी और पानी की पर्याप्त उपलब्धि थी। ईसी दौरान इन नगरों में विकास तो हुआ लेकिन उसके साथ साथ एक समस्या का भी आगमन हुआ।  देखा जाये तो जैसे जैसे शहरों में विकास हुआ ऐसे ही इन सभी नगरों में अनियंत्रित ढंग ज्यादा तेजी से हुआ।

इंग्लेंड में जैसे बरमिंघन, शेफील्ड, लीड्स, मेनचेस्टर जैसे विशाल और समृद्ध नगर थे और जहाँ इंग्लेंड में बरमिंघन, मेनचेस्टर, लीड्स, शेफील्ड जैसे समृद्ध और विकास शील शहरो में हजारो कारीगर लोगो की बस्तिया थी। इन शहरों में उन सभी कारीगरों का रहने का, खाने, साफ़-सफाई, स्वास्थ्य, मनोरंजन ऐसी कई तरह की अच्छी सुविधाए उपलब्ध नहीं थी और बिचारे यह कारगर लोग और बस्ती में रहने वालें सभी लोग इन गन्दी जगह में रहते थे जहां उपेक्षित (परवा न किया हुआ), उत्पीडित (ज़ुल्म किया हुआ), नरकीय (दुष्ट) जीवन बिताते थे जेसे घृणायोग्य हों।

आर्थिक समृधि में वृद्धी : औद्योगिक क्रांति द्वारा मिला वरदानस्वरूप वस्तुओ के निर्माण, व्यापर तथा उससे लाभ में मिले अभूतपूर्व वृद्धी हुई थी।इन सभी का अंत में परिणाम यह मिला के दुनिया में इंग्लेंड सबसे पैसे वाला और समृद्ध देश बन गया। इंग्लेंड में धनवान अर्थव्यवस्था लगाने वालें लोग की प्रगति हुई। इन वर्ग के लोगो का राजनीत पर भी काफि प्रभाव और नियंत्रित्त था। इस पूंजीवादी तथा कारखानों के मालिकों का स्वाभाविक तौर पर वस्तुओ के उत्पादन का लाभ कुछ मात्र के लोगों पर ही निर्भर हुआ और उनके रहन-सहन का स्तर ऊँचा हुआ।

पूंजीवाद का विकास : औद्योगिक क्रांति की सबसे बड़ी दें पूंजीवाद कह सकते हें। हालाँकि पूँजीवाद का महत्तम विकास यूरोप में ही मध्ययुग से शरु हो चुका था, औद्योगिक क्रांति के तहत पूंजीवाद के विस्तारों, उसके स्वभाव में भी काफिं बदलाव और परिवर्तन हो गया था।

बैकिंग एवं मुद्रा प्रणाली का विकास : जैसे ही औद्योगिक क्रांति ने कदम रखा वैसे ही सम्पूर्ण आर्थिक स्थल-दृश्य को पूरी तरह से बदल दिया। व्यापार, उद्योग, बैंक, मुद्रा इन सभी कार्य महत्वपूर्ण होता गया। आगे जाके बैंक में लेने देने का व्यवहार आसान होता गया, फिर मानवी चेक और ड्राफ्ट का उपयोग ज़्यादातर करने लगें। चलन के क्षेत्र में धातुं से किये जाने वाले उपयोग को ख़तम करके उसकी जगह कागजी चलन का उपयोग होने लगा।

आर्थिक असंतुलन : औद्योगिक क्रांति के अनुसार आर्थिक असंतुलन एक बहुत बड़ी राष्ट्रिय समस्या बन गई। इस क्रांति से आर्थिक साम्राज्यवाद के युग की शरुआत हुई और औधोगिक राष्ट्र मंदिमत देशों से काम कराने लगें।

कुटीर उद्योगों का विनाश : औद्योगिक क्रांति से होने वाले सबसे बड़े नुक्सान के बारें में बात करें तो घरेलु उद्योग और उसे होने वाले घंघे में ज्यादा हुआ। कारीगर वर्ग के लोग अपने घर पर अपने परिवार जनों के साथ रहकर अपनी सिमित पूँजी से, अपने ही हथियारों से तथा अपनी इच्छानुसार काम करता था और उसे जिस काम में उजास था वहीं बनाता था। इस तरह देखा जाये तो वह इंसान पूरी तरह स्वतंत्र था। जब मानव हाथो से बनाये गए ओजार या फिर हाथो से किया काम उसके बजाय मशीनों से काम होने लगा, तो उससे घरेलु उद्योग-धंधो में ज्यादा हुआ और यह तरीका पूरी तरह से नष्ट हो गया। गावों और शहरो के कारीगर इन्सान और शिल्पकार कारखानों से निर्मित होने वालीं सस्ती वस्तुओ की प्रतियोगिता में कैसे संभल पाते? ब्रह्म से धीरे धीरे उन सभी के व्यवसाई में मंदी आती गई और कारखाने बंद होने लगे और वह हर जगह पर मजदूरों की तरह घुमने लगें बादमे धीरे धीरे उन सभी का उल्लेख श्रमिक वर्ग के लोगो को साथ होने लगा।

ईसी तरह घरेलु व्यवसाई और उद्योग का स्थान धीरे धीरे कारखानों में परिवर्तन होता गया और स्वतंत्र कारीगर एक वेतनभोगी यानी कारखानों में नौकर की तरह काम करने वालें मजदुर बन गएँ।

बेकारी की समस्या : बेकारी की समस्या इस तरह हुई की मशीनों द्वारा ज्यादा उत्पादन होने लगा और अब कम संख्या में कारीगरों की जरूरियात होने लगी थी। इससे बेरोजगारी की समस्या ज्यादा उत्पन्न होने लगी, अनेक मजदुर अपनी जिविका की खोज में नगरों में आकार बसने लगें। यह श्रमिक सब हार चुके थे जिसके पास परिश्रम के अलावा और कुछ नहीं बचा था।

राजनितिक प्रभाव (Political Influence)

राज्य के कार्यों में वृद्धी : औद्योगिक क्रांति के दौरान राष्ट्रों में राजनितिक (political) जीवन में कई सारे परिवर्तन हुए। जब कारखानाओ की शरुआत हुई तो कारखाना के मालिकोने कारीगरों पर बीती हुई दुर्दशा की किसी भी तरह की सरकारने मदद नहीं की और नाहीं किसी भी तरह का ध्यान दिया। इसका मतलब साफ़ साफ़ यही होता है, की सरकार को इस मामले में अहस्तक्षेप (बीच में न आने की नीति) की निति पर ही चल रहें थे। लेकिन हुआ यु की धीरे धीरे मजदूरों की हालात और बिगड़ने के कारण सकारों को मजदुरों की हालत को ध्यान में रख ते हुए दशा सुधारने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करना हीं पड़ा। इंग्लेड की सरकार ने ईसी बात को ध्यान में रख ते हुए कई कारखाना के लिए नया कानून बनाया, जिसको ध्यान में लेते हुए काम को एक निश्चित समय दिया और साथ ही कारखान में मजदुरों को सुरक्षा प्रदान की गई। इस प्रकार राज्य के कई विस्तार में वृद्धी हुई।

समाजवादी विचारधारा का उदय : जैसे जैसे कामगारों की और मजदूरो की हालत में बदलाव आया वीं स्टोक की आर्थिक समृधि भी बढ़ती गई। ऐसे ही जिसके पास ऐसे भंडार भरे पड़े थे उसने अपना मुनाफा और बढ़ा ने के लिए मजदूरों का शोषण करने लगे। इसके फलस्वरूप कारीगरों और मजदूरों की हालत और भी ख़राब होती गई। कुछ ऐसे विचारको ने मजदूरों की यह हालत देख के उसकी हालतों में सुधार लाने के लिए एक नए ही नियमो का आगमन किया, जिस ‘समाजवादी विचारधारक‘ कहते हैं। उसका ऐसा मानना था के उत्पादन के साधनो पर किसी भी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं होना चाहिए बल्कि पुरे समज वर्ग में रहने वालें लोगों का अधिकार होना चाहिए। राबर्ट ओवन ने इस समस्या को ध्यान में रख ते हुए सहकारिता आंदोलन का आरंभ किया। इसके साथ ही समाजवादी, समुहवादी और साम्यवादी विचार धारा का आरंभ किया। इसका उदेश्य सिर्फ यही था की नयी नयी राजनितिक और आर्थिक व्यवस्था की स्थापना करना था।

श्रमिको द्वारा सत्ता प्राप्त करने के प्रयत्न : मजदुर लोको ने सत्ता प्राप्त करने की भी कई ज्यादा कोशिश की थी। उनका उदेश्य सिर्फ यही था की नई राजनितिक व्यवस्था स्थापित करना और जिनमे मजदूरों के हितमे सुरक्षा मिले वही उसका महत्तम उदेश्य था। मजदुर लोगोको यह बात का अंदाजा हो गया था की जबतक उसके हाथ में सत्ता उनके हाथों में नहीं होगी तब तक उन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी।

साम्राज्यवाद का विकास : ज्यादा से ज्यादा वस्ति को हासिल करना बड़े बड़े उद्योग-प्रधान देशों का मुक्य उदेश्य बन गया था। इस घटना से एक नए साम्राज्यवाद का विकास हुआ जिसमे राष्ट्रों के मध्य को मुकाबला करने का जन्म दिया। इस स्पर्धा के कारण यूरोप के देशों ने आफ्रिका, अमेरिका और एशिया के अलग अलग भागो पर नई बस्ती का निर्माण किया। बाद में हुआ यु की इन बनाई गई नयी बस्ती की छिना-ज्पटी के कारण यूरोप देश का अंतर्राष्ट्रीय वातावरण अत्यंत बिगड़ा जेसे अशांत और क्षुब्ध हो गया।

सामाजिक प्रभाव (Social Impact)

जनसँख्या में वृद्धी : औद्योगिक क्रांति ने जनसंख्या को होने योग्य बनाया। औद्योगिक क्रांति की वजह से दूसरी तरफ परिवहन में सुधार किया गया और परिवहन के अति आधुनिक साधनों के माध्यम से किसी भी विस्तार में खाध्य पदार्थो का उत्पादन बढ़ाकर  भोजन की आवश्यकता को पूरा किया गया। बेहतरीन पोषण, विकसित स्वास्थ्य और औशोधी विज्ञान की वजह से मनुष्य के जीवन की आयु में वृद्धी हुई और इसे होने वाले मृत्यु दर में कमी हुई।

नये सामजिक वर्गों का उदय : औद्योगिक क्रांति द्वारा हुई मुख्य रूप से तिन नये वर्गों को जन्म दिया।

  • पहला वर्ग – जिसमे व्यापारी और पूँजीपति का समावेश होता हैं।
  • दूसरा मध्यम वर्ग – जिसमे कारखानों के निरीक्षक, ठेकेदार, इंजीनियर, दलाल, वैज्ञानिक आदि का समावेश होता हैं।
  • तीसरे श्रमिक वर्ग – इसमें अपने श्रम और कौशल से उत्पादन करते हैं।

इन सभी नये वर्गो की वृद्धी से सामजिक जीवन में असंतुलन की स्थिति पैदा हुई और समाज के इस नये वर्ग ने किसी भी व्यक्ति या फिर वस्तु में भेद भाव पैदा किया। 1832 ई. के इस ऐक्ट से पूंजीपति वर्ग की समृद्धि के मार्ग पे कब्ज़ा किया। इसलिए 19वीं सदी को आज भी बुर्जुआ युग के नाम से जाना जाता हैं।

मजदूरों की दुर्दशा : मजदूरों की दुर्दशा करने वाला पक्ष औद्योगिक क्रांति था। कारखानों में काम करने वालें मजदुर लोग कारखाना के मालिकों की रहमी पर अधीन थे और उन्ही मजदूरो को कारखाना के पास अस्वास्थ्यकर गंदी बस्तिया उसमे छोटे छोटे तंगी वाले मकानों में रहना पड़ता था जिसमे माकन में उसको ठीक से हवा, प्रकाश तथा पिने का पानी जैसी कोई यथायोग्य सुविधा नहीं थी। जहं पर मजदुर लोग काम करते थे वहा के कारखाने भी गंदे और सेहद के लिए हानिकारक थे। मजदूरों की इनी दशा सुधारने के लिए कारखाना के मालिक या साकार इंमेसे कोई उतरदायी नहीं थे। कारखाना के मालिक मजदुर लोगो के काम करने के बाद उसको पगार धोरण भी बहुत कम देते थे और बिचारे मजदुर को दिन के 16 – 16 घंटे तक काम करवाते थे।

अगर कारखाना में काम करते करते किसी भी प्रकार की दुर्घटना हो गई या फिर इस दुर्घटना दौरान किसी मजदुर की जान भी चली गई तो उन्हें किसी भी प्रकार की सुविधाए उपलब्ध नहीं थी। कारखाना पर काम करने वाली स्त्रिये या फीर बाल बच्चे को भी 12 – 12 घंटे काम करना पड़ता था। कहा जाये तो कारखाना ओ के मालिक को सिर्फ आपना मुनाफा कैसे बढे और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा मिले उसकी ही मालिको को चिंता थी और उसको मजदूरो के सुख – दुःख की उन्हें किसी भी प्रकार की चिंता नहीं थी।  मजदूरो की ईसी दुर्दशा के कारण समाजवादी विचारधारा का लाना पड़ा था।

व्यक्तिवाद मानवतावाद और औद्योगिक गुलामी : मानवतावादी और व्यक्तिवादी औद्योगिक क्रांति की आलोचना करते हैं, कि मनुष्य को औद्योगिक दास बना दिया गया है, कि आधुनिक औद्योगिक दुनिया में मनुष्य के पास स्वायत्तता का अभाव है। औद्योगिक क्रांति के आलोचकों का कहना है, कि मानवता को प्रौद्योगिकी द्वारा नियंत्रित और नियंत्रित किया जाता है, जैसे कि कंप्यूटर अनिवार्य कार्य, और यह कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता औद्योगीकरण से नष्ट हो जाती है।

मानवीय संबंधों में गिरावट : रूढ़ि-गत चलने वाले भावनात्मक मानविय संबंधो का स्थान आर्थिक (धन संबंधी) संबंधों ने ले लिया। जिन मेहनती मजदुर के कार्य और विशेष योग्यता पर उद्योगपति तरक्की कर रहें थे उनसे मालिक ना ही परिचित था और नाहीं परिचित होना चाहता था। बड़े बड़े उद्योगों में उस मशीन का उपयोग किया गया और तकनिकी ने आगे आगे बढ़ा कर मानव को भी एक मशीन का अहम् हिस्सा बना दिया। जैसे जैसे प्रगति होती गई ऐसे ही मानव मानव का सबंध टूटता गया और वह मानव अब मशीन से जुड़ता गया। ग्रहणशीलता प्रभावित हुई।

स्वच्छंदतावाद का विरोध (Opposing Romanticism)

औद्योगिक क्रांति के दौरान, स्वच्छंदतावाद आंदोलन से जुड़े नए औद्योगीकरण के प्रति एक बौद्धिक और कलात्मक शत्रुता विकसित हुई। स्वच्छंदतावाद ने ग्रामीण जीवन की परंपरावाद का सम्मान किया और औद्योगीकरण, शहरीकरण और मजदूर वर्गों की दुर्दशा के कारण हुई उथल-पुथल के खिलाफ समर्थन किया। अंग्रेजी में इसके प्रमुख प्रतिपादकों में कलाकार और कवि विलियम ब्लेक और कवि विलियम वर्ड्सवर्थ, सैमुअल टेलर कॉलरिज, जॉन कीट्स, लॉर्ड बायरन और पर्सी बिशे शेली शामिल थे।

आंदोलन ने “राक्षसी” मशीनों और कारखानों के विपरीत कला और भाषा में “प्रकृति” के महत्व पर जोर दिया ब्लेक की कविता का “डार्क सैटेनिक मिल्स” “और उन पैरों को पुरातनता में किया“। मैरी शेली के उपन्यास फ्रेंकस्टीन ने चिंता व्यक्त की कि वैज्ञानिक प्रगति दोतरफा हो सकती है। इसी तरह फ्रांसीसी स्वच्छंदतावाद उद्योग की अत्यधिक आलोचनात्मक था।

सांस्कृतिक परिवर्तन : औद्योगिक क्रांति के ईसी बदलाव की वजह से मानवी के पुराने रहन – सहन के सारे तरीको में बिलकुल बदलाव हो गया।  जैसे मानवी की वेश भूषा, रीती रिवाज, धार्मिक मान्यता, पुरानी कला साहित्य, पुँराने मनोरंजन के साधन में परवर्तन हुआ।  परम्परागत विद्या की पद्धति के स्थान पर रोजगारपरक तकनिकी एवं प्रबंधक शिक्षा का विकास बहुत ज्यादा तेजी से हुआ। इस तरह मानव के सांस्कृतिक जीवन में परिवर्तन हुआ।

पारिवारिक जीवन पर प्रभाव : औद्योगिक क्रांति के आगमन से ऐसी कई फलस्वरूप सयुक्त परिवार को आघात पहुंचा हैं। वस्तु की कृषि अर्थव्यवस्था (agricultural economy) में जुड़े हुए परिवार प्रथा को इसका बहुत लाभ हुआ। परंतु औद्योगिक क्रांति के आगमन से आब व्यक्ति का महत्व बढ़ने लगा और मानव अपनी तरक्की के लिए अपने घर से निकल कर दूर कारखानों में जाकर काम सिख ने लगा और वहा पर काम भी करने लगा लिकिन उस जगह पर उसके परिवार जन को रखने की सुधाए नहीं थी। इस तरह एकल परिवार को ज्यादा बढ़ावा मिला। दूषित कारखानों में बालको और स्त्रियों को मलिकी के काम करने में भी नई नई सामजिक समस्या का बढ़ावा पैदा हुआ।

समष्टिवादी सिद्धांतो का महत्त्व : अब मानव जीवन में व्यक्तिवादी सिद्धांतो की अपेक्षा समष्टिवादी सिद्धांतो का कई महत्व बढने लगा। इसका महान उदेश्य यहाँ था की प्रतिस्पर्धात्मक (स्पर्धात्मक) पूँजीवादी समाज की जगह पर एक सहयोगात्मक (collaborative) के आधार पर नए समाज को बनाया जाए।

Last Final Word:

इस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने मनुष्य के समाज को गहरे रूप से प्रभावित किया। इसने परिणामस्वरूप कई नई अर्थव्यवस्था ने एक नये मानव समाज को बेहतरीन रचना दी। इसका महत्तम असर यूरोपीय जीवन के अलग अलग क्षेत्रो पर पड़ा था। देखा जाये तो औद्योगिक क्रांति के गुण भी थे और अवगुण दोनों थे। इस औद्योगिक क्रांति ने यूरोपी जीवन के स्तर को काफिं बढ़ावा दिया, लेकिन उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाये तो काफी अस्थिर बना दिया था।

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